GDP Growth of Indian: सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के नए आंकड़ों से स्पष्ट है कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के मुताबिक, भारतीय अर्थव्यवस्था में 7.4 फीसद की वृद्धि होने की उम्मीद है, जिसमें विनिर्माण, सेवाएं और सरकारी व्यय वृद्धि को गति मिलेगी। जाहिर है, इसका असर नौकरी, महंगाई, आमदनी, कर्ज, कर और सरकारी सुविधाओं पर पड़ेगा। ग्रामीण इलाकों में कृषि से जुड़े रोजगार में बढ़ोतरी हो सकती है। सात फीसद या उससे अधिक दर का मतलब यही है। दूसरी ओर, तेज जीडीपी से मांग बढ़ती है, जिससे यदा-कदा महंगाई का दबाव बनता है।
अगर विकास दर संतुलित रहे तो आपूर्ति बढ़ने से महंगाई काबू में रहती है। कहा जा सकता है कि आम आदमी के लिए बहुत तेज विकास दर का मतलब महंगाई का खतरा होता है, वहीं इसकी धीमी रफ्तार से आमदनी प्रभावित होती है। लिहाजा, मध्यम और स्थिर विकास आंकड़ा सबसे अच्छा माना जाता है।
कर संग्रह और राजकोषीय घाटे पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है। व्यापक अर्थव्यवस्था और आगामी केंद्रीय बजट दोनों के दृष्टिकोण से यह अच्छी बात है। जीडीपी दर के समांतर महंगाई काबू में रहे तो केंद्रीय रिजर्व बैंक ब्याज दरें घटा सकता है, जिसका सीधा असर कर्ज की किस्त पर पड़ सकता है।
साथ ही, सरकार को मिलने वाला कर राजस्व बढ़ सकता है, जिससे ढांचागत और समाज कल्याण की योजनाओं पर खर्च बढ़ाया जा सकता है। शेयर बाजार में तेजी से म्यूचुअल फंड, भविष्य निधि आदि पर सकारात्मक असर हो सकता है। जीडीपी की दर 2024-25 में 6.5 फीसद की तुलना में अधिक है, और यह मुख्य रूप से विनिर्माण और सेवाओं में वृद्धि के सुधार का नतीजा है।
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दूसरी ओर, नवीनतम आंकड़ों को लेकर चर्चा में कई पहलुओं की अनदेखी हो रही है। कुछ महीने बाद आने वाले जीडीपी के अनंतिम आंकड़े उनसे प्रभावित दिखेंगे। जीडीपी के आंकड़ों में अवैतनिक श्रम (जैसे घरेलू काम), पर्यावरणीय क्षति, आय असमानता और गैर-बाजार लेनदेन (जैसे स्वयंसेवा) जैसे महत्त्वपूर्ण पहलुओं को नहीं गिना जाता। जीडीपी देश की औसत आय बताता है, लेकिन यह नहीं दिखाता कि धन का वितरण कितना असमान है।
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उच्च जीडीपी के बावजूद समाज के एक बड़े हिस्से का जीवन स्तर निम्न हो सकता है। यह उन वस्तुओं और सेवाओं (जैसे निजी खपत के लिए उत्पादित वस्तुएं, स्वयंसेवा) को शामिल नहीं करता जिनका बाजार में लेन-देन नहीं होता, और उत्पादन की गुणवत्ता में सुधार को नहीं दर्शाता। आपदाओं या खराब परिस्थितियों से बचने के लिए किया गया खर्च (जैसे प्रदूषण मास्क खरीदना, मरम्मत कार्य) भी जीडीपी बढ़ाता है, जबकि यह असल में समाज के कल्याण में कमी को दर्शाता है।
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ऐसे में जीडीपी के आंकड़ों को सतत विकास का संकेतक नहीं माना जाता। यह भविष्य की पीढ़ियों पर पड़ने वाले प्रभावों को ध्यान में नहीं रखता। बावजूद इन तर्कों के, जीडीपी के आंकड़ों से उम्मीद तो बढ़ी है। जरूरत इस बात की है कि अर्थव्यवस्था की ठोस मजबूती के लिए उन पहलुओं पर भी गौर किया जाए, जिनकी अनदेखी हो रही है।
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