भारत की आजादी की दास्तां इस लिहाज से दिलचस्प है कि फिरंगियों के देश छोड़ने के फैसले के बाद देश के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व ने अपनी सूझबूझ से स्वतंत्र भारत का नया और बड़ा मानचित्र तैयार किया। खासतौर पर आज अगर हम कश्मीर को भारत का अटूट हिस्सा होने की बात फख्र के साथ कहते हैं, तो इसलिए कि इसे पाकिस्तान से बचाने में हमारी सेना ने अभूतपूर्व शौर्य का परिचय दिया। शौर्य और शहादत की इस गाथा के नायक हैं ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह।

भारत को आजादी के साथ विभाजन की बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी। यह कीमत इस लिहाज से भी बड़ी थी कि स्वतंत्र राष्ट्र बन जाने के बावजूद अपने सीमा विस्तार को लेकर पड़ोसी मुल्क की कुटिलताएं जारी रहीं। भारत और पाकिस्तान के बीच भिड़ंत का पहला और बड़ा मोर्चा बना कश्मीर। ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह जम्मू-कश्मीर की आर्मी के प्रमुख थे। रावलाकोट, मुजफ्फराबाद और उसके बाद चकोटी तक कब्जा कर चुके छह हजार से ज्यादा कबाइलियों व छह जैक के गद्दार जवानों के साथ 23 अक्तूबर 1947 को जब पाकिस्तानीसेना ने श्रीनगर की तरफ रुख किया तो उन्हें अपने मंसूबों की जीत सामने दिख रही थी। उन्हें इस बात का कहीं दूर तक भी भान नहीं था कि इसके आगे उनके दांत बुरी तरह खट्टे होने वाले हैं।

पाकिस्तान के नापाक मंसूबे के सामने जो भारतीय वीर चट्टान की तरह आ खड़ा हुआ, वे थे ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह। उन्होंने तीन दिन तक दुश्मन को कड़ा मुकाबला देते हुए कश्मीर पर रातोंरात कब्जा करने की पड़ोसी मुल्क की नापाक मंशा पर पानी फेर दिया। दरअसल, जब पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला किया तो महाराजा हरि सिंह ने ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह से उन्हें रोके रखने का आदेश दिया। ब्रिगेडियर सिंह ने बमुश्किल 150 जवानों और बहुत ही कम हथियारों की मदद से हजारों पाकिस्तानी हमलावरों को तीन दिनों तक रोके रखा। उस दौरान महाराजा हरि सिंह को भारत में कश्मीर के विलय का मौका मिल गया और भारतीय सेना मदद के लिए पहुंच गई।

ब्रिगेडियर सिंह ने कबायलियों को रोकने के लिए जिस बहादुरी का परिचय दिया, वह बेमिसाल है। दुश्मन की ओर से हो रही गोलाबारी में वे बुरी तरह घायल हो गए थे। इसके बावजूद वे दुश्मन से लड़ते रहे और कबायलियों को रोके रहे। 27 अक्तूबर, 1947 को आखिरकार वे शहीद हो गए। जम्मू-कश्मीर के लोगों के बीच ब्रिगेडियर सिंह को ‘कश्मीर का रक्षक’ के नाम से जाना जाता है।

जम्मू के जीजीएम साइंस कालेज से ग्रेजुएशन करने वाले ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह ने 14 जून 1921 को जम्मू कश्मीर आर्म्ड फोर्स में कमीशन लिया था और वे मई 1942 में ब्रिगेडियर के रैंक पर पहुंचे थे। 25 सितंबर 1947 को मेजर जनरल रैंक के पदोन्नत हुए। ब्रिगेडियर सिंह को मरणोपरांत देश के पहले महावीर चक्र से सम्मानित किया गया।

फील्ड मार्शल केएम कैरियप्पा ने 30 दिसंबर 1949 को जम्मू संभाग में बगूना-सांबा के इस सपूत की वीर पत्नी रामदेई को सम्मानित किया था। उनका पूरा नाम था- राजेंद्र सिंह जम्वाल। अपने शौर्य, अदम्य साहस, कुशल रणनीति, देशभक्ति और शहादत के बूते कश्मीर का भारत में विलय कराने और पाक के नापाक इरादों को तारीखी तौर पर शिकस्त देने वाले इस अमर सैनिक पर हर भारतीय को गर्व है।