रांगेय राघव हिंदी साहित्य के विलक्षण उपन्यासकार, कहानीकार, निबंधकार, आलोचक, नाटककार, कवि और इतिहासवेत्ता थे। उन्हें हिंदी साहित्य का शेक्सपियर कहा जाता है, जबकि वे मूलत: तमिलभाषी थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के आगरा में हुआ था। राघव का मूल नाम तिरुमल्लै नंबाकम वीर राघव आचार्य था, जिन्हें बाद में रांगेय राघव के नाम से जाना गया।

पढ़ाई-लिखाई
उनकी पढ़ाई-लिखाई आगरा में ही हुई। 1944 में सेंट जोन्स कॉलेज से स्नातकोत्तर और 1948 में आगरा विश्वविद्यालय से गुरु गोरखनाथ पर पीएचडी की। महज तेरह साल की अल्पायु से रांगेय राघव ने लिखना शुरू कर दिया था। शुरुआत कविता लिखने से हुई थी। रांगेय राघव की प्रथम रचना 1946 में ‘घरौंदा’ शीर्षक से प्रकाशित हुई। यह विश्वविद्यालय जीवन पर लिखा गया हिंदी का प्रथम उपन्यास था। ‘घरौंदा’ उपन्यास से वे प्रगतिशील कथाकार के रूप में चर्चित हुए। 1942 में अकालग्रस्त बंगाल की यात्रा के बाद उन्होंने रिपोर्ताज ‘तूफानों के बीच’ लिखा, जिसे खूब प्रसिद्ध मिली। साहित्य के अलावा उनकी चित्रकला, संगीत और पुरातत्त्व में भी विशेष रुचि थी।

रचनाओं में स्त्री का स्थान
रांगेय राघव के अधिकतर ऐतिहासिक उपन्यास उन चरित्रों से जुड़ी महिलाओं के नाम पर लिखे गए हैं, जैसे ‘भारती का सपूत’, जो भारतेंदु हरिश्चंद्र की जीवनी पर आधारित है, ‘लखिमा की आंखें’ विद्यापति के जीवन पर, ‘रत्ना की बात’ तुलसी के जीवन पर और ‘देवकी का बेटा’ कृष्ण के जीवन पर आधारित है। इसके अलावा रांगेय राघव ने ऐतिहासिक या पौराणिक पात्रों को एक स्त्री के नजरिए से देखने की कोशिश की, जबकि उस समय हिंदी साहित्य में आधुनिक स्त्री विमर्श का पदार्पण भी ठीक से नहीं हुआ था। उनकी कहानी ‘गदल’ आधुनिक स्त्री विमर्श की कसौटी पर खरी उतरती है। यह कहानी बहुत लोकप्रिय हुई, जिसका अनेक विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हुआ। रांगेय राघव के प्रसिद्ध उपन्यास ‘कब तक पुकारूं’ पर एक टेलीविजन धारावाहिक भी बना था। 1948 में उनका दूसरा उपन्यास ‘मुर्दों का टीला’ प्रकाशित हुआ, इसकी कहानी सिंधु घाटी सभ्यता पर आधारित थी।

हिंदी के शेक्सपियर
रांगेय राघव ने जर्मन और फ्रांसीसी के कई साहित्यकारों की रचनाओं का हिंदी में अनुवाद किया। उन्होंने शेक्सपियर के दस नाटकों का भी हिंदी में अनुवाद किया, वे अनुवाद मूल रचना सरीखे थे, इसलिए रांगेय राघव को ‘हिंदी के शेक्सपियर’ की संज्ञा दी गई। संस्कृत रचनाओं के अलावा विदेशी साहित्य का भी हिंदी में अनुवाद किया। रांगेय राघव के बारे में कहा जाता था कि ‘जितने समय में कोई व्यक्ति पुस्तक पढ़ेगा, उतने समय में वे किताब लिख सकते थे।’

कई भाषाओं के ज्ञाता
रांगेय राघव तमिल, तेलगु के अलावा हिंदी, अंग्रेजी, ब्रज और संस्कृत भाषा के विद्वान थे। उन्हें साहित्य की सभी विधाओं में महारत हासिल थी। उन्होंने मात्र अड़तीस वर्ष की अल्पायु में उपन्यास, कहानी, कविता, आलोचना, नाटक, यात्रा वृत्तांत, रिपोर्ताज के अतिरिक्त सभ्यता, संस्कृति, समाजशास्त्र, मानवशास्त्र, अनुवाद, चित्रकारी, शोध और व्याख्या के क्षेत्रों में डेढ़ सौ से भी अधिक पुस्तकें लिखी। अपनी अद्भुत प्रतिभा, असाधारण ज्ञान और लेखन क्षमता के कारण वे अद्वितीय लेखक माने जाते हैं।

सम्मान
रांगेय राघव को 1951 में हिंदुस्तानी अकादमी पुरस्कार, 1954 में डालमिया पुरस्कार, 1957 और 1959 में उत्तर प्रदेश सरकार पुरस्कार और 1961 में राजस्थान साहित्य अकादमी से सम्मानित किया गया। 1966 में मरणोपरांत उन्हें महात्मा गांधी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

निधन : लंबी बीमारी के कारण 12 सितंबर, 1962 को मुंबई में उनका निधन हो गया।