तवलीन सिंह का लेख ‘विकास की अहमियत’ (वक्तकी नब्ज, 23 अगस्त) पढ़ा। मुझे भी उनकी तरह इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत की हर समस्या का समाधान है- विकास। लेकिन विकास किसका? लोकसभा चुनाव से पहले भारत का विकास! दिल्ली, कश्मीर, हरियाणा और झारखंड के विधानसभा चुनावों से पहले उनका विकास और अब बिहार का विकास! लेख में विकास पुरुष मोदीजी का महिमामंडन किया गया है।
मोदीजी के अलावा विकास किसी के द्वारा हो ही नहीं सकता! भाजपा से भी नहीं क्योंकि नीतीश कुमार के साथ आठ साल तक भाजपा सत्ता में थी। तब भी तवलीन सिंह पटना की गंदी, बदहाल गलियों में घूमती हैं तो उन्हें यकीन हो जाता है कि भारत कभी मध्यम विकसित देशों की श्रेणी में जगह नहीं बना पाएगा। इसलिए अब सभी प्रदेशों के विकास का जिम्मा मोदीजी ने खुद अपने हाथों में ले लिया है। लें भी क्यों न?
सवा सौ करोड़ की ‘टीम इंडिया’ के कप्तान जो हैं। बस उनकी टीम इंडिया में उस राज्य में विपक्षी पार्टियों के नेताओं को कोई जगह नहीं है जहां चुनाव होने हैं। अब संदेह होने लगा है कि मोदीजी देश के प्रधानमंत्री हैं या भाजपा के? जो दुर्भाग्यशाली लोग उनकी टीम इंडिया में जगह नहीं बना पाते उनके डीएनए तक में प्रधानमंत्रीजी को खोट नजर आता है!
तवलीनजी लिखती हैं कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर दो दुश्मन (लालू और नीतीश) दोस्त बन गए हैं लेकिन इनका मकसद जातिगत वोटो को समेटना है। मेरी समझ में यह नहीं आता कि एक तरफ लालकिले की प्राचीर से मोदीजी जातिवाद और सांप्रदायिकता को खत्म करने की अपील करते हैं तो दूसरी ओर इनके राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह यह कहते हुए वोट मांगते हैं कि हमने देश को प्रथम ओबीसी प्रधानमंत्री दिया है (यह गलत तथ्य है, पहले एचडी देवगौड़ा थे)। इसके साथ ही भाजपा द्वारा हमेशा से जातिवादी और सांप्रदायिक बताए जाने वाले रामविलास पासवान, जीतनराम मांझी, पप्पू यादव जैसों से गठजोड़ जातिवाद नहीं है तो क्या है?
तवलीनजी एक तरफ उद्योगपतियों के सहारे अच्छे दिन लाने की वकालत कर रही हैं तो दूसरी ओर मोदी सरकार के मंत्री नरेंद्र तोमर कह रहे हैं कि अच्छे दिनों का नारा भाजपा यानी मोदी का नहीं बल्कि सोशल मीडिया की देन था। जिस देश की 74 फीसद जनता गांवों में रहती है उस देश में स्मार्ट सिटी या डिजिटल इंडिया जैसी परियोजना पर बल दिया जाएगा तो देश की इससे बेहतर स्थिति की परिकल्पना बेमानी होगी।
गोपाल यादव, बीएचयू, वाराणसी
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