इसे आप वर्तमान महामारी से जोड़ कर देख सकते हैं, जिससे निपटने में हमारे देश के नर्सिंग कर्मचारियों ने अहम भूमिका निभाई है। इसीलिए इनको ‘कोरोना योद्धा’ जैसी उपाधि दी गई है। एक प्रसिद्ध कथन है कि जब आप एक जीवन बचाते हैं तो हीरो होते हैं, लेकिन जब आप सौ जीवन बचाते हैं तो एक नर्स होते हैं। लेकिन सवाल यह है कि हाल ही में दिल्ली एम्स नर्सिंग कर्मचारियों सहित देश के अलग-अलग राज्यों में भी इस वर्ग को हड़ताल क्यों करना पड़ा है? इसके बुनियादी कारण क्या हैं? आर्थिक संकट, नौकरी संरक्षण, व्यापक बेरोजगारी, बेहतर प्रशिक्षण कौशल की कमी, कार्य समय में अनियमितता, उचित वेतनमान आदि मुख्य कारण हैं।
इसलिए सरकारों को चाहिए कि वे इस वर्ग को मजबूती प्रदान करने के लिए और व्यापक स्तर पर काम करें। पहला काम यह होना चाहिए कि डिप्लोमाधारियों की जगह डिग्रीधारियों को प्राथमिकता दी जाए। नर्सिंग कॉलेजों में सीटें बढ़ाई जाएं, यूजी नर्सिंग विद्यार्थियों को रोजगार की बेहतर उपलब्धता कराई जाए। इसके अलावा, न्यूनतम वेतन और उच्चतम वेतन का नियम लागू हो।
फिर इस क्षेत्र में अनुसंधान एवं प्रशिक्षण निवेश हो, यूजी नर्सिंग के दौरान इंटर्नशिप अनिवार्य हो, सभी जिला मुख्यालयों में एक नर्सिंग कॉलेज खोला जाए, इनकी प्रोन्नति के मापदंड के तौर पर केवल अनुभव नहीं, बल्कि इनकी छोटी-छोटी उपलब्धियों को भी गिना जाना चाहिए। अगर सरकार इस प्रकार के सकारात्मक कदम उठाती है तो निश्चित रूप से हम एक बेहतर लोक स्वास्थ्य व्यवस्था को तैयार कर सकते हैं। साथ ही हम देश में नर्सिंग कर्मचारियों की कमी और इस क्षेत्र में शिक्षकों की कमी आदि को भी पूरा कर सकते हैं।
’सौरव बुंदेला, भोपाल, मप्र
आंदोलन से आगे
लोकतंत्र में जन आंदोलनों को तभी सफल और महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है, जब उसका नेतृत्व ऐसा व्यक्ति करे, जिस पर जनता पूरा भरोसा करे। उस आंदोलन में उसका कोई स्वार्थ न छिपा हो। इतिहास बताता है कि आजादी के लिए और आजादी के बाद जितने भी आंदोलन हुए थे, वे सार्थक और सफल नेतृत्व के कारण ही अपने उद्देश्यों में कामयाब हुए थे। जन आंदोलन एक सतत प्रक्रिया होती है, जो इच्छा से शुरू होकर अपना व्यापक स्वरूप धारण कर समाज में अधिकारों के प्रति जागरूकता लाती है।
लेकिन आज समाज में नैतिक मूल्यों का पतन हुआ है। आंदोलन देशव्यापी न होकर जातिगत और सामुदायिक हो गये हैं। अलग-अलग समाज के लोग जन आंदोलन का सहारा लेकर दिनचर्या को परेशानियों में डाल रहे हैं। तीन कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे किसान आंदोलन की आड़ में कुछ अन्य समूहों द्वारा भी अपना स्वार्थ पूरा किया जा रहा है। यह छिपा नहीं है कि दिल्ली के साथ राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के चारों ओर रहने वाले लोगों को रोजाना परेशानियां हो रही हैं।
अब जरूरत इस बात की है कि इस आंदोलन से जुड़े लोग और सरकार, दोनों सकारात्मक रुख अख्तियार कर सहमति के बिंदु पहुंचें, ताकि आमजन अपने रोजमर्रा के जीवन को पूर्ववत पटरी पर ला सकें।
’नरेश कानूनगो, गुंजुर, बंगलुरु, कर्नाटक
