सर्वोच्च न्यायालय ने भ्रष्ट अधिकारियों पर शिकंजा थोड़ा और कस दिया है। अदालत की संविधान पीठ ने व्यवस्था दी है कि भ्रष्टाचार के मामले में संयुक्त सचिव और उससे ऊपर के अधिकारियों की गिरफ्तारी में संबंधित प्राधिकार से अनुमति लेने की कोई जरूरत नहीं है और यह नियम 2003 से पहले के मामलों पर भी लागू होगा।

यानी दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (डीएसपीई) अधिनियम का कोई मतलब नहीं है। दरअसल, डीएसपीई अधिनियम में व्यवस्था दी गई थी कि केंद्र सरकार में संयुक्त सचिव या उससे ऊपर के अधिकारियों की गिरफ्तारी से पहले संबंधित प्राधिकार से अनुमति लेनी होगी। मगर सीबीआइ ने 2004 में दिल्ली के मुख्य जिला चिकित्सा अधिकारी को भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ्तार कर लिया था।

तब उन्होंने डीएसपीई अधिनियम के तहत राहत की गुहार लगाई थी। उसके बाद इस अधिनियम के औचित्य की समीक्षा करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने 2014 में इस अधिनियम को ही रद्द कर दिया था। फिर यह सवाल उठा कि इस फैसले से पहले के लंबित मुकदमों के बारे में क्या नियम लागू होगा। उसी पर संविधान पीठ ने फैसला दिया है कि 2014 का फैसला इसके पहले के मामलों पर भी लागू होगा। इससे एक बार फिर जाहिर हुआ है कि अदालत भ्रष्टाचार के मामलों में किसी तरह की रियायत की पक्षधर नहीं है।

दरअसल, डीएसपीई अधिनियम बना था तो उसके पीछे मकसद यही था कि किसी अधिकारी के गिरफ्तार होने की वजह से संबंधित महकमे का कामकाज बाधित न होने पाए। संयुक्त सचिव और उसके ऊपर के पदों का निर्वाह कर रहे अधिकारियों को अनेक गंभीर और जरूरी मामलों में तत्काल फैसले करने पड़ते हैं। अगर उन्हें अचानक गिरफ्तार कर लिया जाता है तो अनेक परियोजनाएं और दूसरे कामकाज ठप पड़ सकते हैं।

इसलिए इस मामले में संबंधित प्राधिकार यानी मंत्रालय से गिरफ्तारी की अनुमति लेने को अनिवार्य किया गया। मगर यह अधिनियम एक तरह से अधिकारियों के लिए कवच साबित हुआ। जांच एजंसियों के पास पुख्ता सबूत होने के बावजूद वे किसी भ्रष्ट अधिकारी को तब तक गिरफ्तार नहीं कर सकती थीं, जब तक उन्हें संबंधित विभाग से अनुमति नहीं मिल जाती।

फिर यह छिपी बात नहीं है कि इन ऊंचे ओहदों पर पहुंचे लोगों के अपने बड़े अधिकारियों, मंत्रियों आदि से कैसे रिश्ते होते हैं। इस तरह कई अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई में लंबा समय खिंच जाता था। तब तक मामले से संबंधित सबूतों के साथ छेड़छाड़ की आशंका भी बनी रहती थी। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय ने डीएसपीई को अप्रासंगिक माना था।

भ्रष्टाचार के मामलों में जांच एजंसियों के सामने सबसे बड़ी अड़चन यही आती है कि रसूखदार और सत्तापक्ष से जुड़े लोगों के खिलाफ जांच और कार्रवाई करने में कई तरह की इजाजत लेनी पड़ती है। मंत्रालयों में बैठे अधिकारी कई बार मंत्रियों के पसंदीदा और भरोसेमंद होते हैं, इसलिए कुछ मंत्री उनके खिलाफ कार्रवाई की इजाजत देने से बचते रहते हैं।

यही दिक्कत किसी मंत्री या सांसद-विधायक के खिलाफ कार्रवाई करने में आती है। हालांकि पिछले कुछ सालों में ऐसे लोगों के खिलाफ भी दंडात्मक कार्रवाइयां हुई हैं। मगर तब भी यह सवाल उठता रहता है कि सत्तापक्ष के लोगों के खिलाफ जांच एजंसियां कड़े कदम क्यों नहीं उठा पातीं। सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले के बाद शायद जांच एजंसियों का साहस कुछ बढ़ा होगा। मगर यह अपेक्षा इसके बाद भी बनी रहेगी कि जांच एजंसियां सत्तापक्ष के दबाव से मुक्त रह कर कितना काम कर पाती हैं।