उदारीकरण के इस दौर में पिछले ढाई दशक में विकास के कारण पर्यावरण व वनों के लिए गंभीर चुनौतियां सामने हैं। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने राष्ट्रीय वन नीति का मसौदा बनाया है, लेकिन इसमें औद्योगिक परियोजनाओं को पर्यावरण की शर्तों का पालन करने के मामले में लचर नीति अपनाई गई है। क्या सड़क किनारे लगे वृक्षों का पारिस्थितिकीय संतुलन बनाए रखने में कोई योगदान नहीं है? पहाड़ी प्रदेश हिमाचल में आए दिन किसी न किसी जगह पर पेडों के कटने की खबरें छपती ही रहती हैं। जहां जहां पेड़ हैं वहां किसी न किसी रूप में आरी चलाने वाले बैठे हैं। ज्यादा वक्त नहीं हुआ, जब हरियाणा में छह सड़कों को चौड़ा करने के लिए करीब अट्ठासी हजार पेड़ काटने को जरूरी बताया गया था। कमोबेश यही स्थितिगत पूरे देश की है। विकास की पहली गाज हरियाली पर गिरती है। जिसके सबसे आसान शिकार हरे-भरे बरसों पुराने पेड़ होते हैं। पचास-साठ साल के बड़े-बड़े गछनार पेड़ों को काटने के बाद दावा किया जाता था कि उसके बदले पेड़ लगाए जाएंगे, लेकिन उतने बड़े पेड़ के मुकाबले नए पेड़ कब लगेंगे, कब पनपेंगे, इसका जवाब कोई नहीं देता।

विकास वास्तव में जरूरी है, लेकिन हमारे देश में विकास के कारण विनाश कितना होता है ? इसका भी आकलन होना चाहिए। इधर देश में आवागमन को बढ़ाने के लिए राजमार्गों को चौड़ा किया जा रहा है। बताते हैं दुर्घटनाओं में कमी लाने के लिए राजमार्गों का जाल बिछाया जा रहा है। अनेक लंबे, चौड़े और चमचमाते मार्गों की घोषणा हुई है। जिन पर लंबी, आरामदायक गाड़ियां मनमाने रफ्तार से चल सकें। हालांकि, इसके दुष्परिणाम भी सामने आ रहे हैं। दिल्ली से आगरा तक का यमुना एक्सप्रेस-वे पूरे देश में दुर्घटनाओं के लिए कुख्यात हो रहा है। आए दिन बड़ी-बड़ी दुर्घटनाएं हो रही हैं। यह तेज रफ्तार का एक दूसरा पक्ष भी है।

हिमाचल जैसे छोटे राज्य में परवाणु से शिमला तक ( पचासी किलोमीटर) सड़क फोर लेन करने के लिए लगभग पच्चीस हजार वृक्ष काटे जा रहे हैं। शहरों के भीतर सड़कों पर से तो पेड़ नदारद हो चुके हैं और बड़ी सड़कों और राजमार्गों को पेड़विहीन किया जा रहा है। शिमला जल्दी पहुंचने के लिए सड़क फोरलेन तो हो रही है। मगर आसपास और शिमला से आगे जाने वाली सड़कों का कोई पुर्साहाल नहीं है। एक सरकारी दावे में कहा गया है कि जितने पेड़ काटे जाएंगे, उससे चार गुणा लगाए जाएंगे। इस दावे के खोखलेपन को इस तथ्य से आंका जा सकता है कि पहले भी ऐसी बातें कही जा चुकी हैं। जहां भी पेड़ कटे हैं, वहां वीरानी छाई हुई है। कहीं-कहीं

इक्का-दुक्का पेड़ों को ही सुरक्षित पनपाया गया है। ज्यादातर जगहों पर तो पेड़ सूख गए या लगे ही नहीं। अब कोई यह नहीं जानना चाहता कि एक पौधा कितने सालों में वृक्ष बनता है, कितने की छाया, कितना आॅक्सीजन देता है। क्या यह बताने की जरूरत है कि पर्यावरण को बचाने में या बारिश होने में वृक्षों की कितनी अहम भूमिका होती है। भला विकास जैसी चौंधिया देने वाली चीज के सामने पेड़ और बारिश जैसी तुच्छ चीजें क्या मायने रखती हैं? सरकार के इस विकास का एक नकारात्मक पहलू यह भी है कि हरियाली कहीं नष्ट की जाती है और दावा किया जाता है कि दूसरे इलाके में वृक्षारोपण किया गया। यह अद्भुत है।

उदारीकरण के इस दौर में पिछले ढाई दशक में विकास के कारण पर्यावरण व वनों के लिए गंभीर चुनौतियां सामने हैं। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने राष्ट्रीय वन नीति का मसौदा बनाया है, लेकिन इसमें औद्योगिक परियोजनाओं को पर्यावरण की शर्तों का पालन करने के मामले में लचर नीति अपनाई गई है। क्या सड़क किनारे लगे वृक्षों का पारिस्थितिकीय संतुलन बनाए रखने में कोई योगदान नहीं है? तेज गति से आगे बढ़ रही अर्थव्यवस्था को सड़कों की आवश्यकता है, मगर इससे भी ज्यादा जरूरी यह है कि तमाम खराब पड़ी सड़कों का भी उम्दा रखरखाव हो। समय पर अविलंब मरम्मत हो। अधिक महत्त्पूर्ण यह है कि इन कार्यों को करते हुए केवल धन ही खर्चा न हो, बल्कि गुणवत्ता भी बनाकर रखी जाए।

(संतोष उत्सुक)