जहीर कुरैशी

तीनों स्टडी कपल्स बीते छह साल से मध्यप्रदेश के अलग-अलग शहरों से आकर भोपाल में कंपटीशन की तैयारी कर रहे थे। शादी किसी ने नहीं की थी, लेकिन तीनों जोड़े स्वतंत्र रूप से ‘लिव-इन’ में पति-पत्नी की शैली में रहते थे। यूपीएससी से शुरू करके एमपीएएस प्रतियोगिता तक तीनों जोड़ों को कहीं सफलता नहीं मिली। बाद में उन्होंने स्टेनोग्राफर से लेकर क्लर्क तक के इम्तहान दिए, लेकिन आधे-अधूरे मन से दी गई परीक्षाओं में छहों में से एक भी चयनित नहीं हो पाया।

तीनों लड़कियों के मध्यवर्गीय माता-पिता बेटियों को आला अफसर बनाने की धुन में मासिक रूप से ‘चार्मिंग एमाउंट’ भेजते रहते थे। तीनों लड़कों में से एक की नगर निगम में संविदा पर ‘मनी कलेक्शन’ की नौकरी थी। एक ट्यूशन पढ़ाता था। तीसरा निठल्ला था, लेकिन अपनी टीम के सामने पैसा कमाने के नए-नए विचार पेश करता रहता था। उस पर ही नियमित रूप से अखबार देख कर नौकरियों की सूचना देने, फॉर्म भरवाने और बैंकिंग वर्क्स कंप्लीशन की जिम्मेदारी थी।

लगभग तीनों लड़कियों ने मान लिया था कि वे किसी भी उच्च प्रतियोगिता में चयनित होने वाली नहीं। क्लर्क की नौकरी में किसी की भी रुचि नहीं थी। अट्ठाईस-उनतीस साल की होने के बाद भी किसी को शादी की चिंता नहीं थी। हर लड़की मानती थी कि उसका साथी उसे धोखा नहीं देगा, नौकरी मिलते ही दोनों सात फेरे ले लेंगे। कुल मिला कर नौकरी के तनाव के अलावा तीनों जोड़ों को कोई दिक्कत नहीं थी।

लगातार छह साल से प्रयत्न के बाद कहीं कामयाबी न मिल पाने और लोगों की नौकरियां छिनने के समाचारों ने तीनों जोड़ों को विचलित कर दिया। एक लड़की हिम्मत हार कर अपने घर लौटने की बात करने लगी। ट्यूशन पढ़ाने वाला लड़का भी दो ट्यूशन छूटने से हताश था। शेष चार दोस्तों ने निराश साथियों की हिम्मत बढ़ाई। कहा, ‘पैसे-धेले की दिक्कत को मिल-बांट कर पूरा करेंगे!’

निराशा खत्म हुई, तो अगले दिन निठल्ले दोस्त अभय ने छह मित्रों की मंडली के सामने एक नए जॉब का प्रस्ताव रखा। कहा, ‘हम लोगों के पास गुजारे लायक ही पैसे होते हैं। हम अभी तक पारंपरिक जॉब कंपटीशन में ही उलझे रहे। हमारे ही देश के पचास-साठ लाख आबादी वाले शहरों में युवा नए-नए तरह के काम कर रहे हैं। जिन युवाओं के पास दस लाख तक भी रकम है- वे धनी परिवार के बूढ़ों के लिए ‘आसरा’ जैसे वृद्धाश्रम खोल सकते हैं। किराए के मकानों में शुरू किए गए ऐसे आश्रम अच्छी कमाई देते हैं। लेकिन, हममें से किसी के खाते में पच्चीस हजार रुपए भी नहीं हैं। वैसे अकेलेपन से जूझते अमीर बूढ़ों और युवाओं से पैसे कमाने का भोपाल में भी अच्छा अवसर है।’

अजेय ने परिहास करते हुए कहा, ‘अभय, तू जो भी जॉब प्लान लेकर आता है, उसमें भारी-भरकम मनी इन्वेस्टमेंट की बात होती है। तेरे पास क्या कोई ऐसा जॉब प्लान नहीं है, जिसमें ‘हर्र लगे न फिटकरी, और रंग चोखा आय!’
अभय ने कहा, ‘प्लान तो है, मगर उसे सुन कर तुम लोगों के मन में दबी नैतिकता आड़े आने लगेगी।’
सुनील ने कहा, ‘उसको भी बता दे। तेरे पचीसों प्लानों की तरह हम बैठ कर उस पर भी विचार कर लेते हैं।’
अभय की थोड़ी उदार ‘लिव-इन पार्टनर’ शिखा ने कहा, ‘बताइए अभय! हम लोग बातों से आगे अब कुछ करना चाहते हैं।’ दीप्ति और सुनयना ने भी शिखा का समर्थन किया।

अभय ने भूमिका बनाते हुए कहा, ‘आज अमीर और खाते-पीते कामकाजी परिवारों के लड़के-लड़कियों की सबसे बड़ी समस्या है- उनका अकेलापन। वे अपने मन की बात परिवार से कहना चाहते हैं, लेकिन मां-बाप के पास उनको सुनने तक का समय नहीं। पैसा भरपूर ले लो, मगर, बात मत करो। बहुत-सी बातें दोस्तों से नहीं की जा सकतीं!… किशोर और युवा, पेरेंट्स से अनेक मन की बातें शेयर करना चाहते हैं, उनको छूना और गले लगाना चाहते हैं। लेकिन, माता-पिता उनके मन की हलचलों से अनजान अपने पैसा कमाने के मिशन में व्यस्त हैं।’
अजेय ने थोड़े आतुर होते हुए कहा, ‘यार, बात को फैला मत। मतलब की बात कर।’
अभय- ‘विदेशों की तर्ज पर, अकेलेपन से जूझते, ऐसे लाखों खाते-पीते नौजवानों को सांत्वना और संतुष्टि देने के लिए भारत के महानगरों में भी एक रोजगार पनप रहा है- ‘कडलिंग’ का।’
सुनील ने पूछा, ‘ये ‘कडलिंग’ क्या बला है?’
अभय ने प्रतिप्रश्न किया, ‘कडलिंग नहीं जानता? कडलिंग यानी भरपूर आलिंगन। शहरों में ऐसे असंतुष्ट नौजवान लड़के-लड़कियों को अपाइंटमेंट देकर बुलाया जाता है और पैसे लेकर उन्हें सुरक्षित वातावरण में ‘हग’ और ‘कडलिंग’ दी जाती है। मुंबई में आधा घंटे की कडलिंग के एक हजार वसूले जाते हैं।’
शिखा ने प्रतिवाद करते हुए कहा, ‘कडलिंग के बाद लड़के ‘किस’ भी करते होंगे?’
‘उसके अलग पैसे होते हैं।’ अभय ने समाधान किया, ‘एक ‘किस’ के सौ रुपए अतिरिक्त।’
सुनयना ने हंसते हुए पूछा, ‘अगर लड़का और आगे बढ़ना चाहे?’
अभय ने कहा, ‘नहीं-नहीं, यह पहले ही तय हो जाता है- ‘हग’ और ‘कडलिंग’ का आधे घंटे का चार्ज फिक्स है। आलिंगन और चुंबन से आगे कुछ नहीं।… आसपास हमारी टीम रहेगी ही।’
दीप्ति ने अपनी तरह से खुलासा करते हुए कहा, ‘सुनयना, कडलिंग के लिए सिर्फ लड़के नहीं, लड़कियां भी तो आएंगी। उसमें हमारे इन तीनों को भी रोल प्ले करना होगा।’

तीनों जोड़ों ने नैतिकता का फौरी सवाल नहीं उठाया।
सुनील ने फैसला जैसा सुनाते हुए कहा, ‘अब मुझे ड्यूटी पर निकलना होगा। आगे की बातचीत आज डिनर के बाद, अपने-अपने कमरों में जाने से पहले होगी।’
असल में तीनों जोड़ों ने मिल कर आनंद कॉलोनी में एक थ्री बीएचके फ्लैट किराए पर ले रखा था। हर लिव-इन जोड़े का एक कमरा निर्धारित था। हॉल में, चाय-नाश्ते से लेकर लंच-डिनर तक की साझा व्यवस्था थी। चाय-नाश्ता और खाना यों तो तीनों लड़कियां बनाती थीं, लेकिन किचन की लीडरशिप शिखा के पास थी। हर माह हर जोड़े से दस हजार रुपए लिए जाते थे, जिसमें फ्लैट के किराए से लेकर किचन तक को शामिल किया गया था।

तीनों लड़कों के बाहर निकल जाने के बाद सुनयना ने चाय बनाई और तीनों सखियां नए जॉब के विषय में बातें करने लगीं। नैतिकता का सवाल किसी ने नहीं उठाया, क्योंकि माता-पिता को बिना सूचित किए ‘लिव-इन’ में रहने का अपराधबोध तीनों के मन में पहले से ही था।
चाय का पहला घूंट लेते हुए सुनयना ने पूछा, ‘क्यों दीप्ति, भोपाल जैसे तीस लाख की आबादी वाले शहर में ‘कडलिंग’ का व्यवसाय फल-फूल सकता है?’
उत्तर शिखा ने दिया, ‘भोपाल में क्या नहीं हो रहा, हम लोग छह साल से ‘लिव-इन’ में रह रहे हैं या नहीं! अकेलेपन से जूझ रहे अमीरजादे दौड़ कर आएंगे कडलिंग के लिए। अगर यह इमोशनल प्रोफेशन चल निकला तो हम सबके वारे-न्यारे हो जाएंगे, हमारी शादी का रास्ता खुल जाएगा, सो अलग।’
आशंका व्यक्त करते हुए दीप्ति ने कहा, ‘कडलिंग और किसिंग करते-करते कहीं हम उस धंधे में न फंस जाएं।’
‘उस धंधे में क्यों फंसेंगे?’ शिखा ने आशंका को निर्मूल करते हुए कहा, ‘अगर हम अपने मेल पार्टनर के लिए ईमानदार रहेंगे तो ऐसा पाप नहीं होगा। जोर-जबर्दस्ती की स्थिति में हमारे पुरुष साथी आसपास होंगे ही।’

रात साढ़े आठ बजे तीनों जोड़ों ने मिल-बैठ कर ‘डिनर’ लिया। डिनर के बाद, रात नौ बजे चाय पीते हुए अभय ने ‘कडलिंग’ जॉब की सुबह वाली बात को आगे बढ़ाया, ‘जिस तरह से मंदी ने नौकरियों पर आक्रमण किया है, उसमें नौकरी की उम्मीद करना तो रेत में झरना खोजने जैसा है। कडलिंग भोपाल में नवाचार होगा। अगर चल निकला तो हमारे दिन फिर जाएंगे।’
सुनील ने सभी साथियों से पूछा, ‘क्या हम सब मिल कर कडलिंग प्रोफेशन के लिए तैयार हैं?’
सभी ने हाथ उठा कर समर्थन किया।
‘राइट!’ अजेय ने बात को आगे बढ़ाया, ‘इस नौकरी से महीने भर में जो भी कमाई होगी, उसे तीन हिस्सों में बांट लिया जाएगा।’
‘ठीक है।’ अभय बोला, ‘इस प्रोफेशन को आनंद कॉलोनी की जगह किसी ऐसी कॉलोनी में शुरू किया जाए, जो शहर से थोड़ी दूर हो- जैसे रतीबड़।’
‘वो तो सब ठीक है’, सुनयना ने प्रश्न किया, ‘लेकिन, पहले यह बताइए कि पुलिस से बचते हुए ‘कडलिंग’ के इच्छुक ग्राहकों को कैसे चुना जाएगा… उन्हें कैसे बुलाया जाएगा? हममें से कौन उनसे बात करके उन्हें अपाइंटमेंट देगा?’
सुनील ने सलाह दी, ‘लड़कों में अभय और लड़कियों में शिखा बात करे।’
अजेय ने कहा, ‘फर्जी नामों से चार सिम ली जाएं। कडलिंग के लिए दो फर्जी वाट्स ऐप और एक फेसबुक बनाई जाए।’
अभय ने कहा, ‘अकेलेपन की पीड़ा को लेकर एक संक्षिप्त विज्ञापन बनाया जाए, जिसे फेक वाट्स ऐप पर डाल कर पांच मिनट बाद डिलीट कर दिया जाए, फेक मोबाइल पर ग्राहक से बात की जाए। अपने नए अड्डे पर हम छहों लोग हाजिर रहें। लड़के से शिखा बात करे, लड़कियों से मैं। कडलिंग के लिए कमरे में जाने से पहले एक हजार रुपए फीस वसूल कर ली जाए। किसिंग के पैसे बाद में लिए जाएं। जोर-जबर्दस्ती होते ही हमारा पार्टनर चिल्ला दे, ताकि उचित सहायता की जा सके।’

योजना के मुताबिक, सबसे पहले ‘शीरीन डांस क्लास’ के नाम से रतीबड़ में एक दस हजार रुपए किराए पर सिंगलेक्स लिया गया। कडलिंग के लिए सुरक्षित कमरे को एक बेड सहित सादगी से सजाया गया। हॉल में डांस क्लास की सज्जा की गई। फेक वाट्स ऐप पर दिन में पांच बार कडलिंग का विज्ञापन डाल कर हर दस मिनट बाद डिलीट कर दिया गया।
एक हफ्ते बाद फेक मोबाइल नंबरों पर पूछताछ शुरू हुई। लड़कों से अधिक भोपाल की अमीर लड़कियों ने कडलिंग में रुचि दिखाई।
पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद, अभय और शिखा ने युवाओं को अपने रतीबड़ वाले पते के साथ इस तरह अपाइंटमेंट दिए कि एक समय में दूसरा न आ जाए। बारी-बारी से कडलिंग के लिए तीनों जोड़ों के महिला और पुरुष सदस्यों को नियुक्त किया गया। कैशियर का काम शिखा के पास रहा।
पहले महीने में ही कडलिंग और किसिंग से एक लाख अस्सी हजार रुपए की आय हुई। खर्च काट कर रुपए डेढ़ लाख बच गए- जो पचास-पचास हजार प्रति जोड़ा बांट लिया गया।

धीरे-धीरे ‘आलिंगन और चुंबन’ का यह व्यवसाय चल निकला, जिसमें युवाओं के ‘माउथ टु माउथ एड’ ने बड़ा काम किया। तीसरे महीने ही आय साढ़े तीन लाख तक पहुंच गई।
अकेलेपन के अवसाद में डूबे कुछ लड़के-लड़कियां तो इन जोड़ों के स्थायी ग्राहक बन गए। हर पुराने ग्राहक के साथ एक-दो नए ग्राहक आने लगे। अनेक लड़के सुनयना या शिखा की डिमांड करने लगे, कुछ को दीप्ति की कडलिंग पसंद थी। यही हाल पुरुष सदस्यों का भी हुआ। हरेक को पसंद करने वाली अलग-अलग लड़कियां थीं। कडलिंग के लिए आने वाले युवा प्राय: किशोर या बीस-इक्कीस की उम्र के व्यस्क होते थे।
बढ़ती कमाई ने तीनों जोड़ों का स्टेटस बढ़ा दिया। एक साल के भीतर तीनों ने अपनी-अपनी कारें खरीद लीं।
इधर सबसे अधिक उदार शिखा के प्रति एक कम-उम्र अमीरजादे अनिकेत की दीवानगी बढ़ रही थी। अनिकेत की उम्र बाईस से अधिक नहीं थी, जबकि शिखा अट्ठाईस पार कर चुकी थी। एक छुट्टी वाले दिन वह शिखा को अभय से पूछ कर लांग ड्राइव पर ले गया। लांग ड्राइव के बाद अपने महलनुमा घर ले जाकर उसने शिखा को ‘माई गर्ल फ्रेंड’ कह कर अपनी मां से मिलवाया।

अगले दिन से कडलिंग का व्यवसाय फिर उसी शैली में चलने लगा। अनिकेत रोज रतीबड़ आता रहा, शिखा भी उसको विशेष ग्राहक के रूप में महत्त्व देती रही। तभी अभय को पता लगा कि किसी पड़ोसी ने सिंगलेक्स में संदिग्ध गतिविधियों का हवाला देते हुए पुलिस को खबर कर दी है। अभय की सतर्कता से डांस क्लास के लिए पांच-छह फेक शिष्याओं को बुला लिया गया। पुलिस आई जरूर, लेकिन, संदिग्ध गतिविधियों का ‘क्लू’ न पाकर लौट गई।

लगभग एक महीने के लिए, कडलिंग प्रोफेशन को विराम दे दिया गया। आनंद कॉलोनी में तीनों स्टडी कपल्स का जीवन पुराने ढर्रे पर लौट आया। कडलिंग और किसिंग प्रोफेशन को स्थगित करने के बाद, अभय अपने एक बचपन के दोस्त की शादी में शिरकत करने शहडोल निकल गया। अभय के जाने के बाद शिखा और स्वतंत्र हो गई और अनिकेत के साथ पूरे-पूरे दिन गायब रहने लगी। तीसरे दिन, रात में भी नहीं लौटी। दस दिन के भीतर, अनिकेत ने अपने मम्मी-पापा की स्वीकृति के बाद शिखा से कोर्ट-मैरिज कर ली। सात फेरों के बाद, अमीरजादे का ग्रांड रिसेप्शन भी हो गया।

ठीक ग्यारह दिन बाद शहडोल से अभय के लौटने पर उसके चार साथियों ने उसे शिखा के अनिकेत से विवाह कर लेने का अशुभ समाचार सुनाया। सुन कर अभय अवसाद में चला गया। अभय की हालत देख कर सुनील ने अभय के बड़े भाई को शहडोल फोन कर दिया। अगले दिन, बड़े भाई आए और अभय को शहडोल लेकर चले गए।