अंबाला रेलवे स्टेशन पर रेल की प्रतीक्षा में एक प्रख्यात कलाकार द्वारा बनाई गई पेंटिंग ‘रिफ्यूजी ट्रेन लेट 16 घंटे’, विभाजन आधारित कला-साहित्य का एक विलक्षण पृष्ठ बन गई। उन परिस्थितियों की जो प्रस्तुति यशोधरा डालमिया ने अपनी टिप्पणी में दी है, उसे एक अद्भुत व प्रामाणिक गवाही मान लिया जाना चाहिए। ‘तैल चित्र रिफ्यूजी ट्रेन लेट 16 एचआरएस (1947) में, हम पुरुषों और महिलाओं के एक समूह को एक-दूसरे से सटे हुए देखते हैं जो अलग-अलग भाव-भंगिमाएं व्यक्त करते हुए, उस ट्रेन का इंतजार कर रहे हैं जो उन्हें सीमा पार ले जाएगी। बीच में एक पुरुष और एक महिला आखिरी आलिंगन में लिपटे हुए हैं, क्योंकि उनका भविष्य अनिश्चित है, और पता नहीं वे फिर मिलेंगे भी या नहीं?

कलाकार कृष्ण खन्ना की अपनी विभाजन की यादें आज भी उतनी ही जीवंत हैं। ‘हम दो गाड़ियों में सवार होकर सीधे शिमला पहुंचे (जहां उस शिक्षा विभाग में उनके पिता सरकार में उपनिदेशक थे, जिसकी स्थापना अभी होने वाली थी) मैं वापस नहीं जा सकता था। लाहौर में शामें चीख-पुकार से कराहती रहती थीं क्योंकि एक के बाद एक इलाके आग के हवाले होते रहते थे। यह आज भी मुझे सताता है और मुझे स्थिर रखता है।’ कृष्ण खन्ना अपनी कूची से ‘दी मैमोरी आफ 1947’ की अभिव्यक्ति में लगे थे। अराजक परिस्थितियां और विभीषिका का दर्द उनके चित्रों में विलाप कर रहा था। उन्होंने अपने चित्रों में इधर-उधर बिखरी लाशों और मृत्यु व हताशा को शब्दों से भी अधिक तीव्रता के साथ बयान कर डाला था।

कला का असली लक्ष्य, सौंदर्य से आगे संदेश और बदलाव तक पहुंचने की चुनौती

कृष्ण खन्ना अपने जीवन के सौवें वर्ष में प्रवेश कर गए हैं। जन्म फैसलाबाद (उस समय का लायलपुर) में पांच जुलाई, 1925 को हुआ था और शुरुआती दौर की शिक्षा गवर्नमेंट कालेज लाहौर से पाई थी। वर्ष 2011 में पद्मभूषण से सम्मानित खन्ना की कूची आज भी चलती है। लाहौर से उच्च शिक्षा के लिए इंपीरियल सर्विस कालेज इंग्लैंड में चले गए थे और लौटे तो मुंबई का ‘ग्रिंडलेज बैंक’ उनकी प्रतीक्षा में था। वर्ष 1961 में उन्होंने इसी बैंक की भारी भरकम वेतन वाली नौकरी छोड़ दी। नौकरी छोड़ने के बाद वे बैंक की विशाल इमारत से बाहर निकले, तो मुख्य द्वार पर कला की दुनिया की ओर से स्वागतार्थ देश के समकालीन शिखर चित्रकार मौजूद थे।

कृष्ण खन्ना का परिवार विभाजन के समय पहले लाहौर से शिमला, फिर दिल्ली आया। वहां से मुंबई चले गए। बाद के वर्षों में इस कलाकार ने रामायण, महाभारत और अन्य मिथक-कथाओं, पैराणिक गाथाओं पर जो चित्र बनाए, उन्हें आज भी विलक्षण माना जाता है। सौवें वर्ष में प्रवेश के साथ कूची अब भी चल रही है। 2005 में कृष्ण द्वारा बनाई गई ‘दी लास्ट बाईट’ की चर्चा कला की दुनिया में आज भी भरपूर होती है। कृष्ण खन्ना की एक और बहुचर्चित पेंटिंग ‘शरशैय्या पर लेटे भीष्म के गिर्द एकत्र पांडवों’ पर आधारित है। उनका एक और चित्र भी चर्चा का विषय बना था, जिसमें उन्होंने महात्मा गांधी की हत्या पर अखबारों में डूबे हुए अवसाद भरे लोगों के चेहरों को कूची से उजागर किया था। कई हाथों में जाने के बाद यह कृति अब भारतीय कला की आगामी सोथबी-नीलामी में रखी गई है।

महिलाओं में बदलाव की झंडाबरदार इला रमेश भट्ट

खन्ना द्वारा बताई गई हर कहानी में एक मोड़ होता है। उनके बाइबिल के पात्र समकालीन भारत से अपना रंग-रूप लेते हैं और उनका अर्जुन मध्ययुगीन शूरवीरों के कवच को अच्छी तरह से धारण कर सकता है। उनकी नवीनतम कृति ‘लास्ट बाइट’ में ग्यारह भारतीय चित्रकारों का एक समूह है जो एक चाय के ढाबे पर गुंडों और मजदूरों की वेशभूषा में बैठे हैं तथा ईसा मसीह जैसे दिखने वाले हुसैन हाथ में कप पकड़े हुए हैं जो ‘अंतरराष्ट्रीयवादियों’ और उन लोगों के बीच बहस को संतुलित कर रहे हैं जो अपनी कला को स्वदेशी भू-भाग में स्थापित करना चाहते हैं। खन्ना आपको अपने चित्रों की व्याख्या करने के लिए छोड़ देते हैं और शरारती ढंग से कहते हैं, ‘मुझे थोड़ी अनिश्चितता का गुण पसंद है।’