पहले भ्रष्टाचार शब्द को एक गाली और नकारात्मक शब्द के तौर पर देखा जाता था। लेकिन आज ऐसा लगता है कि इसे मान-सम्मान का पर्याय बन गया है। जो जितना भ्रष्ट तरीके से धन कमा रहा है, उसे उतना बड़ा होशियार समझा जाता है। जो ईमानदार हैं, उनके बारे में एक उक्ति प्रचलित हुआ है कि किसी को गलत ढंग से धन कमाने का अवसर नहीं मिला, इसलिए वह ईमानदार है। भारत में कोई ऐसा क्षेत्र अछूता नहीं है, जहां भ्रष्टाचार का बोलबाला नहीं है। यह हमारे जीवन का एक अंग हो गया है।
इसके बिना कोई फाइल नहीं खिसकती, नौकरी, पढ़ाई, दवाई, कमाई नहीं होती है। हालत यह है कि जिसने इस गुण को धारण कर लिया, वह सुखी संपन्न, समृद्ध है। सांसद, विधायक, मुखिया से लेकर सरपंच या वार्ड पार्षद तक पर बिकने के आरोप लगते रहे हैं। थाने में पोस्टिंग मलाई मारने वाले थाने में पोस्टिंग के लिए बोली लगने की चर्चा होती रही है। मंत्रियों को लूट के लिए कमीशन, पैसा देने में कमीशन, काम में इंजीनियर को कमीशन, जमीन की निबंधन के लिए रजिस्टार को, गाड़ी परमिट के लिए एमवीआइ को, लोन के लिए बैंक प्रबंधक को, गांवों में विकास के लिए बीडीओ को… ज्यादातर मामलों में भ्रष्टाचार की खबरें आती रही हैं।
अनेक बड़े-बड़े महल, अटरिया, फार्महाउसों का निर्माण भ्रष्टाचार के धन से हो जाते हैं। महंगी गाड़ियां, विदेश दौरे आदि काली कमाई से हो रही है। अनेक भ्रष्टाचारी पकड़े गए हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचारियों में भय नहीं है। आम आदमी इस भ्रष्टाचार के खेल में पिस रहा है। इसकी प्रतिस्पर्धा में वह केवल टुकुर-टुकुर ताक रहा है, आह भर रहा है और उसे ग्लानि हो रही है कि शायद यह जीवन व्यर्थ ही जाएगा। अगर जिम्मेवार लोग अपनी बुरी आदतों से बाज नहीं आएंगे तो गैरजिम्मेवार की कौन कहे? डा लोहिया ने कहा था सिंहासन और व्यापार के बीच संबंध भारत में जितना दूषित, भ्रष्ट और बेईमान हो गया है, उतना दुनिया के इतिहास में कहीं नहीं हुआ है।
- प्रसिद्ध यादव, बाबूचक, पटना, बिहार
