ए क लंबी वैचारिक बहस के बाद आखिरकार भारतीय दंड संहिता की धारा 309 में बदलाव होने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। मेंटल हेल्थ केयर बिल, जो संसद में पास हो चुका है, उसमें इस धारा को हटाने का प्रावधान है। बरसों से इस धारा के तहत आत्महत्या की कोशिश को अपराध माना जाता रहा है। भारतीय दंड संहिता की धारा 309 ब्रिटिशकाल की देन है। हालांकि, इस धारा के तहत मुश्किल से ही किसी को सजा मिली होगी। बीस साल पहले बंबई हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील के रूप में ऐसा सिर्फ एक मामला सुप्रीम कोर्ट में आया था। अदालतें समय-समय पर आत्महत्या की कोशिश को अपराध मानने की व्यवस्था को असंवैधानिक भी ठहरा चुकी हैं। 1996 में सुप्रीम कोर्ट के सामने जो मामला आया, वह एक पुलिसकर्मी मारुति श्रीपति डुबाल की आत्महत्या की कोशिश से जुड़ा था। बंबई हाईकोर्ट ने उसे अपराधी नहीं माना था। महाराष्ट्र सरकार ने इस फैसले के खिलाफ अपील की। 29 अगस्त 1996 को संविधान के दायरे में रहते हुए बंबई हाईकोर्ट के फैसले को तो निरस्त कर दिया, लेकिन डुबाल को सजा देने या न देने के अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए उसे रिहा कर दिया। मुंबई पुलिस में 19 साल तक हैड कांस्टेबल रहे डुबाल एक दुर्घटना में अपना मानसिक संतुलन खो बैठे थे। जिसकी वजह से 1985 में उन्होंने आत्महत्या की कोशिश की थी।

धारा 309 के औचित्य पर सवाल हमेशा उठते रहे हैं। अगर कोई व्यक्ति आत्महत्या की कोशिश में सफल हो जाए तो ठीक, नहीं तो वह अपराधी। यह बहस लगातार छिड़ती रही है कि क्या इच्छा मृत्यु को कानूनी मान्यता दे दी जानी चाहिए? इस बहस के दो पहलू हैं और हर एक के पक्ष में दलीले हैं। एक पक्ष यह है कि क्या लंबे समय से निष्क्रिय हालत में पड़े रहने वाले व्यक्ति की जीवन रक्षक प्रणाली हटा कर उसे मृत्यु का वरण करने का अधिकार नहीं दे दिया जाना चाहिए। अगर परिस्थितियों और मुश्किलों से तंग आकर कोई व्यक्ति आत्महत्या की कोशिश में बच जाता है तो अपना जीवन खत्म करने का उसे अपराधी क्यों माना जाए? इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया को कानूनी मान्यता देने की मांग बार-बार उठती रही है। इच्छा मृत्यु का विवाद न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच अधिकार क्षेत्र को लेकर टकराव का भी मुद्दा बना है।

इच्छा मृत्यु को आत्महत्या की श्रेणी में रखा जाए या नहीं, इसे लेकर भी तरह-तरह की राय सामने आती रही है। इच्छा मृत्यु के पक्ष में कानूनविद् प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि अगर इलाज से बचने की कोई संभावना न हो तो मरीज को मरने का अधिकार क्यों नहीं दिया जाना चाहिए। इस पर महान्यायवादी मुकुल रोहतगी का तर्क था कि यह कौन फैसला करेगा कि मृत्यु की प्रक्रिया कब शुरू की जाए। कल को अगर लाइलाज बीमारी का इलाज संभव हो जाए तो। इच्छा मृत्यु के दो रास्तों पर बरसों से बहस चल रही है कि उनमें से कौन सा मानवीय है, जिस मरीज के बचने की कोई सूरत न हो उसे डॉक्टर जहर का इंजेक्शन दे दे या परिजनों की सहमति से जीवन रक्षक प्रणाली हटा ले। यह मसला व्यक्ति के मौलिक अधिकार से जुड़ा हुआ भी है। सवाल यह है कि क्या किसी व्यक्ति को यह निश्चय करने का अधिकार होना चाहिए कि अगर किसी की बीमारी ठीक होने का कोई रास्ता नहीं बचा है तो उसे जीवन रक्षक प्रणाली पर न रखा जाए। महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम में एक बछड़े को जहर देकर इसलिए मार दिया गया था क्योंकि उसकी पीड़ा बहुत बढ़ गई थी। इस पर खासा विवाद हुआ था। अक्तूबर 1928 में गांधीजी ने गुजराती साप्ताहिक ‘नवजीवन’ में सफाई देते हुए लिखा कि अगर वे उस स्थिति में हुए तो वही तरीका अपनाएंगे। उन्होंने लिखा कि अगर मरीज की भलाई के लिए कोई डॉक्टर उसे चाकू से काटता है तो वह हिंसा नहीं है। इसीलिए जरूरी है कि किन्हीं अपरिहार्य स्थितियों में वह एक कदम आगे बढ़ कर मरीज की भलाई के लिए उसका जीवन काट ले तो उसमें कोई बुराई नहीं है।

उलझा हुआ है इच्छा मृत्यु का मामला

बीमारी, प्रेम प्रसंग, गरीबी या अन्य कारणों से दुनिया भर में लोग बड़ी संख्या में आत्महत्या करते हैं। यह उनका निजी फैसला होता है। इच्छा मृत्यु का फैसला कई लोगों की राय पर टिका होता है इसलिए इच्छा मृत्यु को कानूनी मान्यता देने का सवाल दुनिया के कई देशों में बहस का मुद्दा है। स्काटलैंड, कनाडा, आस्ट्रेलिया, इजराइल, फ्रांस आदि में इच्छा मृत्यु को अपराध न मानने का कानून ठुकराया जा चुका है। नीदरलैंड में यह फैसला डॉक्टरों पर छोड़ दिया गया है। स्विटजरलैंड में किसी को सम्मानजनक मौत देने को गैरकानूनी नहीं माना जाता। यही वजह है कि तमाम आलोचनाओं के बावजूद फीस लेकर लोगों को मृत्यु का वरण कराने वाला संगठन ‘डिगनिटास’ खूब फल फूल रहा है और उसकी कारगुजारियों की वजह से उस पर आरोप लगा है कि उसने स्विटजरलैंड को आत्महत्या का पर्यटन स्थल बना दिया है। मृत्यु का वरण कराने के लिए यह संगठन करीब सात लाख रुपए लेता है। दुनिया भर में संगठन के सात हजार से ज्यादा सदस्य हैं। 1998 से 2013 तक यह संगठन जर्मनी के 840 लोगों समेत कई देशों में 1701 लोगों को मौत का उपहार दे चुका है। इंग्लैंड में 1935 में दया-मृत्यु के समर्थन में एक सोसायटी बनी लेकिन वह ज्यादा सक्रिय नहीं रह पाई। हाउस आॅफ कामंस और हाउस आॅफ लार्ड्स में जहर देकर मौत को मान्यता देने का विधेयक खारिज हो जाने के बाद वहां अब एक निजी विधेयक पर बहस छिड़ गई है। इसमें उस वयस्क को जिसके छह महीने से कम समय तक जीने की आशंका हो, उसे अपना जीवन खत्म करने का अधिकार देने की व्यवस्था है। दो डॉक्टर मरीज की हालत की पुष्टि करेंगे और अगर मरीज राजी हो जाए तो एक डॉक्टर दवा देकर उसकी जीवन लीला खत्म कर देगा। वरिष्ठ डॉक्टरों ने इस व्यवस्था का समर्थन किया है। लेकिन गिरजाघपर इसके विरोध में डटा है।

आत्महत्या का मुद्दा भारत में भी चर्चा के केंद्र में रहा है। इसे लेकर कई तरह के सवाल और आशंकाएं अदालतों के सामने आती रही हैं। 1994 में पी रतिनम बनाम केंद्र सरकार मामले में सुप्रीम कोर्ट की बेंच के सामने सवाल आया कि क्या भारतीय दंड संहिता की धारा 301 के तहत आत्महत्या की कोशिश असंवैधानिक है या धारा 309 के तहत इसे अपराध माना जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने तब इन दोनों ही मान्यताओं को खारिज कर धारा 301 को क्रूर और अपमानजनक बताया था। अदालत का निष्कर्ष था कि यह व्यक्ति पर दोहरी मार है। एक पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए वह अपनी जान लेने की कोशिश करता है और बच जाने पर उसे ज्यादा यातना भुगतनी पड़ती है। 1996 में ज्ञान कौर मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 1994 की अपनी व्याख्या बदल कर कहा कि जीवन के अधिकार में मृत्यु का अधिकार शामिल नहीं है। इसी के बाद बहस छिड़ी कि लाइलाज मरीज को दया मृत्यु देने का कानून बनाया जाना चाहिए। 1997 में त्रिचूर के सेवानिवृत्त अध्यापक थॉमस मास्टर ने अपील की कि उन्हें अपनी मौत का समय, जगह और तरीका चुनने का अधिकार दिया जाए। हाईकोर्ट में अर्जी ठुकराए जाने के चार साल बाद थामस ने फांसी लगा ली। नोट छोड़ा-‘मौत से भयंकर है अशक्त रहना।’ बाद के सालों में केरल से ही अदालत में दो याचिकाएं दायर की गई। के चित्तिलापिल्लै व एनएम पिल्लै ने मृत्यु का अधिकार मांगा। एर्नाकुलम की अदालत में दायर याचिका में चित्तिलपिल्लै ने कहा, ‘मैं अपने बुढ़ापे की योजना बनाना चाहता हूं ताकि मेरी बढ़ती उम्र मेरे और मेरे परिजनों के लिए बोझ साबित न हो। अगर एक उम्र में मैं अपना रोजमर्रा का काम खुद न कर सकूं तो मैं चाहूंगा कि मशीनों से जिंदा रहने की बजाय मैं शांतिपूर्ण मौत पा लूं।’

ए नएम पिल्लै ने अदालत से कहा कि 69 साल की उम्र में उनका शरीर और दिमाग पूरी तरह काम कर रहा है। कोल्लम में प्रधान शिक्षक के पद से सेवानिवृत्त हुए एनएम पिल्लै का कहना था कि वे अपनी सारी इच्छाएं पूरी कर चुके हैं, कुछ भी चाह बाकी नहीं रही है। बस शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहते हुए वे जीवन से सम्मानजनक मुक्ति चाहते हैं।
विधि आयोग ने 2006 में दया मृत्यु के लिए विधेयक का मसविदा तैयार करने का सुझाव दिया था। सालों से नीम बेहोशी में पड़ी मुंबई की नर्स अरुणा शानवाग को दया मृत्यु देने की इजाजत वाली याचिका पिंकी विरानी ने दायर की। 16 दिसंबर, 2009 को सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सरकार को नोटिस दिया। 7 मई 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार दया मृत्यु के लिए दिशा निर्देश जारी किए और जीवनरक्षक प्रणाली हटाने और इंजेक्शन देकर सांस रोकने में फर्क बताया। 11 अगस्त, 2012 को विधि आयोग ने डॉक्टरी मदद से दया मृत्यु देने के विधेयक की सिफारिश की। इस सारी कवायद के बावजूद यह तय नहीं हो पाया कि दया मृत्यु को किस रूप में वैध माना जाए।

ए क व्यक्ति जिसके बचने की रत्ती भर भी आस न हो, उसे निष्क्रिय हालत में कृत्रिम प्रणाली पर टिकाए रखना क्या उसके और उसके परिजनों के खिलाफ क्रूरता नहीं है। कानून अपनी जगह है लेकिन व्यावहारिक रूप से दया मृत्यु भारत में हो रही है। अक्सर परिजन अपने मरीज के बचने की आस छोड़ देते है। वे मरीज को पीड़ा से मुक्ति दिलाना चाहते हैं। कुछ मामलों में परिजन अपने मरीज को जीवन रक्षक प्रणाली पर ज्यादा समय तक रखने का खर्च उठाने की स्थिति में भी नहीं होते। कई कानूनविदों का मानना है कि जीवन के अधिकार से मृत्यु का अधिकार जुड़ा है। कोई व्यक्ति जब ऐसी स्थिति में पहुंच जाए कि मृत्यु ही एकमात्र विकल्प बचे तो उसे अपना जीवन खत्म करने की इजाजत दे दी जानी चाहिए। समाज और धर्म से जुड़े कई लोग अत्याधिक पीड़ा की स्थिति में मरीज को दया मृत्यु देने का समर्थन करते ही हैं। संत मोरारी बापू का कहना है कि जीवन का अंत करने की व्यक्ति की इच्छा या बाध्यता का सम्मान किया जाना चाहिए। हालांकि कुछ डॉक्टरों का मानना है कि गंभीर रूप से बीमार मरीजों का जीवन बचाने के और तरीके खोजे जाने चाहिए। दया मृत्यु या इच्छा मृत्यु को सामान्य रूप से एक विकल्प के तौर पर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।

दया मृत्यु या इच्छा मृत्यु को वैध बना देने से उसके दुरुपयोग की आशंका बढ़ सकती है। इसके लिए निश्चित रूप से कुछ कड़े दिशा निर्देश तय करने होंगे। दया मृत्यु का समर्थन करने वाले भी इसके पक्ष में है। यह मुद्दा एक ऐसे व्यक्ति के मामले से जुड़ा है जो जीवन रक्षक प्रणाली पर है और डॉक्टर तमाम कोशिश के बाद उसे होश में नहीं ला पा रहे हैं। कुछेक मामलों में मरीज होश में आ भी सकते हैं, लेकिन डॉक्टरों को लगे कि जीवनरक्षक प्रणाली हटाने से उसे और ज्यादा व्याधियां हो सकती हैं तो इस हालत में भी दया मृत्यु एकमात्र विकल्प बचता है। लेकिन बहस सिर्फ दया मृत्यु पर ही नहीं है। गैरसरकारी संगठन ‘कॉमन कॉज’ की मांग है कि सम्मानजनक मौत का अधिकार बुनियादी अधिकार माना जाए।

आत्महत्या एक व्यसन भी
आत्महत्या, दया मृत्यु, इच्छा मृत्यु और मृत्यु के अधिकार को संवैधानिक मानने की बहस के बीच सही गलत का फैसला भले ही न हो पा रहा हो, भारत में जान देना एक अजीब तरह का खेल भी रहा है। तमिलनाडु में तो यह सामान्य जीवन का हिस्सा बन गया। उस पर राजनीति का रंग चढ़ने से यह प्रवृत्ति सम्मानजनक मानी जाने लगी है। यही वजह है कि तमिलनाडु में आत्महत्या की दर सबसे ज्यादा है। प्रेम, बीमारी, प्रताड़ना या किसी सामाजिक पारिवारिक समस्या की वजह से 2013 में एक लाख 34 हजार 799 लोगों ने अपनी जान ली। यह संख्या उससे पिछले साल की तुलना में 64.5 फीसद ज्यादा थी। 2013 में हर एक घंटे में औसतन पंद्रह लोगों ने आत्महत्या की। आत्महत्या की सबसे ज्यादा दर तमिलनाडु (12.3 फीसद) में रही। एक समय आत्महत्या की प्रमुख वजह गरीबी, बेरोजगारी और कारोबार में घाटे को माना जाता था। ये वजहें अब भी हैं, लेकिन औसत के मामले में नाकाम प्रेम, सबसे बड़ी वजह बन गया है। प्रेम में नाकामी हर रोज बारह लोगों की जान ले लेती है। तमिलनाडु में तो अपनी जान देने को लालायित रहने वालों की स्थिति कुछ और विचित्र वजह है। 2014 में जब तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता जयराम को सजा हुई तो करीब बीस लोगों ने आत्महत्या की कोशिश की। यह तो कुछ भी नहीं। जयललिता को राजनीति में लाने वाले एमजी रामचंद्रन राजनीति में आने के बाद अक्सर बीमार रहते थे। एक बार वे गुर्दे के इलाज के लिए अमेरिका गए तो उन्हें चाहने वाले यह क्षणिक विछोह भी सहन नहीं कर सके। राज्य के कई हिस्से में लोगों ने आग लगा कर, जहर पीकर या ट्रेन के आगे कूद कर जान दे दी। जब एमजीआर का निधन हुआ तो हजारों महिलाओं ने कलाई की चूड़ियां तोड़ कर खुद को विधवा तो मान ही लिया, कई महिलाओं ने जान दे दी।
आत्महत्या की कोशिश को अपराध के दायरे से बाहर रखने की पहल निश्चित रूप से मानवीय है। कोशिश इस बात की भी होनी चाहिए कि आत्महत्या की प्रवृत्ति लोगों में पनपे ही नहीं। इसके लिए एक आदर्श सामाजिक ताना अगर बन पाए तो क्षणिक आवेग या निराशा की स्थिति में अपने जीवन का अंत करने को ही अंतिम पर्याय मान लेने की लोगों की सोच को बदला जा सकता है। १