बंगाल में बीरेंद्रनाथ शासामल के नेतृत्व में किसानों का बड़ा आंदोलन हुआ था। पूर्वी उत्तर प्रदेश में गोंड जनजाति के लोग ने वैसे ही अंग्रेजी शासकों को 1851 से परेशान कर रखा था। बिहार भारत छोड़ो आंदोलन में काफी सक्रिय रहा। बिहार में 11 अगस्त, 1942 को छात्रों और युवकों ने तय किया कि पटना हाई कोर्ट और विधान भवन पर भारत का झंडा फहराया जाए। ऐसा उन्होंने कर भी दिया, लेकिन अंग्रेज पुलिस ने इन क्रांतिकारियों पर गोलियां चला दीं, जिसमें दस छात्र शहीद हो गए। 17 अगस्त, 1942 को दो नौजवानों- गुरज धोबी और झारी कोरी को सांझोली रेलवे स्टेशन पर पटरी उखाड़ने और अंग्रेजी राज की खिलाफत करने के कारण गोली मार दी गई।

इस आंदोलन का आगाज महाराष्ट्र से हुआ था। इसलिए तमाम गतिविधियों का केंद्र नागपुर, पूना, सतारा और गुजरात का बड़ा हिस्सा रहा। गुजरात में एक छात्र जंगलु वीर को अंग्रेजों ने सिर्फ इसलिए गोली मार दी, क्योंकि उसने ‘भारत माता की जय’ का उद्घोष किया था। इस आंदोलन में समाज के तमाम संगठनों ने हिस्सा लिया था, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विशेष भूमिका रही। 28 अगस्त, 1942 की अंग्रेजी खुफिया विभाग की रिपोर्ट में कहा गया था कि आंदोलन से पूर्व 27-28 अप्रैल, 1942 को संघ प्रमुख गोलवलकर ने अपने कार्यकर्ताओं को दिए एक संदेश में कहा था- ‘वर्तमान सरकार को स्वार्थवश यथासंभव भरपूर सहायता देने वाले व्यक्तियों की हम निंदा करते हैं।’ वहीं अपने दूसरे भाषण में उन्होंने स्वयंसेवकों को साफ निर्देश दिए थे कि स्वयंसेवकों को देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने के लिए तैयार रहना चाहिए।

इस बात का जिक्र करना इसलिए जरूरी है, क्योंकि ऐसा पहली बार हुआ था जब संघ ने किसी आंदोलन के लिए अपने कार्यकर्ताओं को निर्देश दिए थे। इससे पूर्व संघ आंदोलन में भाग तो लेता था, पर संगठन पूरी तरह समाज को संगठित करने में ही लगा रहता था। संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार ‘जंगल सत्यग्रह’ में जेल गए, पर उस समय किसी और को संघ प्रमुख बना कर। यही कारण था कि संघ के विभिन्न कार्यकर्ताओं के घर ही क्रांतिकारियों के लिए गुप्त ठिकाने थे। दिल्ली में जयप्रकाश नारायण और अरुणा आसफ अली को छिपाने का काम लाला हंसराज गुप्ता ने किया था, जो उस समय दिल्ली में संघ के संघचालक थे।

इस प्रकार यह आंदोलन 1942 के अंत तक चला जिसमें सैकड़ों लोगों ने अपनी शहादत दी। लेकिन इससे अंग्रेजी शासन की नींव हिल गई थी। वहीं इस आंदोलन ने समाज में बंटवारे के अंग्रेजों की नीति को भी पूरी तरह असफल साबित कर दिया। अंग्रेज न तो मुसलामनों को हिंदुओ से अलग कर पाए और न ही दलित वंचित वर्ग के लोगों को ही।