संगीत रघुवर सिंह

तेरहवीं शताब्दी में अमीर खुसरो ने सितार नामक एक वाद्य यंत्र की ईजाद कर भारतीय सुरों में एक नई झंकार घोली थी। बीसवीं सदी में उसी सितार को बजाने की अनूठी शैली ‘जाफरखानी बाज’ को ईजाद किया उस्ताद अब्दुल हलीम जाफर खान ने। ‘जाफरखानी बाज’ को जानने के लिए कभी संतूर वादक शिव कुमार शर्मा बहुत अधीर हो उठे थे। 1955-56 की बात है, जब वह जम्मू में अपने घर के छज्जे पर आराम कर रहे थे। रात के सन्नाटे में कहीं से सितार पर राग छायानट के स्वर गूंजे। सितार के स्वर पूरी तरह अलग थे और उसे बजाने की शैली अद्भुत थी। वह सितार के स्वरों में पूरी तरह तल्लीन हो गए और यह जानने के लिए बेहद उत्सुक हो उठे कि यह वादक कौन है? बाद में चला कि वह तो अब्दुल हलीम जाफर खान थे। फिल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ में बिस्मिल्लाह खान की शहनाई के साथ उस्ताद के सितार की झंकार आज भी लोगों के जहन में गूंजती है। सितार-शहनाई पर स्वरों में सवाल-जवाब का विचार उनका और उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का था, जिसके बाद फिल्मों और संगीत सम्मेलनों में उनकी और बिस्मिल्लाह खान की पहली सितार-शहनाई जोड़ी बनी।
इंदौर की गलियों ने बीनकार बंदे अली की बीन का लहरा सुना है तो जाफर खान के सितार की झंकार भी। जाफर खान के घर इंदौर के निकट ग्राम जावरा में 15 फरवरी, 1929 को अब्दुल हलीम जाफर खान का जन्म हुआ था। इंदौर के बंदे अली बीनकार घराने के संगीतज्ञ जाफर खान ने बेटे अब्दुल हलीम को तभी अपने संग ले लिया, जब उन्होंने चलना भर सीखा था। महज पांच वर्ष की उम्र में उनके नन्हे हाथों में सितार थमा दिया। बीनकार उस्ताद बाबू खान ने अब्दुल हलीम को सितार पर उंगलियां थिरकाना सिखाया, तो बंदे अली के शिष्य उस्ताद महबूब खान ने सितार की स्वर-लहरियां। संगीत के ज्यादातर घराने तानसेन के सेनिया स्कूल से निकले हैं, लेकिन उस्ताद अब्दुल हलीम जाफर खान का कहना था, ‘मेरी शैली किसी भी घराने की कठोर निष्ठा को सहन नहीं करती, सेनिया की भी नहीं। संगीत में केवल एक सच्चा घराना है- ऋग्वेद, लेकिन वास्तव में प्यार-मुहब्बत के सिवा और कोई घराना नहीं है।’

अब्दुल हलीम के जीवन की शुरुआत अच्छी थी। उनका कंठ इतना मधुर और स्वरों में इतनी मिठास थी कि महज नौ साल की उम्र में आकाशवाणी पर उनकी गजल गूंजने लगी। चौदह साल की आयु में उन्हें सितार-सिद्धि हो गई थी। उनकी पहचान अलग आकाशवाणी कलाकार के रूप में बन गई। उन्होंने अन्य नवाचारों के बीच रागिनियों के साथ प्रयोग करते हुए सितार वादन की एक अनूठी शैली ईजाद की, जो मसीतखानी और रजाखानी शैलियों के मध्य एक अद्भुत कलात्मक संतुलन थी। ‘जाफरखानी बाज’ नामक इस शैली में मिजराव का काम कम और बाएं हाथ का काम ज्यादा होता है। कण, मुर्की, खटका आदि का काम भी अधिक रहता है और राग के प्रस्तुतीकरण में बीन और सरोद-अंग का आभास होता है। इस शैली में उस्ताद का चमत्कारिक सितार वादन संगीत से अनभिज्ञ श्रोताओं को भी रसमग्न करने लगा और अब्दुल हलीम जाफर खान ‘सितार के जादूगर’ बन गए।  उनकी सहज शैली में हर राग ताजगी से भरा लगता था, चाहे वह जयजयवंती, किरवानी, श्याम कल्याण में गायकी अंग की कोई बंदिश हो या पीलू या पहाड़ी में कोई हल्की धुन। प्रसिद्ध सितार वादक नयन घोष का कहना है, ‘खान साहब की शैली अनोखी थी, जिसकी नकल करना किसी अन्य घराने के लिए संभव नहीं था। वास्तव में, वह श्रोताओं को अपने सितार वादन के जरिए हंसा भी सकते थे।’

पिता जाफर खान की मृत्यु के बाद अब्दुल हलीम के सामने आर्थिक समस्या आ गई। नतीजतन, उन्हें फिल्मों की रंगीन दुनिया का सहारा लेना पड़ा, जहां से पूरे भारत में उनके सितार वादन की धूम मची। अविस्मरणीय संगीत समारोहों के साथ ही उन्होंने कला-फिल्मों में संगीत की तान छेड़ दी और सितार पर स्वर-लहरियां बिखेरीं। अनारकली, झनक झनक पायल बाजे, गूंज उठी शहनाई, मुगल-ए-आजम, कोहिनूर और गंगा-जमुना जैसी फिल्में उनके सितार वादन से झंकृत हो उठीं। ‘कोहिनूर’ में तो एक गीत की रिकॉर्डिंग के लिए दिलीप कुमार ने उस्ताद अब्दुल हलीम जाफर खान से छह महीने तक सितार की बारीकियां सीखीं और परदे पर उसी राग को साधा, उसी नोट को बजाया, जिसे फिल्म के संगीत में बजाया गया था। ‘गूंज उठी शहनाई’ में उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के साथ राग केदार में उनकी जुगलबंदी फिल्म का कालातीत हिस्सा बन गई। सुपरहिट संगीत के दिग्गज निर्माता विजय भट्ट, संगीतकार नौशाद, वसंत देसाई, सी रामचंद्र, अनिल बिस्वास, मदन मोहन और डीपी कोरगांवकर बॉलीवुड में उनके साझीदार बने।

अब्दुल हलीम जाफर खान , पंडित रविशंकर से भी पहले 1958 में जैज संगीतकार डेव ब्रूबेक के पियानो के सवालों का जवाब अपने सितार के स्वरों से दिया था। भारतीय शास्त्रीय संगीत की विलक्षण परंपरा और उस्ताद के सितार वादन से प्रभावित ब्रबेक ने एक साक्षात्कार में कहा कि उस यादगार जुगलबंदी ने उन्हें ‘एक अलग तरह से बजाने’ के लिए तैयार किया। 1963 में अब्दुल हलीम जाफर खान ने पश्चिमी दुनिया के दिग्गज अंग्रेजी गिटार वादक जूलियन ब्रीम के साथ भी स्वरों की तान लगाई, तो उनके संगीत रिकॉर्ड्स न्यू यॉर्क के चुनिंदा संगीत प्रतिष्ठानों में धूम मचाने लगे। वह कहते, ‘वास्तव में एक जुगलबंदी तब होती है, जब दो कलाकारों के बीच मुंहतोड़ प्रतिस्पर्धा होती है।’ वह पहले हिंदुस्तानी संगीतकार थे, जिन्होंने वीणा वादक इमाणी शंकर शास्त्री के साथ कर्नाटक शैली में जुगलबंदी की। उन्होंने किरवानी, कणकंगी, लतांगी, करहरप्रिया, मानवती, गणमूर्ति जैसे दक्षिणी रागों को उत्तर भारत में लोकप्रिय बनाया, तो मधुर स्वरमालाओं की कल्पना करके चक्रधुन, कल्पना, मध्यमी, खुसरूबानी जैसे नए राग बनाए।

अपने फन के माहिर फनकार उस्ताद अब्दुल हलीम जाफर खान के सितार वादन में परंपरा और नवाचार का अद्भुत संगम था। 1976 में उन्होंने मुंबई में हलीम सितार अकादमी की स्थापना कर प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा को संजोया, जहां उन्होंने अपने शागिर्दों को ‘जाफरखानी बाज’ शैली की तालीम दी। उनके खास शागिर्दों में उनके बेटे जुनैन खान के अलावा प्रसाद जोगेकर, गार्गी शिंदे तथा कोलकाता के हरशंकर भट्टाचार्य हैं। अब्दुल हलीम जाफर खान, पंडित रविशंकर, उस्ताद विलायत खान, पंडित निखिल बनर्जी और उस्ताद मुश्ताक अली खान के साथ सितार के पांच सितारों में से एक और घरानों से परे संगीत में विश्वास रखने वाले रविशंकर व विलायत खान के साथ ‘सितार त्रयी’ के अभिन्न अंग थे। जिन दिनों रविशंकर एक अंतर्राष्ट्रीय नाम थे और अली अकबर खान और विलायत खान भी खासे प्रसिद्ध थे, दुनिया भर में संगीत प्रेमियों का एक खास समूह अब्दुल हलीम जाफर खान के सितार वादन की व्यापक रूप से प्रशंसा करता था। इन वरिष्ठ संगीतकारों ने ‘बुद्धि’ और ‘भावना’ की अलग शक्तियों के बीच एक असाधारण पुल बनाया। संगीत मर्मज्ञों का तर्क है कि यह ध्वनियों की अनूठी वास्तुकला थी, या संगीत की भक्तिपूर्ण गुणवत्ता, जो परमानंद प्राप्त कराती है।

वास्तव में, इन महान संगीतकारों ने ये सारी चीजें एक साथ कीं। उस्ताद अब्दुल हलीम जाफर खान के हुनर की कहानी पद्म भूषण, पद्मश्री, संगीत नाटक अकादमी, तानसेन, शिखर, गौरव, टैगोर रत्न, डी.लिट् जैसी उपाधियां और सम्मान बताते हैं। उनकी संगीत आक्रामकता, आध्यात्मिक गहराई और आकर्षण का अनोखा तालमेल था, जो उनके व्यक्तित्व का सच्चा प्रतिबिंब था। इसी साल की शुरुआत में चार जनवरी को मुंबई में उनका सितार थम गया। गालिब का उद्धरण देते हुए वह अक्सर अपने दिल की बात कहते, ‘ढूंढ़ना यह कायदा था दैर-ओ-हरम में तुझे, मगर पहले लाजिम था अपने घर के अंदर ढूंढ़ना तुझे।’ उस्ताद अब्दुल कहते थे, ‘मैं ओम भूर्भुव: स्व: (गायत्री मंत्र) गाता हूं, ठीक जैसे मैं अलहमदुलिल्लाहि रब्बिल-आलमीन (सूरा अल फातिहा, कुरान का पहला अध्याय) करता हूं।’ ‘संगीत का कोई मजहब नहीं, रिश्तों का न कोई नाम’- यही उनका दर्शन था। ०