श्रीशचंद्र मिश्र

हम क्या गलत कर देते हैं? हम मार ही तो देते हैं?’ यह टिप्पणी हरियाणा के एक व्यक्ति ने कुछ समय पहले तब की जब फिल्म ‘खाप: एक स्टोरी आफ आॅनर किलिंग’ शुरू करने से पहले निर्देशक अजय सिन्हा ने विषय की गहराई तक जाने के लिए उससे उसकी राय पूछी। यह एक टिप्पणी उस सामाजिक मानसिकता को दर्शाती है जो जाति और संप्रदाय के आधार पर ‘सम्मान’ बचाने की खातिर रिश्तों की बलि चढ़ा देने की कुप्रथा को सदियों से पोस रही है। सम्मान बचाए रखने की खातिर हत्या जैसा अपराध करने से भी परहेज नहीं करने वाली इस मानसिकता को बदलने के लिए बेहद कड़ा कानून होना चाहिए, इस बात पर कार्यपालिका से लेकर न्यायपालिका तक सिद्धांत रूप से सहमत हैं। कई गैरसरकारी संगठन भी इस दिशा में प्रयास कर रहे हैं लेकिन स्थिति बहुत ज्यादा बदली नहीं है। मान-हत्या (आॅनर किलिंग) के नाम पर सुनियोजित हत्या और उस अपराध को ढंकने में समाज और प्रशासन की भूमिका समय-समय पर सामने आती रहती है। दो साल पहले दिल्ली में एक माता-पिता ने शादी के बहत्तर घंटे बाद अपनी बेटी की हत्या कर दी। उसका अपराध यही था कि उसने विजातीय से शादी कर ली थी। अक्टूबर 2014 में दिल्ली के नजफगढ़ इलाके से एक पैंतीस साल का व्यक्ति चरण सिंह लापता हो गया।

दो दिन बाद हरियाणा के झज्झर में एक नहर में उसकी लाश मिला। करीब डेढ़ साल बाद दो अपराधियों की गिरफ्तारी से खुलासा हुआ कि दोनों ने चरण सिंह की इसलिए हत्या कर दी क्योंकि वह गैंग के एक सदस्य की बहन से शादी करना चाहता था और उसके परिवार को अपनी इज्जत की खातिर यह गवारा नहीं था। पिछले साल मई में तमिलनाडु में एक दलित युवक ने सवर्ण लड़की से शादी क्या कर ली, अपमान से बौखलाए लड़की के परिजनों ने उसके घर धावा बोल दिया। वह नहीं मिला तो उसकी छोटी बहन को पीट-पीट कर मार डाला। गुरुग्राम में पिछले साल इक्कीस साल के व्यक्ति ने ‘सम्मान’ की खातिर अपनी मां और बहन की हत्या कर दी। ये सिर्फ कुछ घटनाएं ही नहीं हैं, यह उस सामाजिक मानसिकता का नतीजा है जिसमें धर्म, जाति या गोत्र से बाहर शादी करने को प्रतिष्ठा या इज्जत पर हमला मान लिया गया है। एक अनुमान के मुताबिक हर साल एक हजार के आसपास युवक युवतियां घर-परिवार के सम्मान की खातिर जान गंवा देते हैं। सरकारी रिकार्ड में 2015 में ऐसी 251 मौतें दर्ज हैं।

ज्यादातर मामले दब जाते हैं या दबा दिए जाते हैं। समाज में बदनामी के डर से रिश्तों की बलि चढ़ा देने की इस कुप्रथा को जाति और संप्रदाय के आधार पर खड़ी की गई पंचायतों ने और हवा दी है। नैतिकता को अपने हिसाब से परिभाषित कर समाज सुधारने का ठेका लेने वाली पंचायतों ने जो समांतर व्यवस्था खड़ी कर ली, उसे राजनीतिक लाभ की खातिर प्रश्रय दिया जाता है। सम्मान बचाने की खातिर अपनों का खून बहा देने की प्रवृत्ति किसी एक वर्ग या जाति तक ही सीमित नहीं है। सिर्फ अंतरजातीय विवाह के खिलाफ यह नाराजगी नहीं पनपती। धर्म का फर्क तो खैर हिंसक उन्माद की वजह बनता ही है। अमीर-गरीब और हैसियत का फर्क भी इसकी मजबूत बुनियाद बना जाता है। यह मानसिकता जाति या वर्ग में खांचे में मजबूती से उलझी हुई उस पारंपरिक सोच का नतीजा है जिसमें पारिवारिक सम्मान अपनों की जान से ज्यादा महत्त्वपूर्ण मान लिया गया है। व्यक्तिगत स्तर पर हावी यह हैवानियत और पिछड़ेपन की निशानी है और न ही आधुनिकता इसे बदल पाई है। पंचायतों की भूमिका भी इस मामले में खासी रही है। व्यक्तिगत रिश्तों को लेकर किसी व्यक्ति की संविधान में दी गई स्वतंत्रता को कुचलने में वह भी निर्दयी होती रही है, इस कदर कि मान-सम्मान की खातिर उसे किसी की जान लेने का आदेश देने में भी कोई संकोच नहीं होता। आॅनर किलिंग के नाम पर 2007 में हुई मनोज और बबली की नृशंस हत्या को खाप पंचायत की कार्यशैली और उसकी मानसिकता के नमूने के तौर पर हमेशा याद किया जाएगा। समाज को व्यवस्थित रूप से संचालित करने के लिए बनी पंचायत व्यवस्था का बेहद विकृत और हिंसक रूप तो इस कांड से दिखा ही, समाज व प्रशासन की पूरे मामले में उदासीनता ने भी कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए। मध्ययुगीन काल की बर्बरता की याद दिलाने वाला यह कांड कई तरह की कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरने के बावजूद न तो जाति आधारित संकुचित मानसिकता को बदल पाया और न ही उस मानसिकता को कुचलने की प्रशासनिक इच्छाशक्ति सरकार दिखा पाई।

सम्मान के नाम पर यह खूनी खेल तभी रुक सकता है जब लोगों की मानसिकता बदले। इसके लिए प्रशासनिक कदम उठाने के साथ-साथ राजनीतिक पहल करना जरूरी है। विडंबना यह है कि राजनीति भी सामाजिक बंदिशों से उलझी हुई है। जाति-पांत या धर्म की बेड़ियां तोड़ने का नारा कुछ खास मौकों की औपचारिकता बन कर रह गया है। असलियत में समाज में खिंची रेखाओं और अपनी जातीय और धार्मिक पहचान को प्रतिष्ठा मान लेने की प्रवृत्ति को तोड़ने की बजाय राजनीतिक फायदे के लिए उसे सहलाने में सबकी ज्यादा रूचि रहती है। खाप पंचायतों को किसी की हत्या का आदेश देने से रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने खाप पंचायतों के प्रतिनिधियों से उनकी राय मांगने के साथ-साथ सरकार से इस पर कड़ा कानून बनाने को भी कहा। तत्कालीन यूपीए सरकार ने इस मुद्दे पर विचार के लिए मंत्रि-समूह भी बनाया।

जिन तीन राज्यों- हरियाणा, पंजाब व उत्तर प्रदेश में लिंगानुपात में असंतुलन ज्यादा है और जहां सम्मान की खातिर हत्या की ज्यादा घटनाएं होती हैं, उन्हीं ने आॅनर किलिंग के खिलाफ केंद्रीय कानून बनाने का विरोध किया। इस मुद्दे पर आम सहमति न होने पाने की वजह से यूपीए सरकार के मंत्रि-समूह की बैठक मुश्किल से एकाध बार ही हो पाई थी।
2012 में विधि समिति ने सिफारिश की कि जाति या संप्रदाय की बाधाएं तोड़ कर शादी करने वालों के खिलाफ मनचाहा फैसला करने के लिए किसी भी तरह के जमावड़े पर सख्ती से रोक लगाई जाए। इसके बाद विधि मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा कि इक्कीस राज्य और केंद्र शासित प्रदेश आॅनर किलिंग के खिलाफ कानून बनाए जाने के पक्ष में हैं। बिल के मसविदे में साफ है कि एक ही गोत्र में या अंतरजातीय विवाह में बेवजह दखलंदाजी करने से पंचायतों को रोका जाएगा और तुगलकी फैसला सुनाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

इसमें सजा और जुर्माने का प्रावधान है। इस तरह के फैसलों को गैरजमानती संज्ञेय अपराध माना जाएगा। यह विधेयक अभी तक पास नहीं हुआ है। समस्या यह है कि कड़े से कड़ा कानून बना देने से भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। मुख्य बात यह है कि कानूनों पर सख्ती से अमल हो पाए। गैर सरकारी स्तर पर किए गए एक सर्वे के मुताबिक अस्सी फीसद लोग खाप पंचायतों के नियमों को जायज मानते हैं। जाहिर है कि पहले लोगों की मानसिकता बदलनी होगी।

जाति-पांति या धर्म की बाधाओं को तोड़ कर विवाह पहले भी होते थे, आज भी हो रहे हैं। उन्हें स्वीकार करने की परिपक्वता समाज के एक छोटे वर्ग में जरूर आई है लेकिन व्यापक संदर्भ में जाति और धर्म का भेद प्रतिष्ठा का सवाल बना हुआ है। पिछले साल मई में आगरा में दो प्रेमियों ने इसलिए आत्मदाह कर लिया क्योंकि धर्म का भेद उनके विवाह को स्वीकार करने को तैयार नहीं था। यह एक मामला नहीं है। हिंदू-मुस्लिम विवाह को स्वीकृति मिलना सहज नहीं हो पाया है तो इसलिए कि कानून और प्रशासन इसे संवेदनशील मुद्दा मान कर इसमें उलझना नहीं चाहता।

बाईस राज्य सुप्रीम कोर्ट में स्वीकार कर चुके हैं कि उनके यहां आॅनर किलिंग होती है और उनमें मुख्य वजह धर्म व जाति का भेद होता है। जातीय भेदभाव खत्म करने के लिए तमिलनाडु में आजादी के बाद बड़ा आंदोलन हुआ था। वर्णविहीन समाज का सपना देखा गया और आंदोलन के प्रणेता ईवी रामास्वामी नायकर पेरियार ने एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था बनाने का संकल्प किया। जातियों में ऊंच-नीच का भेद खत्म करने का अभियान चला। आज उस अभियान की वजह से 1967 के बाद से तमिलनाडु की राजनीति में द्रविड़ पार्टियों का ही एकाधिकार बन गया। लेकिन समाज में भेदभाव खत्म नहीं हुआ। जाति की सीमा लांघ कर शादी करने वालों को मौत के घाट उतार देने की प्रवृत्ति पर वहां कोई रोक नहीं लग पाया।

पिछले साल बाईस साल के दलित युवक वी शंकर को इसलिए अपनी जान गंवानी पड़ी क्योंकि उसने तेवर समुदाय की लड़की कौशल्या से प्रेम विवाह करने का दुस्साहस किया था। 2013 से 2016 के बीच तमिलनाडु में आॅनर किलिंग का यह 81वां मामला था। गैर सरकारी संगठन इसे सम्मान के खातिर की गई हत्याओं का एक मामूली हिस्सा मानते है। आॅनर किलिंग का शिकार सबसे ज्यादा दलित युवक-युवतियां होते हैं। ज्यादातर मामले दबा दिए जाते हैं। सामने वे ही आ पाते हैं जिनमें सामाजिक संगठन दखल देते हैं। सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए हत्या कर देने का मामला दोतरफा है। गैरदलितों में लड़कियों इसका ज्यादा शिकार होती हैं। आॅनर किलिंग के नाम पर जिन गैरदलित लड़कियों की हत्या होती है उनका मामला आत्महत्या के रूप में दर्ज किया जाता है। जनवरी 2008 से जून 2010 के बीच अकेले तमिलनाडु में 18 से 30 साल की 1971 महिलाओं ने आत्महत्या की। सामाजिक संगठन इनमें से ज्यादातर को आॅनर किलिंग का नतीजा मानते हैं।