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चर्चाः सिनेमा में साहित्य की आवाजाही

साहित्यिक कृतियों पर फिल्में बनाने का चलन पुराना है। अनेक बड़े फिल्मकार कहानियों, उपन्यासों आदि से प्रभावित हुए और उन्होंने अपनी कलात्मकता से उन्हें फिल्म के रूप में ढालने का प्रयास किया। कई रचनाओं ने इस कदर प्रभावित किया कि उन पर कई फिल्मकारों ने अलग-अलग फिल्में बनार्इं। उनमें से कुछ निस्संदेह कला की दृष्टि से सराहनीय हैं, पर अनेक पर आरोप लगते रहे कि फिल्मकार ने रचना के साथ न्याय नहीं किया। हालांकि दोनों माध्यमों के अलग मिजाज हैं, फिर भी इनका परस्पर संबंध क्षीण नहीं होता। आखिर वह क्या चीज है, जो किसी रचना पर फिल्म बनाते समय फिल्मकार के रास्ते में बाधा बनती है! इस बार की चर्चा इसी पर। – संपादक

मुरलीधर वैष्णव की कविता : चींटी का उपकार

चींटी बिल पानी में डूबे, लगीं मचाने वे भी शोर, पत्तों की नावें तब आर्इं, ले चलीं उन्हें पेड़ों की ओर

उपासना बेहार की लिखी कहानी : दाखिला

मां ने कहा-डॉक्टर साहब हम दोनों को ही पढ़ना नहीं आता है, आप ही पढ़ कर बता दें कि इसमें क्या लिखा है और कहां अंगूठा लगाना है।

जानकारी कॉलम में प्रकीर्तिमा का लेख : काजग की कला

कलाकार को पेपर फोल्डर कहते हैं। पेपरफोल्ड करके विभिन्न प्रकार की डिजाइनें बनाने की कला को जापानी भाषा में ओरिगेमी कहा जाता है।

जनसत्ता रविवारी में फिरोज बख़्त अहमद का लेख : निरे मुक्केबाज नहीं थे अली

जिस अमेरिकी सरकार ने आगे चलकर अली को आंखों का तारा बनाया, उसी ने सत्तर के दशक में अली को ‘वियतनाम की लड़ाई से भागने’ के जुर्म में उन्हें तीन साल तक जेल में बंद रखा था। पिछले तीन जून को उनका निधन हो गया। उनकी खेल-यात्रा के बारे में बता रहे हैं-फिरोज बख़्त अहमद।

रमेश प्रजापति की कविताएं : उठना, यात्रा व सरसों का फूलना

चिरमिराने लगती हैं कोल्हुओं में पिरती सरसों से, वह सिर्फ संजय की आंखों से देखता है

कहानी : वह फिर नहीं लौटा

खूब अच्छी सुबह, गुलाब के फूलों की तरह खिली हुई सुबह, चिड़ियों की चहचहाट से भरी सुबह, तुलसी चौरे पर जल चढ़ाती सुबह, दादी मां के हृदय से उठते पवित्र मंत्र से गूंजती सुबह, मंत्र उच्चारण से आसपास के घरों में आध्यात्मिक चेतना को अंतश्चेतना में भिगो देने वाली सुबह, कुएं में उतरती-डूबती बाल्टी की रस्सी पकड़ कर खींचती सुबह, कुएं की घिर्रियों की चूं-चहट के साथ मन में संगीत घोलती सुबह, सचमुच की सुबह, खूब अच्छी सुबह, अब सुबह में नहीं होती।

गीत : उड़न तश्तरी

चुन्नू भैया भोले भाले, खेल दिखाते बड़े निराले, है इनका दिमाग अलबेला, नए नए खेलों का मेला

जानकारी : दीवार के पार

दुर्गम पहाड़ी इलाकों में सीमा असुरक्षित हिस्सों में अगर किसी मानव की आवाजाही होती है तो सेंसर बीप करने लगते हैं, जिससे प्रहरी सजग हो जाते हैं।

कहानी : सोना गिलहरी की बहादुरी

इस बीच गिलहरी भी मन ही मन योजना बना चुकी थी कि उसे सांप का मुकाबला किस प्रकार करना है। सांप को आगे बढ़ता देख कर वह तत्परता के साथ सांप की पूंछ की ओर दौड़ी।

इकबाल रिजवी का लेख : कठोरता की मिसाल

यों तो ललिता पवार ने अपने अभिनय की शुरुआत बाल कलाकार से की थी। बड़े होकर उन्होंने कई फिल्मों में अभिनेत्री भी रहीं। लेकिन, एक संयोग ने उन्हें परदे का क्रूर सास बना दिया। बाद में तो वे कठोरता की पर्याय ही बन गर्इं।

चंद्रकांता शर्मा का लेख : मौजूदा दौर में बाल साहित्य

कहानी, उपन्यास, लेख और आलोचना साहित्य लिखने वाले लोग ही बाल साहित्य भी लिखते हैं, लेकिन वे इस बात से बेपरवाह हो जाते हैं कि बच्चों का साहित्य दर्जा कुछ ज्यादा नरमी की मांग करता है।

रीति रिवाज : शादी का बदलता चलन

आजकल अपने देश में शादियों में एक नया चलन देखने को मिल रहा है। वह यह कि वधू पक्ष के लोग शादी से एक दो दिन पहले अपनी बेटी को वर पक्ष के शहर, कस्बे या गांव ले जाते हैं और विवाह की रस्में वहीं निभाते हैं।

कहानी : ब्रेकअप के बाद

‘पूरा साल लग गया उससे उबरने में, पर शायद पूरी तरह नहीं उबर पाया। हीलिंग प्रोसेस लंबी चलती है, पर अब मुझे कोई उसकी कहानी सुनाता है तो फर्क नहीं पड़ता।

रेखाचित्रः धुन्नी

मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘ईदगाह’ की शुरुआत इस तरह से है- ‘रमजान के पूरे तीस रोज बाद ईद आई…।’ किस तरह ईद का आना कहानी के मुख्य पात्र हामिद के गांव के सूरज में एक नई रोशनी, नई उमंग भर देता है।

यादें

बाबा-दादी की शादी की पचासवीं सालगिरह मनाने के बाद हंसी-खुशी के माहौल में ढेर सारे उपहार लिए हम देर रात घर लौटे थे।

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