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दुनिया मेरे आगे

सुभाष गाताडे
जनसत्ता 21 मई, 2013: वर्धा में उस चाय की दुकान पर असग़र साहब के साथ ली गर्इं चुस्कियां हमेशा याद रहेंगी। बमुश्किल डेढ़ साल पहले सांप्रदायिकता के खिलाफ आयोजित एक कार्यक्रम में लंबे अंतराल के बाद उनसे

 

चोरी की बानी

ओम निश्चल
जनसत्ता 20 मई, 2013: साहित्य में प्रेरणा-अभिप्रेरणा की प्रवृत्ति सदियों से चलती आ रही है। गजल के काफिये-रदीफ हों, गीत की बंदिशें हों, कविता के किसी खास लहजे का अनुकरण हो, यह कारोबार साहित्य की रोजमर्रा की

 

खंडारी चौराहा

प्रयाग शुक्ल
जनसत्ता 17 मई, 2013: कुछ विस्मय के साथ मैं उस चौराहे को पार करती सवारियों और वहीं धीमी या तेज गति से चले आ रहे ट्रकों, बसों, कारों, साइकिल रिक्शा, ऑटो रिक्शा आदि को देख रहा हूं।

 

मलाणा की दास्तान

निरंजन देव शर्मा
जनसत्ता 15 मई, 2013: उस दिन शाम को पुलिस उपाधीक्षक संजय शर्मा का फोन आया कि थोड़ी देर में पुलिस लाइन पहुंच सकते हो तो आ जाओ, मलाणा पर एक वृत्तचित्र दिखाया जा रहा है।

 

तोते का तमगा

हेमंत शर्मा
जनसत्ता 13 मई, 2013: सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआइ को सरकार का तोता क्या कहा, सरकार में बैठे लोगों के हाथों से तोते उड़ गए! तोता, गजब का रटंतू। जो रटा दीजिए तुर्की-ब-तुर्की वैसे ही भाखेगा।

 

अभिव्यक्ति के खतरे

कविता वाचक्नवी
जनसत्ता 10 मई, 2013: हाल ही में ‘पैन-अमेरिका’ की ओर से जारी सूचना से पता चला कि सिंगापुर के  कार्टूनिस्ट को एक कार्टून बनाने के दंडस्वरूप तीन वर्ष की जेल की सजा सुनाई जा सकती है।

 

गोरखधंधे का खेल

संदीप जोशी
जनसत्ता 18 मई, 2013: अगर खिलाड़ी बिकते हैं तो खेल क्यों नहीं बिकेगा? जिस खेल का आरंभ नीलामी से हुआ हो वह खेल कैसे नीलाम होने से बचा रह सकता था?

 

नाम देने की कला

राजकिशोर
जनसत्ता 16 मई, 2013: दिल्ली का जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जनेवि) इस मायने में खास है कि वहां छात्रावासों के नाम देश की नदियों के नाम पर रखे गए हैं।

 

शराबबंदी या नसबंदी

असग़र वजाहत
जनसत्ता 14 मई, 2013: खबर है कि दिल्ली मेट्रो में शराब पीकर कोई यात्रा नहीं कर सकेगा। मेट्रो शराबियों की पहचान करने के लिए विशेष यंत्र लगा रही है। शराब पीकर कार चलाने की सजा बढ़ाई जा रही है।

 

जल से जीवन

राजेंद्र सिंह
जनसत्ता 11 मई, 2013: समुदायों के जलाधिकार छिनते जाने के कारण और राजनेताओं के ‘वोट के बदले पानी’ देने के कोरे आश्वासन ने समाज को बेपानी बना दिया।

 

दोहरेपन की दिशा

देवयानी भारद्वाज
जनसत्ता 9 मई, 2013: मैं भोपाल जाने के लिए रेलगाड़ी में बैठी थी। सामने की सीट पर बैठे दोनों युवक किसी परीक्षा की तैयारी में व्यस्त नजर आ रहे थे। दोनों ही विभिन्न विषयों और किताबों की बातों में

 
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