हम गेहूं, गन्ने जैसी फसलों की तरफ अंधाधुंध भागे जिसने हमारी मिट्टी से लेकर शरीर की सेहत खराब की। अगर देश का हर नागरिक जान जाए कि एक किलो गेहूं का आटा और एक किलो शक्कर बनने में कितना पानी लगता है तो वह उन नीतियों पर सवाल उठाएगा कि क्यों हमारे बाजरा जैसे श्री अन्न को मोटा अनाज कहा गया। पटेल बाजरा वर्ष को वैसी क्रांति के रूप में देख रहे हैं जो हरित क्रांति के बाद की गई गलतियों को सुधारने का काम करेगा। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने पुराने जलस्रोतों को बचाने से लेकर नए जलस्रोत बनाने का काम किया है। अनाज और पानी पर इस महत्त्वपूर्ण बातचीत का संचालन किया कार्यकारी संपादक मुकेश भारद्वाज ने।
पंकज रोहिला: योग के बाद बाजरा। संयुक्त राष्ट्र के 2023 को बाजरा वर्ष घोषित करने के बाद इसे श्री अन्न के नाम से पुकारा जा रहा है। लेकिन, पैदावार, प्रसंस्करण और बाजार के हिसाब से बात करें तो उत्साहजनक नतीजे नहीं दिख रहे। आप इसे कैसे देखते हैं?
प्रहलाद सिंह पटेल : अच्छी बात है कि दुनिया के खाद्य वैज्ञानिकों ने हमारे श्री अन्न का पहली बार प्रमाणीकरण किया। बुजुर्ग तो जानते थे और मानते थे कि यह हमारा आदर्श भोजन है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2017 में दुबई के अंतरराष्ट्रीय मेले में ये बात कही थी। उन्होंने 2018 में भारत में बाजरा वर्ष घोषित किया। 2021 में पांच मार्च को संयुक्त राष्ट्र ने 2023 को अंतरराष्ट्रीय बाजरा वर्ष घोषित किया। 2017 से 2023 तक की यह यात्रा कितनी उत्साहजनक है। अभी यह कहने में हिचक हो रही, क्योंकि इसके अनर्थ भी निकलेंगे कि हमने मात्रा पर बहुत जोर दिया, लेकिन गुणवत्ता के बारे में कुछ नहीं किया। गेहूं और धान जैसी फसलों में आगे बढ़े। इनमें इतना पानी लगता है, जिसकी कोई कल्पना नहीं कर सकता। एक किलो शक्कर, एक किलो चावल और एक किलो आटा बनने में कितना पानी लगता है यह देश के हर नागरिक को मालूम होना चाहिए। मोटा अनाज सबसे कम पानी में पैदा होने वाली फसल है। कोदो के बीज की उम्र पंद्रह साल तक है। दुनिया में उसके मुकाबले उम्र रखने वाला दूसरा बीज नहीं है। रागी सबसे खराब जमीन में पैदा होगी, सबसे कम पानी लगेगा, सबसे कम समय में पकेगी। यह 62 दिन में पकती है और गेहूं की फसल 120 दिन में पकती है। मुझे लगता है कि पहले हमने गलत रास्ता अपनाया। अगर हम निर्यात कर रहे हैं तो शक्कर का कर रहे हैं, आटे का कर रहे हैं। ये खर्चीली चीजें हैं। एक तरह से हम पानी बेच रहे हैं। हमने मात्रा का जो भूत अपने दिमाग पर चढ़ाया उसने हमें बहुत नुकसान पहुंचाया
मृणाल वल्लरी : सरकार चीजों को दर्शनीय बनाने में भरोसा करती है। बाजरे को ‘श्री अन्न’ कह देना ही बड़ी उपलब्धि हो जाती है। ‘श्री अन्न’ भी नायक चुनकर उसे भुनाने की रणनीति का हिस्सा भर बन कर तो नहीं रह जाएगा?
प्रहलाद सिंह पटेल : श्री अन्न नाम तो पहले से था। दक्षिण में किसी भी तरह के अन्न को श्री अन्न कहते हैं। हमारे यहां मोटा अनाज नहीं कहते थे। यह चलन तो 1962 के बाद आया है। उसके पहले कोई गेहूं की चर्चा नहीं करता था। इसे गरीबों का अनाज कहने वाला कौन था? गेहूं का बाजार बनाने में हम इतना गिरे कि मोटा अनाज को गरीबों का अनाज बता दिया। ये कहने वाले हम नहीं थे, कोई और लोग थे। आज की तारीख में हम दुनिया का चालीस फीसद ‘मिलेट्स’ पैदा करते हैं। बाजरे की मात्रा ज्यादा है। आप बर्फ से लेकर पहाड़ से लेकर मरुस्थल तक चले जाइए, मोटा अनाज सब जगह पैदा होता है। बाकी फसलें नहीं होतीं। ये चीजें हमारे लिए अहम हैं। आज की तारीख में बाजरा ही सबसे ज्यादा है। रागी आपके पास नहीं, कोदो आपके पास नहीं। जगनी तो आदिवासी क्षेत्रों के अलावा कोई पहचान नहीं पाएगा कि है क्या? चीजें हैं तो उसका प्रचार करना होगा। अभी लोग खुद पैदा करते हैं खाने लायक। मैंने अपने खेत में रागी उपजाई तो खरीदार नहीं मिला। एक समय वो था और आज रागी ढाई सौ ग्राम तौल कर मिल रही। यह देखने की नहीं पूरी तरह अपनाने की बात होगी। लोग समझ रहे हैं।

सूर्यनाथ सिंह : गेहूं कोई और पैदा करता है तो दलिया कोई और बनाता है। क्या किसानों के लिए ऐसी कोई व्यवस्था नहीं हो सकती कि खाद्य-प्रसंस्करण का काम खुद कर सकें?
प्रहलाद सिंह पटेल : इसके लिए मैं प्रधानमंत्री का आभारी हूं। उन्होंने देखा कि हमारा सिर्फ विभाग था। मंत्रालय बनाने का काम प्रधानमंत्री ने किया। प्रधानमंत्री ने किसान संपदा योजना इसी भावना से शुरू की। आज के समय में यह हमारी सबसे लोकप्रिय योजना है। ‘यूनिट स्कीम’ का लाभ हजार से ज्यादा लोग ले चुके हैं। ‘मेगा फूड पार्क’ योजना की विफलता और कमजोरियों को देख कर यह शुरू हुई। फिर प्रधानमंत्री सूक्ष्म उद्यम योजना शुरू हुई। अभी 24 लाख छोटे खाद्य-प्रसंस्करण खंड काम कर रहे हैं। यह सौ फीसद असंगठित क्षेत्र है। कोई घर में पापड़ बना रहा है, अचार बना रहा है। इसलिए एफपीयू बन गए। बाद में कहा गया कि जो भी व्यक्ति छोटा उद्यमी है वो दस लाख का कर्ज लेगा तो उसे पैंतीस फीसद सबसिडी मिलेगी। प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि हम बाजार बनाने के लिए मंच दें। नाफेड जैसी संस्था आगे आए कि कम से कम उन्हें बुनियाद मिलेगी, उसके बाद वो आनलाइन जाएं, दुनिया में कोई सीधे लेना चाहे तो नाफेड से करार का कोई बंधन नहीं। उससे बेहतर कीमत पर अगर समूह से सीधे कोई लेता है तो उसे दे सकता है। प्रधानमंत्री ने कहा कि दुनिया भर में मांग है भारतीय खान-पान की। लेकिन बाजार की दृष्टि से कोई भी भारतीय कंपनी दुनिया में नहीं है। हमें अपनी गुणवत्ता का बाजार बनाना होगा। फिर हमने खाद्य-प्रसंस्करण में काम करने वाली कंपनियों की सूची देखी। जब मैंने सूची मांगी तो 27 से शुरू हुई और बमुश्किल 103 पर पहुंच पाई। तुरंता खाद्य से लेकर जैविक आहार के लिए हमने काम शुरू किया। अब हम बजट के भरोसे नहीं हैं। पैसा खत्म होने पर वैकल्पिक स्थिति बनाई है। ‘मिलेट’ उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए मंत्रालय ने उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआइ) योजना में 30 प्रस्तावों को अनुमोदित किया है। ‘मिलेट’ को दस राज्यों के 19 जिलों में एक जिला एक उत्पाद ओडीओपी बनाया गया है।
मुकेश भारद्वाज : शहरों में एक तरफ बड़ी आबादी पीने के पानी के संकट से जूझ रही तो एक बड़ा तबका बगीचे से लेकर कार साफ करने में उसका इस्तेमाल करता है। पीने के पानी के संकट से लेकर उसकी इस बर्बादी पर आपकी क्या योजना है?
प्रहलाद सिंह पटेल : मैं हमेशा कहता हूं कि निजी तौर पर जितना पानी हम साल भर में इस्तेमाल करते हैं, उतना जमीन में डाल दें तो हालात बदल जाएंगे। मैंने नौजवानों से कहा, आपके पास जमीन नहीं है, ट्यूबवेल मर गए हैं, हैंडपंप स्मारक बने हैं उन्हें खोल कर आप ‘रिचार्जिंग पिट’ की तरह काम कर सकते हैं। गांवों में हम प्रति व्यक्ति 55 लीटर पानी दे रहे हैं। पांच का परिवार है तो पौने तीन सौ लीटर। उसमें से पचास लीटर ‘ग्रे वाटर’ बनाकर चौबीस घंटे में उसे फेंक देना है। पांच हजार की आबादी का गांव या उससे ज्यादा का होगा तो आप मान कर चलिए कि आपको तकनीकी रूप से जाना पड़ेगा। अन्यथा देसी तरीके से उसका उपयोग कर सकते हैं जो अभी शुरू हुई है। ‘ग्रे वाटर’ का मकसद है कि हम एक जगह पर गांव का पानी ले जाएं। चिन्मय मिशन ने कुंभ मेले में इसका इस्तेमाल किया था। इसके लिए सिर्फ हम सबकी सहमति की जरूरत है। उससे ऊपर जनसंख्या होगी तो हम जो शहरों का हाल देख रहे हैं, ‘एसटीपी प्लांट’ लगाए बगैर काम नहीं हो सकता है। सबसे बड़ा ‘एसटीपी प्लांट’ दिल्ली में बनकर तैयार है। हम ये दावा कर सकते हैं कि दिल्ली से लेकर मथुरा के बीच में यमुना साफ रहेगी उस संयंत्र के शुरू होने के बाद। ‘ग्रे वाटर मैनेजमेंट’ हो या ‘कैच द रेन’ दोनों पर सरकार का पूरा ध्यान है।
महेश केजरीवाल : जिस तरह देश की आबादी बढ़ रही है, पर्यावरण संकट का असर हो रहा है तो पूरी जनसंख्या को उपभोग के लिए पानी कैसे उपलब्ध करवाएंगे।
प्रहलाद सिंह पटेल : 2024 तक सबको साफ पानी देने का मोदी जी का संकल्प पूरा होगा, इसमें कोई शंका नहीं है। कुछ राज्यों को छोड़ दें जिन कारणों से देरी हो रही है अन्यथा मुझे नहीं लगता कि कुछ कमी हो रही है। पैसा भी पर्याप्त है। आज 55 लीटर देने के बाद भी काम नहीं चलेगा। किसी एजंसी के मानदंड की जरूरत नहीं है। मैं गांव के आदमी से कहता हूं कि जब शौचालय नहीं था तब आप कितने पानी का निस्तार करते थे? मैं बुंदेलखंड से आता हूं तो मैंने कहा कि जब आपके बेटे की शादी होगी होगी और आपके पास शौचालय एक से दो होंगे तो आपके पास कितना पानी होगा? मोदी सरकार ने इस बात को गंभीरता से लिया और कहा कि आजादी के बाद के 75 अमृत सरोवर को खोदना है। राज्यों की सरकारों ने 70 के दशक में कभी मिट्टी खुदवाने का काम किया था, उसके बाद जितना मेरा अनुभव है कभी भी किसी सरकार ने जलस्रोत खड़ा करने का काम नहीं किया। मोदी सरकार जलस्रोत को बचाएगी भी और बढ़ाएगी भी। पानी पर संवेदनशीलता और गंभीरता है।
दीपक रस्तोगी : देश में जलस्रोतों का अतिक्रमण बड़ा मुद्दा है। इसके लिए सरकार की क्या रणनीति है?
प्रहलाद सिंह पटेल : सारे जलस्रोतों की जियोट्रैकिंग हो चुकी है। पानी राज्य का विषय है। हमने निशानदेही करके भेज दी कि आपके जलस्रोत हैं जो पुराने थे। आज की स्थिति ये है, अब आप तय कीजिए कि इसे अतिक्रमण मुक्त कैसे करवाना है आपको। करना राज्य को है। जलजीवन मिशन भी राज्य सरकार का काम नहीं था, लेकिन प्रधानमंत्री ने किया। यह भी संदेश के रूप में जाना चाहिए कि राज्यों को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी होगी। कमलनाथ जी ने प्रधानमंत्री आवास वापस कर दिए, क्योंकि उसमें प्रधानमंत्री का नाम था। जलजीवन मिशन को नुकसान पहुंचाया कि प्रधानमंत्री को श्रेय मिलेगा। सरकार अगर पैसा दे रही थी तो वापस कर दिया कि हम इसमें अंशदान नहीं कर सकते। यह राज्य-केंद्र संबंधों को ठेंगा दिखाने की कोशिश है। हम अपने श्रेय के कारण देश के कमजोर तबके का नुकसान कर दें या अपनी जिम्मेदारी से हट जाएं तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है।
पंकज रोहिला: पानी की गुणवत्ता नियंत्रित करने के लिए कितने काम हुए हैं?
प्रहलाद सिंह पटेल : सबसे अहम यह है कि गांव के स्तर पर पानी की समिति बनाई गई है। इनमें 50 फीसद महिलाओं की संख्या अनिवार्य है। इसके साथ ही सभी आर्सेनिक और फ्लोराइड प्रभावित बसावटों को जल जीवन मिशन की छतरी के अंदर ले आया गया है। अब देश का कोई भी नागरिक आर्सेनिक और फ्लोराइड युक्त पानी पीने के लिए मजबूर नहीं है।
मृणाल वल्लरी: ‘गंगा विलास’ के नदी में उतरने के बाद इस तरह की गतिविधियों पर सवाल उठे। मुहाने पर लगे शिविर भी प्रदूषण का कारण बन रहे।
प्रहलाद सिंह पटेल : हमारा संकल्प साफ है कि गंगा में एक बूंद गंदा पानी नहीं जाना चाहिए। तटीय इलाकों में एक से दो किलोमीटर के दायरे में गतिविधियों के नियम तय हैं। और यह सभी नदियों के लिए है। शिविर लगाने की इजाजत है, लेकिन आप पानी में प्रदूषक नहीं गिरा सकते। इस तरह की कोई सलाह आती है तो सरकार इसे सकारात्मक तरीके से लेकर काम करने के लिए तैयार है। नदी को साफ रखने में सुधार की हर गुंजाइश पर हम काम कर रहे हैं।
सुशील राघव : 2024 से पहले आपके राज्य मध्य-प्रदेश में सेमीफाइनल है। इसे कितनी बड़ी चुनौती मानते हैं?
प्रहलाद सिंह पटेल : हर चुनाव महत्त्वपूर्ण होता है। राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश ये वैसे राज्य हैं, जहां पार्टी का काम मजबूत है। हम यहां पर तब सरकारें बना रहे थे, जब कोई नहीं बना पा रहा था। हम 200 पार का संकल्प पूरा करेंगे।
