प्रयाग शुक्ल

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29 Articles

पानी की प्यास

इन दिनों कबूतरों को अपनी बालकनी में जल-क्रीड़ा करते हुए देखता हूं तो उन्हें देख कर बहुत आनंद आता है।

दुनिया मेरे आगे: धूप के रंग

धूप के दिन आ गए हैं। धूप में बैठने और सेंकने के दिन। और अगर किसी ऐसी जगह में हों जहां, पेड़-पौधे-फूल, तितलियां, गिलहरियां...

दुनिया मेरे आगे: सुबह की सैर

हमारे देश में सैर पर जाने वाले लोगों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है और अब वह वरिष्ठ नागरिकों के (स्त्री-पुरुष दोनों) के बीच...

दुनिया मेरे आगे: भोजन की सुगंध

कोरोना काल में बहुतों के लिए रोटी और मकान एक बड़ा अभाव बन गए। कपड़े भले थोड़े बहुत तन पर रहे हों, भोजन पकने...

दुनिया मेरे आगे: सवारी साइकिल की

साइकिल का इतिहास वैसे दो सौ वर्षों का है। मानते हैं कि पहली साइकिल जर्मनी के कार्ल वान ड्रेज ने 1817 में बनाई थी,...

दुनिया मेरे आगे: पत्ता पत्ता बूटा बूटा 

यह सच है कि हम फूल-फल देने वाले वृक्षों और पत्तों को अधिक सराहते आए हैं, केवल पत्तों वाले वृक्षों और पौधों की तुलना...

दुनिया मेरे आगे: कहां गईं तितलियां

तितली पर बहुत-सी चीजें लिखी गई हैं। कविताएं और गीत भी बहुतेरे हैं। ‘पंछी बनूं उड़ती फिरूं’ गीत की याद बहुतेरे लोगों को होगी।...

दुनिया मेरे आगे: धूप के मायने

धूप ही फूल खिलाती है या कहें कि उनके सौंदर्य को और अधिक दमकाती है।

तरु की छाया में

कई संस्थाओं ने समारोहों में स्वागत-सम्मान के अवसर पर भेंट दिए जाने वाले फूलों के गुच्छे की जगह पौधे उपहार में देने की सुंदर...

दुनिया मेरे आगे: आधा गिलास पानी

यह संकट इतना गहरा है कि अब पर्व-त्योहारों पर भी पानी की बचत की बात सोचनी पड़ेगी। पर्व-त्योहारों पर, होली-दिवाली पर, पानी के मामले...

दुनिया मेरे आगे: वसंत की अगवानी

यह जानना-देखना सुखद है कि अब प्राय: सभी शहरों-महानगरों में कहीं-न-कहीं, किसी फुटपाथ पर भी, भांति-भांति के छोटे बड़े गमले बिकते हुए दिखाई देते...

दुनिया मेरे आगे: सड़क का सद्भाव

डूबते हुए को बचाना या आग में झुलस रहे किसी को बाहर निकालना या कोई किसी को लूट रहा हो तो सीना तान कर...

दुनिया मेरे आगे: मोर की बोली

हमारे शास्त्रीय नृत्यों में उसकी चाल को स्थान भी मिला है। वह कविताओं में है। ‘दादुर मोर, पपीहे बोले’! वर्षा ऋतु का वर्णन उसके...

चिंतन: नीर की निर्मलता

हमारे यहां ही नहीं दुनिया भर में जो यह माना जाता रहा है कि तन-मन दोनों निर्मल होने चाहिए, उसके पीछे की सोच यही...

दुनिया मेरे आगे: सुविधा का सफर

वे दिन बहुत पीछे चले गए हैं, जब शहरों कस्बों में इक्के-तांगे दौड़ते थे और साइकिलों पर बड़े-बड़े डॉक्टर इंजीनियर भी शान से बैठे...

दुनिया मेरे आगे: सुबह के फूल

सुबह के फूलों की ओर निहारिये तो वे अपने रंग-रूप के सौंदर्य के साथ-साथ एक ताजगी का अहसास कराते हैं। सो, बहुतेरे लोग उनकी...

विमर्शः साहित्य का भविष्य, भविष्य का साहित्य

इन दिनों जो साहित्य दुनिया की भाषाओं में लिखा जा रहा है, और जिससे हम कमोबेश परिचित हैं, वह कलाओं के साथ एक सहकारी...

ललित प्रसंग: नीम की छाया

अक्सर सभी प्रदेशों में दिखी है नीम की छाया। हम और कुछ पहचान पाएं या नहीं, नीम, बरगद, आम, पीपल को जरूर पहचान लेते...

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