आजादी के बाद भारत की सबसे बड़ी त्रासदी किसको कहा जा सकता है?’ अगर इस सवाल का जवाब ईमानदारी से खोजा जाए तो वह होगा- कोई पचास करोड़ लोगों का अपने पुश्तैनी घर, गांव, रोजगार से पलायन। और ‘आने वाले दिनों की सबसे भीषण त्रासदी क्या होगी?’ आर्थिक-सामाजिक ढांचे में बदलाव का अध्ययन करें, तो जवाब होगा- पलायन से उपजे शहरों का- ‘अरबन-स्लम’ में बदलना। देश की लगभग एक तिहाई आबादी 31.16 प्रतिशत अब शहरों में रह रही हैं। 2011 की जनगणना के आंकड़े गवाह हैं कि गांव छोड़ कर शहर की ओर जाने वालों की संख्या बढ़ रही है और अब सैंतीस करोड़ सत्तर लाख लोग शहरों के बाशिंदे हैं। सन 2001 और 2011 के आंकड़ों की तुलना करें तो पाएंगे कि इस अवधि में शहरों की आबादी में नौ करोड़ दस लाख का इजाफा हुआ, जबकि गांवंों की आबादी नौ करोड़ पांच लाख ही बढ़ी।

गांवों में जीवन-स्तर में गिरावट, शिक्षा, स्वास्थ्य, मूलभूत सुविधाओं का अभाव, रोजगार की कमी है और लोग बेहतर जीवन की तलाश में शहरों की ओर आ रहे हैं। शहर बनने की त्रासदी की बानगी है, सबसे ज्यादा सांसद देने वाला राज्य उत्तर प्रदेश। पिछली जनगणना में यहां की कुल आबादी का अस्सी फीसद गांवों में रहती थी और इस बार यह आंकड़ा 77.7 प्रतिशत हो गया। बढ़ते पलायान के चलते 2011 में राज्य की जनसंख्या की वृद्धि 20.02 रही, इसमें गांवों की बढोतरी 18 प्रतिशत है, तो शहरों की 28.8। सनद रहे कि पूरे देश में शहरों में रहने वाले कुल 7.89 करोड परिवारों में से 1.37 करोड झोपड़-झुग्गी में रहते हैं और देश के दस सबसे बड़े शहरी स्लमों में मेरठ और आगरा शुमार हैं। मेरठ की कुल आबादी का चासील फीसद स्लम में रहता है, जबकि आगरा की 29.8 फीसद आबादी झोपड़-झुग्गी में रहती है।

राजधानी दिल्ली में जन सुविधाएं, सार्वजनिक परिवहन और सामाजिक ढांचा- सब कुछ बुरी तरह चरमरा गया है। कुल 1483 वर्ग किमी में फैले इस महानगर की आबादी कोई सवा करोड़ से अधिक हो चुकी है। हर रोज तकरीबन पांच हजार नए लोग यहां बसने आ रहे हैं। अब यहां का माहौल और अधिक भीड़ को झेलने में कतई समर्थ नहीं है। ठीक यही हाल देश के अन्य सात महानगरों, विभिन्न प्रदेशों की राजधानियों और औद्योगिक वस्तियों का है। इसके विपरीत गांवों में ताले लगे घरों की संख्या में दिनों-दिन इजाफा हो रहा है। देश की अर्थव्यवस्था का कभी मूल आधार कही जाने वाली खेती और पशु-पालन के व्यवसाय पर अब मशीनधारी बाहरी लोगों का कब्जा हो रहा है। उधर रोजगार की तलाश में गए लोगों के रंगीन सपने चूर हो चुके हैं, पर उनकी वापसी के रास्ते जैसे बंद हो चुके हैं। गांवों के टूटने और शहरों के बिगड़ने से भारत के पारंपरिक सामाजिक और आर्थिक संस्कारों का चेहरा विद्रूप हो गया है। परिणामत: भ्रष्टाचार, अनाचार, अव्यवस्था का बोलबाला है।

शहर भी दिवास्वप्न से ज्यादा नहीं हैं, देश के अन्य 9735 शहर भले आबादी से लबालब हों, लेकिन उनमें से मात्र 4041 को सरकारी दस्तावेज में शहर की मान्यता मिली है। शेष 3894 शहरों में शहर नियोजन या नगर पालिका तक नहीं है। यहां बस खेतों को उजाड़ कर बेढब अधपक्के मकान खड़े कर दिए गए हैं, जहां पानी, सड़क, बिजली आदि गांवों से भी बदतर है।