उत्तर और दक्षिण भारत के बीच जैसा तीखा राजनीतिक विभाजन दिखाया जाता रहा है, सांस्कृतिक व आध्यात्मिक रूप से देखें तो धर्म और संस्कृति की एक समान धारा बहती है। विश्वनाथ मंदिर के गलियारे में इडली-सांबर की दुकानों के बीच ‘प्राचीन काल’ से वहां बसे अन्ना बताएंगे कि उत्तर भारत स्थित शिव की इस नगरी की दक्षिण भारत में कितनी आस्था है। आज उत्तर भारत में भारतीय जनता पार्टी धर्म की राजनीतिक फसल काट ही नहीं पाती अगर दक्षिण से शंकराचार्य ने हिंदू धर्म को सांस्थानिक रूप नहीं दिया होता। भारत के भूगोल की चारों दिशाओं पर पीठ स्थापित कर उन्होंने हिंदू धर्म को मानक संस्थान दिया। शंकराचार्य ने कम उम्र में जिस दैवीय गति से देश की चारों दिशाओं का भ्रमण कर एकात्म हिंदू धर्म की ध्वजा फहराई उसी की देन है कि भाजपा के आदि पुरुष आडवाणी रथयात्रा शुरू कर सके। चुनावी मौसम में देश की दो दिशाओं की राजनीतिक बहस के मद्देनजर उत्तर व दक्षिण भारत को धार्मिक व सांस्कृतिक पुल से जोड़ने वाले शंकराचार्य की विरासत पर प्रस्तुत है बेबाक बोल

हिंदी हृदय प्रदेश में भाजपा की बंपर जीत के बाद विपक्ष ने दक्षिण को लेकर उम्मीद जताई। वहीं संसद के बजट सत्र में प्रधानमंत्री ने कहा कि देश को उत्तर-दक्षिण में बांटने की बातें बंद हों। लोकसभा चुनाव के पहले 2024-25 के अंतरिम बजट पर हैरानी जताई गई। 2019 में जब राजग सरकार ने वोटरों को आकर्षित करने के लिए अंतरिम बजट का भरपूर इस्तेमाल किया था तो 2024 का अंतरिम बजट शब्दश: अंतरिम क्यों है? क्या इसका एक कारण राम मंदिर से मिला आत्मविश्वास है? अब सवाल है कि दक्षिण में बंद कपाट की कुंजी भाजपा कहां से लाएगी?

इस सवाल के जवाब के लिए चलते हैं केदारनाथ और ओंकारेश्वर। केदारनाथ में आदि शंकराचार्य की मूर्ति की पूजा करते हुए प्रधानमंत्री संदेश दे ही चुके थे। वहीं ओंकारेश्वर में शंकराचार्य की 108 फुट ऊंची प्रतिमा का आधिकारिक नाम ‘स्टैच्यू आफ वननेस’ है। जो उत्तर में राम को लाने का दावा कर रहे हैं उनके लिए दक्षिण में जाने के लिए धर्म सेतु तो हिंदू धर्म के आदि-पुरुष शंकराचार्य बना चुके थे।

आज हम जिस ‘हिंदू धर्म’ की बात करते हैं वह एक धार्मिक संस्थागत रूप में है तो इसकी आधारशिला शंकराचार्य ने रखी थी। 1984 में दो संसदीय सीटों पर सिमटी भाजपा के आदि-पुरुष ने इसी ‘एकात्मता’ को साधने का प्रयोग किया जो राजनीति की परखनली में 2014 और 2019 में प्रचंड बहुमत का उत्पाद लाया। भाजपा के संस्थापक सदस्य रथयात्रा निकाल ही नहीं पाते अगर शंकराचार्य ने हिंदू धर्म को सांस्थानिक रूप नहीं दिया होता। आज अगर उत्तर भारत के मंदिर में श्रीराम की श्यामवर्ण प्रतिमा उत्तर से दक्षिण की संस्कृति का गठबंधन है तो इसकी गांठ बांधने वाले शंकराचार्य थे।

भाजपा के आदि-पुरुष लालकृष्ण आडवाणी आज ‘भारत-रत्न’ हैं तो इसलिए कि उन्होंने समझ लिया था कि भारत जैसे आस्थावान देश में धर्म हिंदुओं का निजी विषय नहीं हो सकता है। धर्म का उदय ही परिवार और समाज को सांस्थानिक रूप देने के लिए हुआ। मूल रूप से धर्म और आस्था निजता की सीमा के परे सामाजिकता के समीकरण से आए थे।

भारतीय संदर्भ में देखें तो यहां धार्मिक एकता परिभाषित नहीं थी। इसकी परिभाषा की पाठशाला के आदि अध्यापक शंकराचार्य हैं। उत्तर भारत में भले ही शंकराचार्य के उत्तराधिकारियों पर तात्कालिक विवाद खड़ा कर दिया गया, लेकिन ओंकारेश्वर में खड़ी की गई आदि पुरुष की 108 फुट की मूर्ति कह रही है कि उसे भाजपा के विमर्श गढ़ने पर पूरा भरोसा है। वह दक्षिण भारत में उसी समझदारी के साथ जाएगी जिस तरह से अस्सी के दशक में उत्तर भारत में आई थी। काशी तमिल संगमम से लेकर रामेश्वरम तक में स्नान बता रहा है कि आदि शंकराचार्य की खड़ी की गई हिंदू धर्म की संस्था एकात्मक रूप में ही आगे बढ़ाई जा सकती है।

भारत और उससे जुड़े सनातन धर्म के लिए सबसे खूबसूरत अभिव्यक्ति है-विविधता में एकता। हिंदू धर्म में इतनी सारी विविधता के साथ एकात्मता की खूबसूरती लाने वाले थे शंकराचार्य। वैदिक धर्म की वर्णव्यवस्था, ब्राह्मण धर्म का विस्तार उत्तर से लेकर दक्षिण में एक जैसा नहीं था। आज उत्तर और दक्षिण भारत के हिंदू धर्म की एकता के बीच में शंकराचार्य हैं जो पहली बार धर्म को संगठित कर रहे थे। वैदिक धर्म के ज्ञान को संग्रहित कर शंकराचार्य ने हिंदू धर्म की धार्मिक व सांस्कृतिक पूंजी को सुरक्षित किया।

शंकराचार्य ने शिव के जरिए भारत के भौगोलिक नक्शे पर चार धाम स्थापित किए। इन चार धामों को भारत की धार्मिक अस्मिता की चौहद्दी बना कर उन्होंने हिंदू धर्म का प्रचार-प्रसार किया। धर्म को स्थापित करने के लिए उन्होंने भ्रमण और अध्ययन का सहारा लिया। शंकराचार्य वाद-विवाद और तर्क के लिए जाने जाते हैं।

तर्क और शास्त्रार्थ की शुरुआत ही इसलिए हुई ताकि धर्म पर बहस कर उसे लेकर जनमत का निर्माण हो। शास्त्रार्थ में जीत-हार व्यक्तिगत स्तर पर तय करना मुश्किल होता था, लेकिन धर्म और उसकी मान्यताओं का जीतना और आगे बढ़ना तय होता था। उन्होंने विरोधी पंथ की बातों को संयम से सुना और हिंदू धर्म की पुनर्स्थापना का खाका खींचा।

शंकराचार्य और शास्त्रार्थ की दंतकथाओं पर ही नजर डालेंगे तो किस तरह गृहणियों तक ने शास्त्रार्थ में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया और आदि पुरुष के धार्मिक ज्ञान को चुनौती दी। धर्म और उसके शास्त्र को लोककथाओं तक पहुंचा कर शंकराचार्य ने उसे इतिहास की स्मृति का हिस्सा बना दिया। वे अपने भ्रमण मार्ग पर हिंदू धर्म को मील का पत्थर की तरह स्थापित करते चले गए।

हम उस समाज की कल्पना करें, जहां ज्ञान-विज्ञान घर-घर में बिखरा हुआ हो लेकिन वहां विद्यालय जैसा कोई सामूहिक संस्थान नहीं हो। फिर उस समाज के लोग किस तरह से समान इतिहास, विज्ञान और साहित्य पढ़ पाएंगे। इसके पहले हिंदू धर्म की यही स्थिति थी। अन्य धर्मों का प्रभाव तात्कालिक समय पर पड़ चुका था और ऐसी कोई पाठशाला नहीं थी जहां से हिंदू धर्म के लोग धर्म के मानकीकृत रूप का प्रमाणपत्र लेकर आएं। वेदों के प्रति अनास्था का दौर आ गया था।

जिन वेदों की उत्पत्ति करोड़ों साल पहले की बताई गई उसकी ऋचाएं विस्मृत हो रही थी। षट दर्शन, जैन, बौद्ध, चार्वाक के दर्शनों की गूंज चहुंदिशा में थी। बौद्ध धर्म हिंदू शासकों के आकर्षण का नया केंद्र बन चुका था। इसलिए आम जनता भी उसकी तरफ आकर्षित हो रही थी। जब शासक ही आदि धर्म से विमुख हो जाए तो फिर उसे कौन बचाता? केंद्रीय धर्म के अभाव में भारत के भूगोल की परिधि में एक अराजकता की स्थिति सी आ चुकी थी।

शंकराचार्य के चार मठ न होते तो शायद सब कुछ आज इतने समृद्ध और सतत रूप में नहीं बचता। शंकराचार्य ने भारत के भूगोल की चारों दिशाओं पर मठ स्थापित कर हिंदू धर्म को मानकीकृत करने का स्कूल खोल दिया था। अब चारों दिशाओं के लोग हिंदू धर्म का एकरूप पाठ पढ़ सकते थे।

सत्ताधारी राजनीति धर्म, संस्कृति की लंबी परंपरा का हवाला देकर धार्मिक आस्था को मूल विषय बना चुकी है। श्रीराम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के बाद अबकी बार चार सौ पार का दावा कर रही है। इसके लिए धर्म की फसल काटना इतना आसान नहीं होता अगर देश के चारों कोनों पर शंकर आराध्य नहीं बन चुके होते। आज जिसे हम राम-पथ कह रहे रहे हैं उसकी बुनियाद में शिव के अलग-अलग रूप हैं। शिव और शक्ति इन दोनों के आधार पर अलग-अलग देवी-देवता हुए, धार्मिक परंपराएं हुईं। शिव को आधार बना कर शंकराचार्य ने हिंदू धर्म को संगठित शक्ति बनाया।

हिंदुओं के ज्यादातर प्राचीन देवालय शिव और शक्ति (दुर्गा, काली के रूप) के हैं। श्रीराम के प्राचीन देवालय इसलिए नहीं मिलते हैं क्योंकि वो अवतार हैं। धार्मिक, आध्यात्मिक साहित्य के सगुण से लेकर निर्गुण रूप तक श्रीराम की अखिल भारतीय व्याप्ति रही है। हिंदू धर्म वह विचार है जिसे शंकराचार्य ने सैकड़ों साल पहले संगठित कर लिया था। हिंदू धर्म का उदय अचानक से 1980 के बाद नहीं हुआ था।

हां, 1980 के बाद राजनीति का वह स्कूल स्थापित हुआ जिसने शंकराचार्य के स्थापित स्कूल की अहमियत समझी थी। पिछले दिनों हिंदू धर्म की वैचारिक विरासत को जिस तरह आदि पुरुष के उत्तराधिकारियों से काटने की कोशिश की गई वह राजनीतिक टकराहट में अपनी टक्कर को जोरदार करने का क्षणिक प्रपंच भर था। उत्तर भारत के हृदय प्रदेशों के विजेता जब दक्षिण के दुर्ग में प्रवेश करेंगे तो वहां के कपाट की कुंजी भारत के उत्तर और दक्षिण को एकात्म धार्मिक हृदय देने वाले शंकराचार्य ही होंगे।