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प्रयाग शुक्ल के सभी पोस्ट

दुनिया मेरे आगेः बचपन के बोल

यह कुछ अफसोस की बात है कि आज हम कई बाल-सुलभ चीजें बड़ों में कम पाने लगे हैं। बिस्मिल्ला साहब की हंसी-मुस्कान हो या...

दुनिया मेरे आगेः बिगड़ती भाषा

ऐसा लगता है कि अब भाषा की दुर्दशा का कोई अंत नहीं है। वह राजनीति की दुनिया से लेकर सामाजिक आचार-व्यवहार में और उसके...

संस्कृतिज-बादल बाउल बजाए रे इकतारा

बाउल गीति ने बंगाल के सांस्कृतिक जगत में बहुत कुछ जोड़ा है। पिछले कई दशकों से बाउल बंगाल के बाहर भी गूंजता आया है।

बंद दरवाजों के भीतर

दिल्ली-एनसीआर में ऐसी किशोरियों-स्त्रियों के लिए अब ‘मेड’ शब्द प्रचलित है, और घर की मालकिन के लिए ‘मैडम’। जब किसी किशोरी-स्त्री को प्रताड़ित किया...

अब कहां चले बहुरूपिया

हाट-बाजारों, मेलों, शहर-कस्बों की गलियों में भेष धरे घूमते बहुरूपिए सदियों से अपनी कला का प्रदर्शन करते आ रहे हैं। किसी देवी-देवता, किसी प्रसिद्ध...

कहानी- उजली हंसी

जब मानसी और करुणा बातें कर रही थीं, ठीक उसी समय विकास और मानसी उस नीली दरी पर बैठे थे, जो ‘उड़ती’ हुई न...

प्रयाग शुक्ल की कहानी : कम्प्यूटर स्क्रीन पर मोर

वह कॉलेज में थी तब कुछ रूमानी-सी कहानियां लिखी थी। और पिता के साधनों से एक छोटी-सी पुस्तिका भी छपा ली थी।

दुनिया मेरे आगे: ‘अमिताभ के व्यक्तित्व में जो ‘निखार’ है, उसके पीछे उसकी मातृभाषा भी है’

मॉल का फर्श चमकता हुआ, चिकना है, उसमें चलने की ‘राह’ है और दर्शक भी इस दृश्य को देख कर सुख उठाएंगे। जब वह...