क्रांति की लड़ाई में झांसी की रानी, कानपुर के नाना साहेब, तात्यां टोपे, इलाहाबाद के लियाकत अली से लोग वाकिफ हैं। इनके योगदान को इन शहरों में काफी हद तक संजो कर रखा भी गया है। इसके अलावा 1857 में क्रांति की मशाल ब्रज में भी जली। विद्रोह में शामिल राया के राजा देवी सिंह ने मथुरा में अंग्रेज अफसरों को हिला कर रख दिया था। जिला मुख्यालय से करीब चौदह किमी दूर स्थित कस्बा राया है। यहां अचरू लधौरा के देवी सिंह ने साथियों के साथ मिल कर एक दल बनाया। अपने सैनिकों के साथ उन्होंने सरकारी दफ्तर, इमारत, पुलिस चौकियां, बंगलों को आग लगा दी थी। कलक्टर थॉर्नहिल जान बचा कर भरतपुर भाग गया।
उनकी वीरता की बात बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह ने दिल्ली के राजा बहादुर शाह जफर को बताई। राजा ने लिखित सनद देकर उन्हें ब्रज क्षेत्र का राजा घोषित किया। इससे परेशान ब्रिटिश हुकूमत ने स्थिति नियंत्रित करने के लिए कोटा और ग्वालियर से फौज बुलाई। कलक्टर हिल ने कोटा की फौज आने के बाद कैप्टन डेनिश के साथ मिलकर अभियान चलाया और स्वतंत्र शासक देवी सिंह को पकड़ लिया। 29 जून को उन्हें सहयोगी के साथ राया में थाने के पीछे एक वटवृक्ष से फंदे पर लटका दिया गया। कई पुस्तकों में इसका उल्लेख है लेकिन राजा की स्मृतियों का स्मारक बदहाल है। जहां उन्हें फांसी पर लटकाया गया था, वहां एक पार्क बना है, लेकिन वह उपेक्षित है।
शाहजहांपुर की पुवायां तहसील का किस्सा सुधीर विद्यार्थी बताते हैं: मोहम्मदी में पुवायां के राजा जगन्नाथ सिंह के घर अंग्रेज छिपे थे। मौलवी साहब, जिन्होंने लखनऊ की सत्ता संभालने से इनकार कर दिया था, हाथी पर चढ़ कर गए और अंग्रेजों को निकालने के लिए कहा। बाद में उन्होंने फाटक तुड़वा दिया। लेकिन अंगरक्षकों ने मौलवी को मार गिराया। उनका सिर काट कर राजा ने डीएम को भेंट किया था, उस समय डीएम ने रुहेलखंड के कमिश्नर को पत्र लिख कर पचास हजार रुपए इनाम दिलवाया था राजा को। मौलवी का सिर काट कर दहशत के लिए पेड़ पर लटका दिया गया। उनकी भी यहां केवल मजार बनाई गई है। इसके अलावा फर्रुखाबाद में नवाब तफज्जुल हुसैन को फांसी दी गई थी। जलालाबाद में भी लड़ाई से जुड़े साक्ष्य हैं। यहां के महल का कुछ हिस्सा नगरपालिका कार्यालय बना हुआ है।

