आत्माराम भाटी
हॉकी के मैदान में भारत की युवा टीम ने काबिलेतारीफ प्रदर्शन किया है। भारतीय जूनियर हॉकी टीम ने लखनऊ में संपन्न 11वें विश्व हॉकी कप के खिताब को दूसरी बार अपने नाम किया। जबकि सीनियर टीम ( पुरुष) सिर्फ 1975 में विश्व खिताब जीत पाई थी। भारतीय जूनियर टीम ने इससे पहले 2001 में यह खिताब पहली बार जीता था। फिलहाल, हरजीत सिंह की कप्तानी में जीतने वाली मौजूदा युवा टीम ने विरोधियों के छक्के छुड़ा दिए। जब भारत की मेजबानी में यह विश्व कप आठ दिसंबर से लखनऊ में प्रारंभ हुआ, उस समय खिताब के मजबूत दावेदारों में छह बार के विजेता जर्मनी के साथ 1997 की विजेता आस्ट्रेलिया को मजबूत माना जा रहा था। लेकिन भारतीय हॉकी के भविष्य के सितारों ने अपने दमदार खेल के बल पर बिना कोई मैच हारे दूसरी बार विश्व कप पर भारत के नाम की मुहर लगा दी।
जैसे ही लखनऊ के मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में भारत और बेल्जियम के मध्य खेले गए खिताबी मुकाबले की अंतिम सीटी 2-1 के गोल स्कोर के साथ भारत के पक्ष में बजी, टीम के कोच हरेंद्रसिह व सीनियर हॉकी टीम के कोच रोलेंट आॅल्टोमेंस खुशी से उछल पड़े। मैदान पर उपस्थित हजारों दर्शकों की खुशी से स्टेडियम गूंज उठा। जीत की खुशी में मैदान पर भारतीय खिलाड़ी तो इतने उत्साहित हो गए कि वहीं पर पूरी टीम ने स्टेडियम में बज रहे डीजे पर भांगड़ा करना शुरू कर दिया। उत्साहित होना वाजिब भी हथा, क्योंकि भारतीय हॉकी के जांबाजों ने विश्व कप जो जीता था। भारतीय टीम ने अपना वही दमदार प्रदर्शन खिताबी मुकाबले में बनाए रखा जिसके दम पर वह लगातार पांच मैच जीतकर खिताबी पायदान पर पहुंचे थे। टीम ने लीग के तीन मैंचों में कनाडा को 4-0, इंग्लैंड को 5-3, साउथ अफ्रीका को 2-1 से हराकर सबको चेतावनी दे दी थी। यह सिलसिला क्वार्टर फाइनल में भी जारी रहा, जब स्पेन को 2-1 से हराया था।
सेमीफाइनल में भारत के सामने खिताब की मजबूत दावेदार आस्ट्रेलिया थी। दोनों के बीच सभी को कड़े मुकाबले की उम्मीद थी। हुआ भी ऐसा ही, जब निर्धारित समय तक दोनों ही टीमें 2-2 की बराबरी पर रहीं। लेकिन इसके बाद पेनाल्टी स्ट्रोक में भारतीय टीम ने अपने गोलकीपर विकास दहिया के शानदार बचावों के बल पर 1997 की इस विजेता टीम पर 4-2 से जीत दर्ज करते हुए खिताबी मुकाबले में प्रवेश कर दिखला दिया कि उसे अब खिताब जीतने से कोई नहीं रोक सकता है। भारतीय टीम के लिए खुशी की बात यह भी रही कि उसके सामने खिताबी मुकाबले में पहली बार फाइनल में पहुंची बेल्जियम की टीम थी, जिसने अप्रत्याशित रूप से छह बार की विजेता जर्मनी को निर्धारित समय तक कड़ा मुकाबला करते हुए 0-0 पर रोक दिया। इसके बाद पेनॉल्टी स्ट्रोक में भाग्य ने बेल्जियम का साथ दिया और मजबूत टीम जर्मनी के खिलाड़ी एक स्ट्रोक को गोल में बदलने में कामयाब नहीं हो पाए और बेल्जियम इस मैच को 4-3 से जीतकर पहली बार खिताबी मुकाबले में प्रवेश करने में कामयाब हो गया।
अ ठारह दिसंबर को खेले गए 11वें विश्व हॉकी विश्व कप के खिताबी मुकाबले में जर्मनी की बजाय बेल्जियम के सामने होने से भारतीय टीम ही नहीं भारतीय दर्शकों को भी पूरी उम्मीद थी कि यह विश्व कप भारत से बाहर नहीं जाएगा। इसका प्रमाण भी खिताबी मुकाबले के पहले हाफ में शुरुआत में दिखाई देने लग गया, जब भारत के गुरजंत सिंह ने आठवें मिनट में ही गोल कर भारत को 1-0 की बढ़त दिला दी। इसके ठीक 14 मिनट बाद खेल के 22वें मिनट में सिमरनजीत सिंह ने दूसरा गोल कर भारतीय टीम के हौसले बुलंद कर दिए। इस गोल स्कोर को बरकरार रखने में भारत के अन्य खिलाड़ियों कृष्ण बहादुर, हरमनप्रीत सिंह, वरुण कुमार, सुमित कुमार, कप्तान हरजीत सिंह व गोलकीपर विकास दहिया ने पूरी मेहनत से अपने खेल के स्तर को बनाते हुए बेल्जियम के हर आक्रमण को फीका किया। बेल्जियम बस खेल के अंतिम मिनट में मिले पेनॉल्टी कॉर्नर को फैब्रिक वान के सहारे गोल में परिवर्तित कर अपनी हार के अंतर को 1-2 से कम कर पाया। जैसे ही इस विश्व कप के खिताबी मुकाबले की अंतिम सीटी बजी दर्शकों से भरा मेजर ध्यानचंद स्टेडियम भारत की जीत की खुशी में झूमने लग गया।
इ स विश्व कप में कुल सोलह टीमों ने भाग लिया था। इन टीमों को 4-4 के समूह में रखा गया था। पहले समूह में आस्ट्रेलिया, अर्जेंटीना, कोरिया और आस्ट्रिया था। दूसरे समूह में नीदरलैंड, बेल्जियम, पाकिस्तान व मिस्र था। तीसरे समूह में जर्मनी, न्यूजीलैंड, स्पेन और जापान तथा चौथे समूह में भारत के साथ इंग्लैंड, साउथ अफ्रीका, कनाडा थे। प्रतियोगिता में कुल 44 मैच इन 16 टीमों के मध्य खेले गए, जिसमें से 37 लीग मैचों में समूह एक से आस्ट्रेलिया, समूह दो से बेल्जियम, समूह तीन से जर्मनी व समूह चार से भारत ने अपने सभी लीग मैच जीतकर नौ अंकों के साथ क्वार्टर फाइनल में प्रवेश किया। क्वार्टर फाइनल में भारत ने स्पेन को, बेल्जियम ने अर्जेंटीना को, जर्मनी ने इंग्लैंड को तथा आस्ट्रेलिया ने नीदरलैंड को हराकर सेमीफाइनल की पायदान तक अपने को पहुंचाया। सेमीफाइनल मैच दोनों ही शानदार रहे। दर्शकों को इन मैचों से खेल का पूरा लुत्फ मिला। सेमीफाइनल में खिताब की मजबूत दावेदार दोनों ही टीमों- जर्मनी को बेल्जियम के हाथों और आस्ट्रेलिया को भारत के हाथों अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा।
आज अगर भारत की इस युवा टीम ने विश्व खिताब जीता है तो इसके लिए भारत की सीनियर टीम द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किए गए प्रदर्शन ने भी प्रेरणा का काम किया है। जिस तरह से पिछले कुछ सालों से सीनियर भारतीय हॉकी टीम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहतरीन प्रदर्शन कर पिछली सदी में खोई पहचान को प्राप्त करने में सफल हुई है। साथ ही भारत में हो रही पेशेवर हॉकी लीग में विदेशी खिलाड़ियों के साथ खेलकर भारतीय खिलाड़ियों को उनके अनुभव का लाभ मिल रहा है। इसका फायदा देश के युवा हॉकी खिलाड़ियों को मिल रहा है। दूसरी ओर जब से रोलेंट आॅल्टमेंस भारत के कोच बने हैं। उनके बेहतरीन मार्गदर्शन से भारतीय खिलाड़ी पेनॉल्टी कॉर्नर को गोल में बदलने की खामी में काफी हद तक सुधार करने में कामयाब हो रहे हैं। साथ ही अंतिम समय में विरोधी से गोल खाने का जो सिलसिला चल रहा था उसके लिए भी मानसिक रूप से मजबूती मिली है। इसी का फायदा देश के युवा खिलाडियों को मिल रहा है, जिसके कारण ही आज भारत की जूनियर टीम दूसरी बार पंद्रह साल बाद देश की झोली में विश्व कप डालने में सफल रही है। १

