हर वर्ष इस मौसम में ठंड की आहट के साथ ही दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की आबोहवा इस कदर प्रदूषित हो जाती है कि उसमें सभी लोगों के लिए अपनी सेहत को दुरुस्त रख पाना ही एक बड़ी चुनौती हो जाती है। मगर विडंबना यह है कि हर अगले वर्ष गहराती जा रही इस मुश्किल पर काबू पाने के ठोस उपाय करने के बजाय जैसी बहुस्तरीय लापरवाही देखी जाती है, वह इस समस्या के असर को और ज्यादा घातक बनाती है।
होना यह चाहिए कि जब इन दो-तीन महीनों में वायु प्रदूषण की मुश्किल ज्यादा जटिल शक्ल अख्तियार कर लेती है, तो सबसे पहले स्कूल-कालेज या इस तरह की किसी भी जगह पर बच्चों के खेल से जुड़ी गतिविधियों को लेकर एक सुचिंतित नियम-कायदे बनाए जाएं, ताकि विद्यार्थियों को प्रदूषण की मार से बचाया जा सके।
मगर होता है इसके उलट कि कई बार स्कूल-कालेज से लेकर खेल के मैदानों में होने वाली गतिविधियों के लिए जो कार्यक्रम तैयार किए जाते हैं, उनमें प्रदूषण से पैदा होने वाली मुश्किल के पहलू को नजरअंदाज किया जाता है। जाहिर है, यह शैक्षणिक परिसरों में खेल गतिविधियों के लिए कार्यक्रम का खाका तैयार करने में अदूरदर्शिता का परिचायक है। इसमें यह ध्यान रखना जरूरी नहीं समझा जाता कि जहरीली हवा के बीच बच्चे किस तरह खेलों या अन्य गतिविधियों में हिस्सा ले सकेंगे और उनकी सेहत पर क्या असर पड़ेगा।
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इसी के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग से कहा कि वह हवा में प्रदूषण के स्तर को ध्यान में रखते हुए दिल्ली सहित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में नवंबर और दिसंबर में प्रस्तावित खेल प्रतियोगिताओं को ‘सुरक्षित महीनों’ तक के लिए स्थगित करने का निर्देश देने पर विचार करे।
सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश के बाद आयोग ने दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश की सरकारों को पत्र लिख कर विद्यार्थियों की सुरक्षा के लिए नवंबर और दिसंबर महीने में होने वाली शारीरिक मेहनत और खेल प्रतियोगिताओं को स्थगित करने को कहा है। पिछले कुछ वर्षों से देश के कई हिस्सों में ठंड की शुरुआत के साथ ही बादलों के घनीभूत होने की वजह से वायु प्रदूषण की समस्या जटिल हो जाती है। खासतौर पर दिल्ली सहित समूचे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में हालत यह हो जाती है कि लोगों के सामने कहीं भी साफ हवा में सांस ले पाना चुनौती होती है। कई बार ऐसा लगता है मानो दिल्ली किसी गैस चेंबर की तरह हो गई है।
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इस मसले पर अदालतें कई बार सख्त रुख दर्शा चुकी हैं। मगर अब भी ऐसा लगता है कि संबंधित सरकारी महकमे प्रदूषण की गहराती समस्या के मद्देनजर स्कूल-कालेज आदि जगहों पर खेल प्रतियोगिताओं या बच्चों की शारीरिक मेहनत वाली गतिविधियों का समय टालना जरूरी नहीं समझते।
यह स्पष्ट रूप से अदूरदर्शिता है, क्योंकि इन महीनों में दिल्ली-एनसीआर के समूचे इलाके में वायु गुणवत्ता सूचकांक ‘बहुत खराब’ की श्रेणी में पहुंच जाता है। इसका नतीजा जगजाहिर रहा है कि गहराते प्रदूषण के बीच आम लोगों और खासतौर पर स्कूली बच्चों और किशोरों को एक तरह की सेहत की जंग लड़नी पड़ती है।
यह केवल दिल्ली की समस्या नहीं है। देश के कई दूसरे शहरों में भी इन दिनों वायु गुणवत्ता की स्थिति बुरी तरह प्रभावित होती है। इसलिए दिल्ली के अलावा वायु गुणवत्ता सूचकांक के मामले में ‘गंभीर’ श्रेणी में पहुंचे सभी शहरों में प्रदूषण से उपजी स्थिति से निपटने को लेकर एक व्यापक और ठोस नीति की जरूरत है।
