दत्तात्रेय रामचंद्र कापरेकर भारतीय गणितज्ञ थे। उन्हें ‘गणितानंद’ के रूप में भी जाना जाता है। उन्होंने संख्या सिद्धांत के क्षेत्र में अनेक योगदान दिया, जिनमें से कापरेकर संख्या तथा कापरेकर स्थिरांक प्रमुख हैं। महाराष्ट्र में मुंबई से सौ किलोमीटर दूर दहानु में उनका जन्म हुआ था। उनके पिता को ज्योतिष शास्त्र से बहुत लगाव था। पिता के इस शौक से कापरेकर में संख्याओं को लेकर जिज्ञासा पैदा हुई।
प्रारंभिक शिक्षा
कापरेकर की माध्यमिक शिक्षा ठाणे में हुई। फिर पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज और स्नातक की शिक्षा मुंबई विश्वविद्यालय से हुई थी। उन्होंने स्नातकोत्तर शिक्षा नहीं ली थी, इसके बावजूद नाशिक के एक विद्यालय में अध्यापक थे और 1962 तक सेवानिवृत्त होने तक इस पद पर रहे। आवर्ती दशमलव, मैजिक वर्ग और विशेष गुणों वाले पूर्णांक जैसे विषयों के बारे में उनके कई शोधपत्र प्रकाशित हुए थे।
‘कापरेकर संख्या’ तथा ‘कापरेकर स्थिरांक’
उन्होंने संख्या सिद्धांत पर काम किया और संख्याओं के विभिन्न गुणों का वर्णन किया। ‘कापरेकर संख्या’ तथा ‘कापरेकर स्थिरांक’ उनके नाम से जाने जाते हैं। उन्होंने ‘स्वयं संख्या’ या ‘देवलाली संख्या’, ‘हर्षद संख्या’ और ‘डेमलो संख्या’ का वर्णन किया। उन्होंने कोपरनिकस मैजिक स्क्वायर से संबंधित कुछ प्रकार के मैजिक वर्गों का भी निर्माण किया था।
अंतरराष्ट्रीय पहचान
उच्च शिक्षा प्राप्त न होने के कारण भारत में गणितज्ञों ने उन्हें वह सम्मान नहीं दिया, जो उन्हें मिलना चाहिए था। भारतीय गणितज्ञों ने उनका मजाक उड़ाया और उनकी खोज को बेतुका बताया। उनके शोधपत्र निम्न-स्तरीय गणित पत्रिकाओं या निजी रूप से छपा करते थे। वे गणित के सम्मेलनों में अपने पैसे से जाते थे और अंकों पर व्याख्यान देते थे। 1949 में मद्रास में गणित का एक सम्मेलन हुआ था, जिसमें उन्होंने अपनी खोज से दुनिया को परिचित कराया, जिसके बाद लोग उन्हें जानने लगे थे। हालांकि उन्हें देश और देश से बाहर ख्याति तब मिली जब अमेरिकी लोकप्रिय गणित और विज्ञान लेखक मार्टिन गार्डनर ने कापरेकर के बारे में मार्च, 1975 में अपने ‘मैथमेटिकल गेम्स फॉर साइंटिफिक अमेरिकन’ कॉलम में लिखा। आज उनका नाम सुप्रसिद्ध है और कई अन्य गणितज्ञों ने उनके द्वारा खोजे गए संख्या के अध्ययन को आगे बढ़ाया है।
रहस्यमय संख्या की खोज
दत्तात्रेय रामचंद्र कापरेकर को संख्याओं से खेलने का शौक था। इसी शौक के कारण उन्होंने कई गणितीय सिद्धांत विकसित किए। उनकी ऐसी ही एक खोज को ‘कापरेकर स्थिरांक (कॉन्स्टेंट)’ के नाम से जाना जाता है, जिसका संबंध 6174 संख्या से है। यह संख्या गणित की दृष्टि से बहुत रहस्यमय है। कापरेकर स्थिरांक में कोई भी चार अंक लिए जाते हैं, जिनके दो अंक भिन्न हों। फिर संख्या के अंकों को आरोही और अवरोही क्रम में लिखें। दोनों संख्यों को आपस में घटा दिया जाता है। इससे आपको दो संख्याएं मिलेंगी। अब बड़ी संख्या को छोटी से घटाएं। परिणाम में चार अंक आएगा। अब उन चार अंकों की सबसे बड़ी और सबसे छोटी संख्या बनाई जाती है और उनको आपस में घटा दिया जाता है। इस प्रक्रिया को सात बार दोहराया जाता है। सातवीं बार में परिणाम 6174 होता है। परिणाम के रूप में 6174 आने के बाद, फिर हर चरण में यही यानी 6174 ही परिणाम आता रहता है। इसलिए इसे कापरेकर स्थिरांक कहते हैं।
निधन : अस्सी-इक्यासी की उम्र 1986 में महाराष्ट्र के देवलाली में उनका निधन हो गया।

