मधु अरोड़ा

मीना भी न, बेकार ही परेशान होती रहती है। अब इतना बड़ा घर है, तो फैलाव तो होगा ही। बेटियां भी नहीं हैं कि घर की सफाई में कुछ हाथ बंटा दें। वैसे जिन सहेलियों की बेटियां हैं, वे ही कौन-सी खुश हैं। वे अपनी बड़ी होती बेटियों की चिंता में दुबली हुई जा रही हैं… साथ में बेटियों की बढ़ती फरमाइशें। आखिर कितने कपड़े खरीदे जाएं, बजट भी कोई चीज होती है।

छोटे शहरों में तो फिर भी बच्चों को कुछ सुकून मिल जाता होगा, लेकिन मुंबई में तो हर किसी को हर चीज के लिए संघर्ष करना पड़ता है। रेणु और वेणु दोनों सुबह पांच बजे उठते। उसे साढ़े चार बजे उठना होता। उनके लिए नाश्ता, टिफिन और फिर दोपहर के तीन बजे का एक टिफिन बनाना होता। अपने लिए भी टिफिन बनाना होता। जल्दी में ब्रेड बटर, एक-एक कप दूध, जिसमें कॉम्प्लान डाल देती।
वे बोलते रहते, ‘देर हो रही है, दूध न दो, तो भी चल जाएगा।’ वह सुनती रहती और दूध को बड़े भगोने में डाल कर ठंडा करके दे देती। वे बोलते रहते और अंतत: दूध पीकर बैग कंधे पर लटका कर, पैरों में जूते पूरे घुसाए बिना भाग लेते।
वेणु तीन वर्ष का था, जब उसके पापा का ट्रांसफर हो गया था और वह और रेणु उनको छोड़ने स्टेशन गए थे। स्टेशन पर उसने स्लाइस पीते हुए कहा था, ‘पापा, जैसे आप हमें अकेला छोड़ कर जा रहे हैं, मैं भी बड़ा होकर आपको अकेला छोड़ कर चला जाऊंगा।’ उस समय वह अंदर तक कांप गई थी और इमोशनल भी हो गई थी। उसने बात बदलते हुए कहा था, चलो रेणु, अब हम घर चलते हैं। दूर जाना है। पापा को बाय कर दो।’
और वह उसका हाथ पकड़ कर चल दी थी, बिना कोई बात किए। दसवीं में सभी बच्चों के हारमोन परिवर्तित होते हैं। रेणु में भी यह परिवर्तन दिख रहा था। वह हंसता तो खूब था, पर बोलने कम लगा था। हो भी क्यों न! पढ़ाई का बोझ बढ़ता जा रहा था। उन दिनों कंप्यूटर नया आया था।
रेणु घर आकर अपने छोटे भाई पर बहुत रोब झाड़ता था। मसलन, जूते उतार दो… कपड़े बदल कर खाना लगाओ। जबकि दोनों भाई एक ही स्कूल में थे और एक साथ आते और जाते थे। छोटा बेटा वेणु डर के मारे काम कर देता था।
एक दिन कमाल हुआ। मीना शाम को आॅफिस से आई तो छोटा बेटा किचन में चाय बना रहा था। वह जल्दी से वहां पहुंची तो अपनी बड़ी-बड़ी आंखें घुमाता और गंभीर होकर बोला, ‘मम्मी, आप भइया को समझा लो। आज उसने मुझे दाएं गाल पर थप्पड़ मारा।’
उसने वेणु को पुचकारा और उसके हाथ से शक्कर का डिब्बा लेते हुए बोली थी, ‘बेटा, बुरा मत माना करो। वह तीन-तीन क्लास जाने की तैयारी कर रहा है। दसवीं है न… उसके हार्मोन बदल रहे हैं। मैं मना कर दूंगी।’ तब जाकर मामला सुलटा था।

जब मीना ने रेणु से जवाब तलब किया तो साहबजादे बोले, ‘मैं बड़ा हूं। यह मेरा अधिकार है। उस दिन आपने मुझे मारा था और आज मैंने इसको मारा। बड़ा हूं न! कंट्रोल नहीं किया तो बिगड़ जाएगा।’ एक तरह से सच था, पर उसने ताकीद कर दी, ‘रोज रोज नहीं चलेगा।’ दोनों के सिर हिले थे।
बड़ा बेटा रेणु बारहवीं में आ गया। कैरियर का वर्ष। रात-दिन मेहनत करता। महत्त्वाकांक्षी था और उसका लक्ष्य भी तय था। आईआईटी से इंजीनियरिंग करना था उसे। उसके पेपर हो गए। उसने आईआईटी की प्रवेश परीक्षा दे दी, पर अफसोस कि वह आईआईटी क्लीयर नहीं कर पाया। उसे थोड़ी तो निराशा हुई, पर उसने कहा कि वह ए ट्रिपल आई में पास हो गया है। यह आईआईटी के ही समकक्ष है।
उसे दूसरे शहर में जाना होगा और वह जाने के लिए तैयार था। एक तरह से उसने खुद को तैयार कर लिया। उसने धीरे-धीरे खुद को घर से डिटैच करना शुरू कर दिया। यानी एक तरह से अलग और अकेले रहने की मानसिक तैयारी करने लगा था।
अब सवाल था कि रेणु के तनाव को दूर कैसे किया जाए। इस सवाल का उत्तर उसने ही दिया- ‘गिटार विल डू।’ आनन-फानन में उसके लिए गिटार लाया गया और वह दूसरे उपनगर में गिटार सीखने जाने लगा था। बड़ी मस्ती और मन से सीख रहा था।
वही रेणु सच में आज इंजीनियरिंग के लिए मुंबई से बाहर जा रहा था। वह उसकी तैयारी में लग गई थी। वह अपने पापा के साथ ट्रैकिंग पर तो कई बार गया था, पर चार साल के लिए अकेले पहली बार जा रहा था।
लेकिन यह क्या हुआ, रेणु को अचानक बुखार आ गया। जाने में दो दिन बाकी थे। तुरंत डॉक्टर को दिखाया, तो बोले, ‘वायरल है।’ रेणु बुखार में बोलता, ‘मुझे जाना है। साल बेकार नहीं होने दूंगा। दवा की खुराक ज्यादा कर दो।’

वह भी कैसी पगली थी, उसने सच में सेप्ट्रॉन दिन में तीन के बजाय चार बार कर दी। उसका बुखार धीरे-धीरे उतरने लगा था और उसके पापा उसे छोड़ने के लिए दूसरे शहर गए थे और इस बहाने उसका हॉस्टल देख आए थे। सब कुछ अच्छा था और उसे तसल्ली हुई थी।
उसका भी कारण है। उसके पापा के ट्रांसफर के बाद उसने मीना के अकेलेपन को देखा है और उसे सकारात्मक सहयोग दिया है। उसने बचपन में कभी जिद नहीं की, पर मंहगी चीजों का शौकीन रहा है। सस्ती चीजें न तो खाता है और न खरीदता है।
एक बार उसके दादाजी बोले थे, ‘मीना, आज रेणु को मैं बाहर खिला कर लाता हूं। तुम लोग घर में बना कर खा लेना।’ उसने हंस कर कहा था, ‘सोच लीजिए, अगली बार आप उसे नहीं खिलाने ले जाएंगे।’ वे हंसते हुए रेणु को लेकर चले गए थे।
जब दो घंटे बाद वे लोग डिनर करके घर लौटे, तो ससुरजी ने हंस कर कहा था, ‘मीना, तुम्हारा कहना बिल्कुल सच था… रेणु ने मेन्यू में सबसे मंहगी आइस्क्रीम और सबसे मंहगा डोसा मंगाया था। बड़ा मंहगा पोता मिला है। तुम क्या कम मंहगी हो, ब्रांडेड कपड़े ही पहनती हो। मेरा बेटा तो लुट जाएगा।’ इस पर वह हंस कर ही रह गई थी।

रेणु जब छात्रावास में रह रहा था, उसे अचानक धुन लगी कि वह मैक डॉनल्ड में पार्ट आइम वेटर का काम करेगा। मीना हैरान रह गई थी। जब बहुत पूछा तो उसने कहा, ‘इस नौकरी में खाना फ्री मिलता है और उसे बर्गर बहुत पसंद है।’
वह सिर धुन कर रह गई थी। उसने अपनी सहेली की मां को फोन किया था, ‘आंटीजी, आप रेणु की लोकल गार्जियन हैं। वह सप्ताह के अंत में छुट्टी के दिन वेटर का काम करना चाहता है… आप उसके लिए कुछ करें। मैं पढ़ाई तो अधूरी नहीं छुड़वा सकती।’
इस पर वे हंस कर बोली थीं, ‘चिंता मत करो। उसके पास गिटार है। हम अपने गुरु के पास सीखने के लिए भेज देंगे।’ इस पर मीना आश्वस्त हुई थी और रेणु का फोन आया था, ‘मैं गिटार सीख रहा हूं। अमोल की मम्मी ने कहा है। अब तो खुश!’ इस पर वह खूब हंसी थी।
छोटे बेटे की अलग तस्वीर है। बोलता बहुत कम है। बोलेगा तो लगता है कि मीठी गोली दुनाली से निकली हो। वह अपने बड़े भाई की नकल करने लगा है। पढ़ने में बेशक अपने बड़े भाई जैसा तेज नहीं है, पर किसी की नाक में दम करने में माहिर है।
उसने मीना से पहले ही कह दिया था, ‘मम्मी, मैं भइया की तरह लंबी और ऊंची पढ़ाई नहीं कर सकता। मुझसे कोई उम्मीद मत रखना।’ यह सुन कर वह अवाक रह गई थी। फिर भी बात को संभालते हुए कहा था, ‘मैंने कब कहा! जो भी बनो, करो, पढ़ो।’
दोनों बेटों के बीच सात साल का अंतर है। निश्चित रूप से बड़ा बेटा छोटे बेटे की ध्यान रखता है, पर डॉमिनेट भी खूब करता है।
हुआ यों कि बड़े बेटे की विज्ञान की टीचर छोटे बेटे की क्लास में आर्इं पढ़ाने के लिए। छोटे बेटे ने, जो शायद दूसरी में था उस समय, टीचर से पूछा, ‘मैम, मेरा भाई पढ़ने में कैसा है?’

टीचर हैरान कि बड़ा भाई छोटे की पढ़ाई के बारे में पूछता है। इधर तो उल्टा है। वे बोलीं, ‘ठीक है वह, पर तुम क्यों पूछ रहे हो?’ इस पर छोटा बोला, ‘भाई हूं न, उसका खयाल रखना पड़ता है।’
टीचर ने बड़े बेटे को हंसते हुए बताया और शाम को जब मीना घर आई आॅफिस से तो घर में महाभारत की पूरी तैयारी थी। छोटा बेफिक्र होकर गेम खेल रहा था और बड़ा पैर पर पैर चढ़ाए बैठा था।
मीना के घर में पैर रखते ही वह उबला था। उसने पूछा, ‘मम्मी, तुम्हारे बेटों में कौन बड़ा है और किसको किसका खयाल रखना चाहिए?’ मीना ने कहा, ‘तुम बड़े हो, तुम्हारी जिम्मेदारी है।’ तब उसने भन्नाते हुए पूरा किस्सा सुनाया।
उसने हंसी दबाते हुए छोटे की ओर देखा तो वह पजल गेम खेल रहा था, मानो कुछ सुना ही नहीं। बड़ा बोला, ‘आप इससे कह दो कि मेरे मामले में इन्क्वायरी करने की जरूरत नहीं है।’

छोटे बेटे को भी बड़े भाई की तरह गिटार सीखने की सूझी। पता चला कि मिस्टर रेग घर सिखाने आते हैं। सप्ताह में एक बार और एक सीटिंग के पांच सौ रुपए। अगर बच्चे को दिलचस्पी है, तो वे उसी फीस में दो घंटे भी सिखा देते हैं। संपर्क किया तो वे बहुत खुश हुए और बोले, ‘मैडम, हर बुधवार को आपके एरिया में आता हूं। अगर सूट करे तो बताएं।’ वेणु उछाह में था, सो मान गया।
मीना के दोनों बेटों ने कभी नहीं सताया और न बताया है कि वे कंप्यूटर पर क्या कर रहे हैं। वेणु ने भी कब आॅनलाइन फॉर्म भर दिया, पता ही नहीं चला और एक दिन बोला- ‘मेरा पुणे में वोकशनल कोर्स में दाखिला हो गया है। मुझे अगले सप्ताह जाना है।’
उनके पापा हैरान थे, ‘ये कब कर लिया! हम तो अपने पिताजी से पूछे बिना कोई काम कर ही नहीं सकते थे।’ इस पर कोई कुछ नहीं बोला। फीस का इंतजाम करना था। यह प्राइवेट संस्थान था। एक साल की फीस एक लाख रुपए थी। रहने, खाने का इंतजाम अलग। खैर, वह कोई बड़ी बात नहीं थी। एजुकेशन लोन बड़ी आसानी से मिल जाता है। जुलाई में वेणु भी हॉस्टल चला गया था। रेणु की नौकरी लग गई थी। अचानक वह खाने के प्रति अतिरिक्त रूप से सतर्क हो गया था।
आज रेणु सुबह गाना गा रहा था। आश्चर्य। मीना ने पूछ लिया, ‘आज बहुत खुश हो। बहुत दिनों बाद तुम्हारे मुंह से गाना सुना।’ इस पर हल्का-सा मुस्करा कर बोला, ‘आपसे झगड़ने का मूड बना रहा हूं। आपसे झगड़ने के बाद मैं तरोताजा हो जाता हूं।’ बस, दो मिनट बाद ही हवाओं का रुख बदल गया। पुत्तरजी बोले, ‘आज अंकुरित चीज नहीं है नाश्ते में। एक ही दिन दिया था।’
मीना का तेवर बदलने में कितनी देर लगती है, सो कह दिया, ‘आज तैयार नहीं हुआ मूंग। वैसे ज्य़ादा अंकुरित चीजें खाने से कॉन्स्टिपेशन हो जाता है।’ पर वह यह बोलते हुए निकल गया कि आज ज्य़ादा समय नहीं है झगड़ने का। आज का कोटा पूरा हो गया है।’
बदलाव सुकून भी देता है, तो कभी-कभी परेशान भी पैदा करता है। कहीं अवचेतन में बच्चों से हुआ वार्तालाप जिंदा है आज भी। बच्चों का बचपन, फिर वय:संधि और फिर युवा होना, इनमें उनके बोलने-चालने में कितना फर्क आता है।
एक दिन रेणु ने आकर कहा था, ‘मम्मी, कल आलू की खूब तीखी चटपटी सब्जी बना कर देना। अज्जू की जीभ बेस्वाद हो गई है।’ इस पर उसने हंसते हुए कहा था, ‘उसकी मम्मी तो बहुत अच्छा खाना बनाती है।’

उस दिन अज्जू ने फोन पर उसे चीज सैंडविच बनाना सिखाया था। उसने बताया कि चीज को ब्रेड पर खूब घिसना चाहिए और इतना ज्य़ादा होना चाहिए कि ब्रेड न दिखाई दे। टिफिन में चेंज चाहिए होता है। मीना को ये सारी यादें बहुत तरोताजा रखती हैं।
अब वह डाइटिशियन के हिसाब से खाना खाता है। उसके लिए एक्जीक्यूटिव लंच घर से बन कर जाता है। सिक्स सिग्मा डिब्बेवालों के आदमी घर-घर जाकर बच्चों के टिफिन उठाते हैं। दोपहर साढ़े बारह बजे तक क्रमश: आॅफिस में पहुंचाते हैं। कई बार भरा हुआ टिफिन वापस आता है। पूछने पर वही रटा-रटाया उत्तर, ‘मीटिंग थी मम्मी। उसी में नाश्ते और खाने का इंतजाम रहता है।’ पता है लंच कितने बजे किया, पांच बजे।’ वह चुप रह जाती है।
‘मम्मी, आप हमारी कंपनी की ऐजेंसी ले लो।’ उसने हंस कर पूछा था, ‘कितना नावां लगेगा?’
‘सात लाख।’ ‘कोई और काम बताओ।’ इस पर रेणु बोला था, ‘आप अचार का बिजनेस शुरू कर दो। अच्छे डालती हो और आपके हाथ के अचार खराब नहीं होते हैं।’

इस पर उसने तपाक से कहा था, ‘अगर नहीं बिके, तो क्या मैं अचार खाकर पेट भरूंगी? उल्टे-सीधे काम मत बताया करो।’ तब रेणु बोला था, ‘फिर आप क्या सोचती हो, वैसे आप स्नैक्स भी अच्छे बना लेती हो। पानी पूरी का स्टॉल खोल लो।’
‘हां, अब अक्कल की बात की। इसमें ज्य़ादा इन्वेस्ट नहीं करना पड़ता। शाम को तीन घंटे काफी हैं बेचने के लिए। ग्राहक तोड़ना आसान है। मार्केट में पंद्रह रुपए की छह मिलती हैं। मैं दस रुपए में पांच बेचूंगी। क्वालिटी अच्छी रखूंगी।’
इस पर वह बिना देर किए बोला, ‘ग्राहक की बात बाद में। पहले यह बताओ, घर में कब बना रही हो? आजकल आलसी हो गई हो।… मम्मी, सच में बहुत दिन हो गए आपके हाथ की पानी-पूरी खाए।’
वेणु चुप रहता है। वह सभी के लिए छोटा बच्चा है। पेंपर्ड बच्चा। पर बिगड़ा नहीं, सुधरा हुआ। जब उसकी उंगलियां गिटार पर थिरकती हैं, देखते ही बनता है। वह पूरे परिवार का बहुत प्यारा बच्चा है। ये बच्चे भी न, वह पानी-पूरी का पानी बनाने के लिए किचन की ओर चल दी है।