सुमन कुमार सिंह
अमूर्त या अरूप चित्रों को देखते हुए आम दर्शकों की एक सामान्य प्रतिक्रिया रहती है कि कुछ समझ में नहीं आ रहा। हालांकि ऐसा उन सुधि दर्शकों के साथ नहीं होता है जो नियमित तौर पर कला प्रदर्शनियों में जाते रहते हैं, साथ ही कलाकारों से उनका नियमित संवाद बना रहता है। इस अमूर्त या अरूप की गुत्थी को समझाने में राजकमल चौधरी का लिखा हमारे लिए मददगार हो सकता है- अरूप-चित्र किसी भी देश, काल, परिस्थिति की सीमा से मुक्त-विमुक्त है। ये चित्र विषय मुक्त हैं।
अरूपवादी चित्रकार बाह्य जगत की सारी सीमाओं को, यथार्थों को, वस्तुओं और दृश्यों को भूलकर अपनी आत्मा, अपने अवचेतन, अपने अस्तित्व में प्रवेश करता है, और तब एक नए रूप, नए अस्तित्व को अपने अरूप-चित्र में प्रस्तुत करता है। लेकिन इतनी बातों के बावजूद लोग पूछते हैं कि अरूपवादी चित्रों का अर्थ क्या है- और अगर कोई अर्थ नहीं है, तो ‘डेकोरेटिव डिजाइन’ और ‘एब्स्ट्रेक्ट डिजाइन’ में फर्क क्या है? यह तय है कि अरूपवादी चित्रों की कोई वस्तुगत और विषयगत व्याख्या नहीं की जा सकती है लेकिन यह मात्र डेकोरेटिव डिजाइन नहीं है, कलाकृति है, यह समझने के लिए और कला के इतिहास और कला की वर्तमान शैलियों का विस्तृत अध्ययन करना आवश्यक है।
अगर विज्ञान के जटिल सिद्धांतों और उसकी वर्तमान उपलब्धियों को समझने के लिए शास्त्रीय ढंग से विज्ञान का अध्ययन करना आवश्यक है, अनिवार्य है- तो फिर ऐसा क्यों मान लेते हैं कि कलाकृतियों को समझने के लिए किसी शिक्षा और ज्ञान की आवश्यकता नहीं है? अगर रेडियो-सेट विज्ञान नहीं है, रेडियो-सेट के बनाए जाने का सिद्धांत या सूत्र ही विज्ञान है तो कलाकृति भी कला नहीं है, कलाकृति के जन्म के पीछे छिपी हुई कलाकार की मान्यताएं और उपलब्धियां ही कला है। यह भी कि कलाकृति को समझने के लिए उन मान्यताओं और उपलब्धियों को समझना आवश्यक है।
अमूर्त कलाकृतियों की रचना के पीछे कलाकार का भाव, दृष्टि व प्रयोजन क्या रहता है, इस समझ के साथ जब हम युवा कलाकार विवेक निंबोलकर की कृतियों के सामने होते हैं तो हमें इस रचनाकार की रचनाओं का भरपूर आनंद मिल पाता है। अपने देश की कला में आकृति के प्रति दिखने वाले आकर्षण की एक बड़ी वजह यह भी मानी जाती है कि हमारे यहां मंदिरों व अन्य धार्मिक स्थलों तथा राजा-रजवाड़ों के द्वारा लंबे समय तक कला को संरक्षण दिया जाता रहा है। कतिपय कारणों से हमारे लोकजीवन में भी कथाओं के वर्णन के लिए चित्रों का सहारा लिया जाता रहा है।
इसकी एक सुखद परिणति तो यह है कि एकतरफ तो अपने देश में विभिन्न लोककला शैलियों का विकास होता रहा, वहीं ग्रंथों व पुस्तकों को सुसज्जित करने के प्रयासों ने लघुचित्र शैलियों का विकास किया। अब इसमें एक बड़ा बदलाव तब आता है जब 20वीं सदी का कलाकार इन संरक्षणों से मुक्त हो पाया। इस संरक्षण के अभाव ने हालांकि कलाकारों के समक्ष जीवन-यापन की नई चुनौतियां भी पैदा कीं, लेकिन इसका एक सुखद पहलू यह सामने आया कि अब कलाकार विषयों और शैली के चयन को लेकर पहले से कहीं अधिक स्वतंत्र हो गया। वैसे यह तो किसी दावे से नहीं कहा जा सकता कि अपने यहां चित्रकला में अमूर्तन का चलन किन कारणों या प्रभावों से हो पाया। लेकिन यह सच तो है ही कि महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की कला में अमूर्तन को कुछ खास तवज्जो मिलती दिखती है।
दिलचस्प है कि विवेक भी उस अभिनव कला महाविद्यालय, पुणे के छात्र रह चुके हैं। जहां से निकले कई कलाकारों ने अमूर्त-चित्रण के क्षेत्र में अपना खास मुकाम हासिल किया है। जिनमें से एक हैं कलाकार उत्तम चापटे। वैसे सिर्फ महाराष्ट्र के अमूर्त कलाकारों की बात करें तो यह सूची काफी लंबी है, उसी तरह मध्य प्रदेश से भी युसुफ भाई, सीरज सक्सेना, अखिलेश समेत अनेक नाम हमारे जेहन में उभरते हैं। ऐसे में पुणे के किसी युवा का अमूर्तन में अपनी अलग पहचान बना पाने को मैं कुछ खास उपलब्धि के तौर पर ही देखता हूं।
पहली बार विवेक के चित्रों को देखने का मौका मुझे पिछले दिनों भोपाल में आयोजित विश्व रंग प्रदशर्नी में देखने को मिला था। इसके बाद इस कलाकार के अन्य कामों को देखने की जिज्ञासा ने सोशल मीडिया पर कुछ विस्तार से इनकी कृतियों को देखने को प्रेरित किया। मेरा मानना है कि अमूर्त में दोहराव का खतरा कुछ ज्यादा ही रहता है। खासकर रंग संयोजन व टेक्सचर आदि को लेकर, लेकिन यहां विवेक इन समस्याओं से जिस तरह से पार पाते हुए दिखते हैं उससे साफ है कि इनकी कला अपेक्षित परिपक्वता से संतृप्त हो चुकी है। विवेक की कृतियों में ऐसा कुछ नहीं है जो हमारे परिवेश से बिल्कुल बहार का हो, किंतु उसे जिस तरह से संयोजित किया गया है वह एक अलग संसार का आभास तो देता ही है।

