बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने की हिंसक घटनाओं का सिलसिला थम नहीं रहा है। पिछले दो सप्ताह में वहां तीन हिंदू नागरिकों की हत्या कर दी गई। इससे हिंदू समुदाय के भीतर सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। ये हमले ऐसे समय में हो रहे हैं, जब बांग्लादेश में आए दिन विरोध प्रदर्शनों से अराजक स्थिति पैदा हो रही है। सवाल है कि ऐसे हमले अचानक हो रहे हैं या फिर किसी गहरी साजिश के तहत इस तरह की हिंसा का जाल बुना जा रहा है! ऐसे में वहां की अंतरिम सरकार और सुरक्षा एजेंसियों की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में है।
हालांकि, सरकार का दावा है कि इन घटनाओं को सांप्रदायिकता से नहीं जोड़ा जाना चाहिए, क्योंकि इनके पीछे व्यक्तिगत कारण हो सकते हैं। अगर यह सही है, तो फिर क्या वजह है कि अल्पसंख्यकों को ही लक्षित तरीके से निशाना बनाया जा रहा है? कानून व्यवस्था बनाए रखने और आम नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? जाहिर है कि जिस तरह की अराजक स्थिति पैदा हो रही है, उसके लिए शासन एवं प्रशासन ही जवाबदेह हैं।
बांग्लादेश में अगस्त 2024 में तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों के बाद हिंसा का सिलसिला शुरू हुआ था। अंतरिम सरकार बनने के बाद वहां माहौल थोड़ा शांत और स्थिर हुआ था, लेकिन हाल के दिनों में हिंसा फिर से जोर पकड़ने लगी है। खासकर अब हिंदू समुदाय के लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। इसी क्रम में पिछले दो सप्ताह के भीतर तीन हिंदू नागरिकों की हत्या कर दी गई। पहले भालुका इलाके में भीड़ ने ईशनिंदा के आरोप में एक हिंदू व्यक्ति को पीट-पीट कर मार डाला और फिर उसे आग के हवाले कर दिया गया।
इसके कुछ दिन बाद मैमनसिंह जिले में एक हिंदू नागरिक की हत्या कर दी गई। हाल ही में कपड़े के कारखाने में एक हिंदू कर्मी को गोली मार दी गई, जिससे उसकी मौत हो गई। इस मामले में स्थानीय पुलिस का दावा है कि आरोपी ने मजाक में हिंदू व्यक्ति की तरफ बंदूक तानी थी और इस दौरान अचानक गोली चल गई। जबकि घटना के चश्मदीद का कहना है कि आरोपी ने जान-बूझकर गोली चलाई। बयानों के इस विरोधाभास से पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यह बात छिपी नहीं है कि पाकिस्तान हो या बांग्लादेश, वहां अल्पसंख्यक हिंदुओं की सुरक्षा और उनके अधिकार सुरक्षित नहीं हैं। अत्याचार, प्रताड़ना, जबरन धर्मांतरण और हिंसा की वजह से वहां हिंदुओं की आबादी लगातार कम हो रही है। बांग्लादेश में शेख हसीना को सत्ता से हटाने के बाद से हिंदू समुदाय के लोगों पर लक्षित हमलों की घटनाएं बढ़ गई हैं। वहां जिस उद्देश्य से अंतरिम सरकार का गठन किया गया था, वह पूरा होता नजर नहीं आ रहा है।
कानून व्यवस्था के मोर्चे पर सरकार की विफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि न तो विरोध प्रदर्शन थम रहे हैं और न ही हिंसक गतिविधियों पर अंकुश लग पाया है। इसका असर भारत-बांग्लादेश के द्विपक्षीय संबंधों पर भी पड़ा है। मगर ऐसा प्रतीत होता है कि वहां की अंतरिम सरकार भारत के साथ संबंध सुधारने को लेकर गंभीर नहीं है। ऐसे में भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने कूटनीतिक प्रयास तेज करने होंगे, ताकि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर पैदा हुए खतरे को कम किया जा सके।
