इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि जनता की सुविधा के नाम पर जो व्यवस्था की जाए, वही किसी के लिए जानलेवा साबित हो जाए। अगर कहीं ऐसा होता है तो यह सरकारी इंतजामों और उससे जुड़े अधिकारियों की अदूरदर्शिता और लापरवाही का ही उदाहरण होगा, जिसकी वजह से किसी ऐसे मरीज की जान चली जाती है, जिसे थोड़ी सजगता से बचाया जा सकता था? गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के अयोध्या में श्रद्धालुओं की भीड़ और जाम के मद्देनजर प्रशासन ने जो अवरोधक खड़े किए थे, उसके पीछे मकसद भीड़ को नियंत्रित करना बताया गया था।

मगर इस इंतजाम के पीछे अदूरदर्शिता और प्रशासनिक संवेदनहीनता तब सामने आई, जब एक स्थानीय भाजपा नेता की तबीयत ज्यादा खराब हो गई और सड़क पर लगे अवरोधक की वजह से उनकी गाड़ी समय रहते आगे नहीं बढ़ पाई। खबरों के मुताबिक, भाजपा नेता के परिवार के लोगों ने वहां मौजूद पुलिस अधिकारियों से अवरोधक खुलवाने की गुहार लगाई, उच्च स्तर के अधिकारियों को भी फोन किया, लेकिन रास्ता नहीं खुल सका। सवा घंटे बाद जब अवरोधक हटाया गया, तब आगे भी यही हालत होने की वजह से गाड़ी समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाई और आखिरकार उनकी मौत हो गई।

आपात स्थिति में होते है हालात बदतर

यानी भीड़ और जाम से निपटने के लिए व्यवस्था बनाने के नाम पर जिस तरह सड़क को बाधित किया गया था, उसमें आपात अवस्था में पहुंचे किसी मरीज को भी आगे निकलने देने का खयाल नहीं रखा गया। अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारियों को आपात अवस्था में पहुंचे किसी मरीज की नाजुक हालत देखने के बावजूद कोई विशेष इंतजाम करना जरूरी नहीं लगा। क्या यह लापरवाही के साथ-साथ संवेदनहीनता का परिचायक नहीं है? यह अकेले अयोध्या का मामला नहीं है।

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देश के अलग-अलग हिस्सों से सड़कों पर लगने वाले जाम की वजह से लोगों और खासकर बीमार लोगों को होने वाली असुविधाएं कोई छिपी हकीकत नहीं है। अफसोसनाक यह है कि न केवल जाम, बल्कि इस समस्या से पार पाने के लिए पुलिस की ओर से जो इंतजाम किए जाते हैं, वे भी कई बार आपात अवस्था में किसी बीमार या जरूरतमंद लोगों की मदद नहीं कर पाते हैं।