मैं जब बड़ा हो रहा था तो यह दोहा मेरे आसपास था- ‘पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब/ खेलोगे कूदोगे तो…
आपने खुले आसमान के नीचे सिनेमा का लुफ्त उठाया है? निस्संदेह आज की पीढ़ी ने यह नहीं किया होगा कभी।
दंगों का सैलाब गुजर गया, अब सम्मान पत्र बांटने वाले या अपना अभिनंदन खुद ही करवा लेने वाले सामने आ…
कई बार सामूहिक उत्सवों के बीच कुछ ऐसी घटनाएं होती हैं, जो नतीजे में भले तात्कालिक हों, लेकिन उसका महत्त्व…
बहुत इंतजार कराने के बाद पिछले दिनों पूरे दम-खम के साथ बादल बरसे।
आखिर बहरेपन के क्या लक्षण हैँ, हमें इस पर विचार करना चाहिए। कैसे पता लगाया जाए कि हमें कम सुनाई…
हमारे देश में ऐसे तमाम लोग हैं, जिनके लिए स्वतंत्रता महसूस कर पाना अभी बाकी है। सिर्फ इसलिए कि किन्हीं…
धारणाओं का निर्माण कोई एक दिन की बात नहीं है। कोई एक बात किसी एक व्यक्ति या समूह से चलती…
यह सुखद है कि चिट्ठीयुगीन कई बुजुर्ग नई तकनीक में हम सबके लिए मिसाल कायम करने मैदान में उतर आए…
पिछले दिनों एक तस्वीर पर नजर पड़ी, जिसमें एक शख्स ने अपने हाथ में एक बड़ा पर्चा या प्लेकार्ड लिए…
एक बार मित्रों से बातचीत के क्रम में हिंदी अक्षरों की बात शुरू हो गई।
कभी-कभी कोई शब्द एक नए रूप में कैसे खिल उठता है समय और संदर्भ के साथ। ‘यार’ एक ऐसा ही…