क्या कभी नन्हे-मुन्ने बच्चों ने यह सोचा होगा कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब उनका स्कूल जाना ही नहीं, पार्क जाना, शाम को खेलना आदि सब बंद हो जाएगा? नहीं न। उन्होंने कभी ये भी नहीं सोचा होगा कि पंचतंत्र और कॉमिक्स की कहानियों के किरदारों की तरह उनके पेड़ों पर चढ़ने पर पाबंदी लग जाएगी। छोटा भीम की तरह वे गली में नहीं भाग पाएंगे तो नोबिता की तरह शाम को अपने दोस्तों के साथ पार्क में क्रिकेट नहीं खेल पाएंगे। यहां प्रश्न यह है कि जब पूरी दुनिया कोरोना नाम की महामारी से जूझ रही है तो ऐसे में इन मासूमों का क्या दोष। उनकी मासूमियत, उनका बचपन आखिर कब तक घर में कैद रहेगा।
रिदॉय तीन दिन से सुबह उठते ही अपने पापा से रोज कई बातें पूछता है- पापा मेरा स्कूल कब खुलेगा, आप मुझे पार्क लेकर कब जाओगे? आइसक्रीम कब दिलवाओगे? दूध-सब्जी की दुकानें खुली हैं तो मिठाई की दुकान क्यों बंद है? ऐसे ही न जाने और कितने ही सवाल। जाहिर है कि इनमें से ज्यादातर सवालों के जवाब उसके माता-पिता के पास भी नहीं हैं। आज हम सभी घर से बाहर नहीं निकलने की हिदायतों का पालन करने को मजबूर हैं। बड़े तो खुद को जैसे-तैसे समझा भी लें पर बच्चों का क्या?
आइए, हम आपको बताते हैं कि अपने बच्चों का मन बनाए रखने के लिए पूर्णबंदी के इन दिनों में खास क्या-क्या किया जा सकता है। फरवरी महीने से बच्चों के स्कूल आदि बंद हो गए थे। पहले तो दिल्ली में हुए दंगों के कारण और फिर कोरोना की वजह से। मैं अपने स्कूल को बहुत याद कर रहा हूं। मैंने न्यूज देखना छोड़ दिया है। वो सब देखकर बस मन उदास होता है। मैं इन दिनों वो सब कर रहा हूं, जो स्कूल के दिनों में नहीं कर पाता था। मैं आॅनलाइन फ्रेंच भाषा सीख रहा हूं। यह कहना है चौदह साल के आयुष का, जो इस समय नौवीं कक्षा में है। उसका मानना है कि स्कूल के दिनों में गृहकार्य की वजह से दूसरी गतिविधियों से वो दूर हो गया था। अब वो इस समय को अच्छे से इस्तेमाल कर पा रहा है।
वहीं, आठवीं में पढ़ने वाली छवि कहती है, ‘मैं समझ चुकी हूं कि मुझे क्या करना है। मैं खुश रहने के लिए एनिमेटिड बुक्स पढ़ती हूं। कुछ-कुछ क्रिएटिव थिंग्स बनाती हूं। मैं पेंटिंग भी कर रही हूं। मुझे मजा आता है भैया को तंग करने में भी। अब वे सारे दिन मेरे साथ खेलते हैं।’ दसवीं और ग्यारहवीं में पढ़ने वाले भाई-बहन अमन और आराध्या कहते हैं, ‘हम दोनों खुश हैं। हां, स्कूल की याद आती है। हम दोनों दिन भर कैरम और लूडो खेलते हैं। बहन मुझे विज्ञान पढ़ाती है और मैं उसे गणित। हम घर में ही क्विज खेलते हैं और मम्मी को सारा दिन तंग करते हैं।’
फिक्र बड़े बच्चों की भी
अब बात करते हैं तीन से सात साल की उम्र के बच्चों की, जो रोज शाम को साइकिल चलाने जाते थे। आज घर में बैठे हैं। उनका क्रिकेट, झूला आदि सब बंद है। वे घर में क्या करें? उन्हें तो पता ही नहीं कि ये सब क्यों हो रहा है। इस दौर से निपटने में उनके माता-पिता और स्कूलों की अहम भूूमिका है कि वे लोग कुछ सकारात्मक प्रयास के साथ बच्चों की रचनात्मकता को खत्म न होने दें। अब सवाल है कि ऐसे मासूमों के लिए स्कूल या माता-पिता क्या कर रहे हैं?
माता-पिता के कार्य
जरूरी यह है कि पहले तो बच्चों को सुबह उसी समय उठाइए, जो समय स्कूल जाने के लिए था। उन्हें अपने साथ छत पर ले जाकर कुछ व्यायाम करवाइए। क्योंकि केवल कमरे और बालकनी तक जाने से तो कुछ नहीं होगा। उन्हें बिठा कर अच्छे से नाश्ता करवाएं। खाने का विशेष ध्यान रखें। क्योंकि अब इस समय खेलकूद तो है नहीं। मोटापा बढ़ेगा। हो सकता है कि कुछ बच्चों को ये सौगात लगे कि वे अब टीवी पर कार्टून देख सकते हैं। लेकिन ऐसे हालात में बच्चों को लेकर यूनिसेफ के जो दिशानिर्देश हैं, उनका पालन किया जाना चाहिए।
एक सीमित समय तक ही टीवी या मोबाइल उन्हें दिया जाए अन्यथा आंखों पर बुरा असर पड़ सकता है। उन्हें चश्मा लग सकता है। भले ही स्कूल बंद है, कई बच्चों के पास नई किताबें भी नहीं होंगी, इसके बावजूद उनके माता-पिता को थोड़ा उनकी पढ़ाई-लिखाई के बारे में भी सोचना चाहिए। बच्चों को आॅनलाइन पुस्तकें, जैसे कि ई-कॉमिक्स, बाल पत्रिकाएं आदि पढ़ाएं। बायजूस जैसे आॅनलाइन ऐप्स ने एक अच्छी पहल की है कि उन्होंने अपनी 4-12वीं कक्षा तक की सारी सामग्री अप्रैल महीने तक फ्री कर दिया है। आप केवल प्लेस्टोर से ऐप को डाउनलोड कर उनके द्वारा बच्चों के लिए बनाई गई तरह-तरह की पढ़ाई का वीडियो दिखा सकते हैं। ऐसे ही बहुभाषीय ऐप ‘डुओलिंगो’ के माध्यम से नई-नई भाषाओं को सीखा जा सकता है।
तरह-तरह की पेंटिंग ऐप भी मौजूद हैं, उन्हें बच्चों को दीजिए। बच्चों को घर के कामों में हाथ बंटाना सिखाइए। कहानियां पढ़कर सुनाएं, कुछ तौर तरीके समझाएं। उनसे कुछ क्रिएटिव करवाएं। जैसे घर सजाना, फूलों को पानी देना, खाना बनाने में मदद करना। उनके साथ घर पर आप खेलें। उनका मन बहलाएं। उनकी रचनात्मकता को उभारें। उनके साथ ज्यादा से ज्यादा समय बिताते हुए उन्हें यह बताएं कि कुछ ही दिनों में स्कूल खुलेंगे और सब पहले की तरह सामान्य हो जाएगा।
स्कूलों की जिम्मेदारी
कुछ स्कूलों ने अपने पाठ्यक्रमों को सुचारू रूप से जारी रखने के लिए बच्चों के माता-पिता का वॉट्सऐप पर समूह बनाया हुआ है। उस पर उनके अध्यापक अलग-अलग वीडियो शेयर करते हैं, गृहकार्य देते हैं। बच्चों की मॉनिटरिंग उसी के जरिए की जाती है। अध्यापक फोन पर बच्चों से बातें करते हैं। कई स्कूलों ने ई-कक्षाएं भी शुरू कर दी हैं पर यह बहुत हद तक कारगर नहीं है। कारण कि सबके पास लैपटॉप, नेटवर्क आदि की सुविधा नहीं है। वहीं, कुछ सरकारी स्कूल अभी भी स्मार्ट क्लासेज जैसी सुविधाओं से वंचित हंै।

