प्रेम प्रकाश।
जयप्रकाश नारायण चौहत्तर आंदोलन के दिनों में अक्सर कहा करते थे कि कमबख्त क्रांति भी आई तो बुढ़ापे में। पर इसे बुढ़ापे की पकी समझ ही कहेंगे कि संपूर्ण क्रांति का यह महानायक अपने क्रांतिकारी अभियान में संघर्षशील युवाओं और रचनात्मक कार्यकर्ताओं की जमात के साथ कलम के उन सिपाहियों को भी भूला नहीं, जो जन चेतना की अक्षर ज्योति जलाने में बड़ी भूमिका निभा सकते थे। संपूर्ण क्रांति का शीर्ष आह्वान गीत ‘जयप्रकाश का बिगुल बजा तो जाग उठी तरुणाई है…’ रचने वाले रामगोपाल दीक्षित ने तो लिखा भी कि ‘आओ कृषक श्रमिक नागरिकों इंकलाब का नारा दो/ गुरुजन शिक्षक बुद्धिजीवियों अनुभव भरा सहारा दो/ फिर देखें हम सत्ता कितनी बर्बर है बौराई है/ तिलक लगाने तुम्हें जवानों क्रांति द्वार पर आई है…।’
दरअसल, जेपी उन दिनों जिस समग्र क्रांति की बात कह रहे थे, उसमें तीन तत्त्व सर्वप्रमुख थे- शिक्षा, संस्कृति और अध्यात्म। क्रांति की यह तात्त्विक समझ उस लोकनायक की थी, जो मार्क्स, गांधी और विनोबा के रास्ते 1974 की समर भूमि तक पहुंचे थे। अपनी इस यात्रा में उन्हें जहां महात्मा गांधी और विनोबा जैसी दिव्य विभूतियों का साथ मिला, वहीं उनकी करीबी रामधारी सिंह ‘दिनकर’, रामवृक्ष बेनीपुरी, फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ और धर्मवीर भारती जैसे साहित्यकारों से भी रहा। यही नहीं, अर्थशास्त्र के मानवीय तकाजों के साथ समाज, सरकार और लोकतंत्र के बारे में आधुनिक विमर्श रचने वाले ईएफ शुमाकर उनके मित्रों में शामिल थे। शुमाकर की किताब ‘स्माल इज ब्यूटीफुल’ उनकी प्रिय पुस्तक थी। इस पुस्तक के नाम ने अपने दौर में एक मुहावरा ही रच दिया था, जिसे बिहार आंदोलन के दिनों में जेपी थोड़ा सुधार कर बोलते थे- ‘स्माल इज नॉट ओनली ब्यूफुल, इट्स सिग्निफिकेंट आल्सो।’ जेपी को तब पता नहीं था कि जिस संपूर्ण क्रांति की मशाल लेकर वे आगे बढ़े हैं, उससे देश, समाज और व्यवस्था की जड़ता कितनी दूर तक बदलेगी। हां, उन्हें यह जरूर लगता था कि वे एक सत्यशोधक की तरह आगे बढ़ रहे हैं, लिहाजा आगे जो भी हासिल होगा वह देशकाल के हिस्से का अनूठा और सार्थक अनुभव होगा। दिलचस्प है कि खुद जेपी ने भी कुछ कविताएं लिखी हैं, जिनमें उनकी एक कविता है- ‘शोध की मंजिलें’। इस कविता में उन्होंने खुद को ‘सत्यशोधक’ कहा भी है। संपूर्ण क्रांति के दिनों को याद करते हुए आचार्य राममूर्ति ने अंग्रेजी के कवि ब्राउनिंग के शब्दों में इसे जेपी के जीवन का ‘लास्ट ऐंड बेस्ट फाइट’ कहा है। निस्संदेह साहित्य, संवेदना और राजनीति को एक धरातल पर रख कर विचार और संघर्ष का जो आख्यान जेपी ने लिखा, वह वाकई अनूठा है। जयप्रकाश आंदोलन के दौर और प्रभाव के हवाले से बात अकेले हिंदी साहित्य की करें, तो रचना और समाज के बीच का संवाद जिस तरह इस दौर में बना, वह अप्रतीम है।

दिलचस्प है कि सातवें और आठवें दशक की हिंदी कविता में आक्रोश और मोहभंग के स्वर एक बड़ी व्याप्ति के स्तर पर सुने और महसूस किए जाते हैं। ‘अकविता’ से ‘नई कविता’ तक की हिंदी काव्ययात्रा के सहयात्रियों में कई बड़े नाम हैं, जिनके काव्य लेखन से तब की सामाजिक चेतना की बनावट पर रोशनी पड़ती है। पर दुर्भाग्य से हिंदी आलोचना के लाल-नीले साफाधारियों ने देश में ‘दूसरी आजादी की लड़ाई’ की गोद में रची गई उस काव्य रचनाशीलता के मुद्दे पर जान-बूझ कर चुप्पी अख्तियार कर ली है, जिसमें कलम की भूमिका कागज से आगे सड़क और समाज के स्तर पर प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की हो गई थी। न सिर्फ हिंदी बल्कि विश्व की दूसरी किसी भाषा के इतिहास के लिहाज से भी यह एक नया अनुभव, एक अपूर्व प्रयोग था। जयप्रकाश आंदोलन से जुड़े कवियों के 1978 में प्रकाशित हुए रचना संग्रह ‘समर शेष है’ की प्रस्तावना में आलोचक डॉ. रघुवंश कहते हैं, ‘मैं नई कविता के आंदोलन से जोड़ा गया हूं, क्योंकि तमाम पिछले नए कवियों के साथ रहा हूं, उनकी रचनाओं पर बातचीत करता रहा हूं। परंतु ‘समर शेष है’ के रचनाकारों ने जेपी के नेतृत्व में चलने वाले जनांदोलन में अपने काव्य को जो नई भूमिका प्रदान की है, उनका मूल्यांकन मेरे लिए एकदम नई चुनौती है।’ कविता के नाम पर कागजों पर मूर्तन-अमूर्तन के खेल को आभिजात्य सौंदर्यबोध और नव परिष्कृत चेतना का फलसफा गढ़ने वाले आलोचक अगर चार दशक बाद भी इस चुनौती को स्वीकार करने से आज तक बचते रहे हैं, तो इसे हिंदी भाषा और साहित्य की नहीं, बल्कि उस पर आलोचकीय विवेक के साथ बात करने वालों की दुर्बलता माननी चाहिए। क्योंकि यह कम से कम आजाद भारत में बिरल अवसर ही था, जब किसी जनांदोलन में साहित्यकारों ने इस तरह खुले ढंग से अपनी भूमिका निभाई हो। और यह यश हिंदी साहित्य के हिस्से आया, यह एक भाषा की रचनात्मक धन्यता के लिहाज से बड़ी बात है।

कम से कम आपातकाल से पूर्व तक जेपी आंदोलन का शील जिस तरह गढ़ रहे थे, उसमें उनकी साहित्य और संवेदना की समझ साफ नजर आती है। मसलन, ‘मौन’ कैसे ‘मुखरता’ से भी ज्यादा प्रभावशाली है, इसे आठ अप्रैल 1974 को आंदोलन को दिए गए जेपी के पहले कार्यक्रम से भलीभांति समझा जा सकता है। यह पहला कार्यक्रम एक मौन जुलूस था। ‘हमला चाहे जैसा होगा हाथ हमारा नहीं उठेगा’ जैसे लिखे नारों वाली तख्तियों को हाथों में उठाए और आंखों पर पट्टी बांधे सत्याग्रहियों की जो जमात पटना की सड़कों पर चल रही रही थी, उसमें संस्कृतिकर्मिर्यों की टोली भी शामिल थी। इस जुलूस में हिस्सा लेने वालों में फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ का नाम सर्वप्रमुख था। संपूर्ण क्रांति आंदोलने के लिए दर्जनों लोकप्रिय गीत रचने वाले गोपीवल्लभ सहाय ने तो समाज, रचना और आंदोलन को एक धरातल पर खड़ा करने वाले इस दौर को ‘रेणु समय’ तक कहा है। अपने प्रिय साहित्यकारों को आंदोलनात्मक गतिविधियों से सीधे जुड़ा देखना जहां सामान्य लोगों के लिए एक नया अनुभव था, वहीं इससे आंदोलनकारियों में भी शील और शौर्य का तेज बढ़ा। व्यंग्यकार रवींद्र राजहंस की उन्हीं दिनों की लिखी पंक्तियां हैं, ‘अनशन शिविर में कुछ लोग/ रेणु को हीराबाई के रचयिता समझ आंकने आए/ कुछ को पता लगा कि नागार्जुन नीलाम कर रहे हैं अपने को/ इसलिए उन्हें आंकने आए।’
बाद के दिनों में आंदोलन की रौ में बहने वाले कवियों और उनकी रचनाओं की गिनती भी बढ़ने लगी। कई कवियों-संस्कृतिकर्मियों को इस वजह से जेल तक की हवा खानी पड़ी। लोकप्रियता की बात करें तो तब परेश सिन्हा की ‘ खेल भाई खेल/ सत्ता का खेल/ बेटे को दिया कार कारखाना/ पोसपुत के हाथ आई भारत की रेल’, सत्यनारायण की ‘जुल्म का चक्का और तबाही कितने दिन’, गोपीवल्लभ सहाय की ‘जहां-जहां जुल्मों का गोल/ बोल जवानों हल्ला बोल’, रवींद्र राजहंस की ‘सवाल पूछता है जला आदमी/ अपने शहर में कहां रहता है भला आदमी’ जैसी पंक्तियां तब लोगों की जुबान पर चढ़ गई थीं। इनको लेकर आंदोलनकारी पोस्टर बना रहे थे, दीवार लेखन किए जा रहे थे। कवियों ने जब नुक्कड़ गोष्ठियां कर आम लोगों के बीच आंदोलन का अलख जगाना शुरू किया तो इस अभिक्रम का हिस्सा बाबा नागार्जुन जैसे वरिष्ठ कवि भी बने। बाबा तब डफली बजाते हुए नाच-नाच कर गाते- ‘इंदूजी-इंदूजी क्या हुआ आपको/ सत्ता के खेल में भूल गई बाप को।’ दिलचस्प है कि चौहत्तर आंदोलन में मंच और मुख्यधारा के कवियों के साथ सर्वोदयी-समाजवादी कार्यकर्ताओं के बीच से भी कई काव्य प्रतिभाएं निकल कर सामने आर्इं। संपूर्ण क्रांति के पीछे का पूरा दर्शन इन रचनाओं में समाया था। आंदोलनकारियों की जुबान पर चढ़े इन गीतों ने शहरों से लेकर सुदूर देहात तक की यात्रा की। इनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आज भी सर्वोदय साहित्य के तहत क्रांति गीतों के जो संकलन छपते हैं, उनके सूचीक्रम् को यही गीत तय करते हैं। जयप्रकाश अमृतकोष द्वारा प्रकाशित ऐतिहासिक स्मृति ग्रंथ ‘जयप्रकाश’ में भी इनमें से कई गीत संकलित हैं। इन गीतों में रामगोपाल दीक्षित के ‘जयप्रकाश का बिगुल बजा…’ के अलावा ‘हम तरुण हैं हिंद के/ हम खेलते अंगार से… (डॉ. लल्लन), ‘आज देश की तरुणाई को अपना फर्ज निभाना है’ (राज इंकलाब), ‘युग की जड़ता के खिलाफ एक इंकलाब है’ (अशोक भार्गव) आदि जयप्रकाश आंदोलन की गोद से पैदा हुए ऐसे ही गीत हैं, जिन्होंने जयप्रकाश आंदोलन को एक क्रांतिकारी लय और संवेदना प्रदान किया।

आंदोलन और रचनाधर्मिता
हिंंदी कविता की मुख्यधारा के लिए यह साठोत्तरी प्रभाव का दौर था। आठवें दशक तक पहुंचते-पहुंचते जिन कविताओं की शिननाख्त ‘मोहभंग की कविताओं’ या क्रुद्ध पीढ़ी की तेजाबी अभिव्यक्ति के तौर पर की गई, जिस दौर को अपने समय की चुनौती और यथार्थ से सीधे संलाप करने के लिए याद किया जाता है, इसे विडंबना ही कहेंगे कि वहां समय की शिला पर ऐसा कोई भी काव्यांकन ढूंढ़े नहीं मिलता है, जहां तात्कालिक स्थितियों को लेकर प्रत्यक्ष रचनात्मक हस्तक्षेप का साहस दिखाई पड़े। नागार्जुन, भवानी प्रसाद मिश्र, रघुवीर सहाय, धर्मवीर भारती और दुष्यंत कुमार जैसे कुछ कवियों को छोड़ दें तो उस दौर की नंगी सच्चाई से मुंह ढांपने के लिए हिंदी कविता की मुख्यधारा और उसकी आलोचना के हिस्से शायद ही कुछ बचे। भवानी प्रसाद मिश्र तो कविता की उस परंपरा से आते भी हैं, जहां गांधी के अहिंसक मूल्य सर्वोपरि हैं। धर्मवीर भारती और रघुवीर सहाय के लिए यह बात सीधे इस तरह भले न कही जाए, पर वे भी उस परंपरा से बहुत दूर नहीं खड़े थे। बात करें नागार्जुन की, तो उनकी कविताई का बाना हमेशा उन्हें उस जनकवि की तरह पेश करता है, जो अपने समय को अपनी रचनाओं में सर्वाधिक मथता है, उस पर दो टूक कहता है। दिलचस्प है कि पटना के आयकर चौराहे पर जेपी पर पुलिस ने लाठियां बरसार्इं। बाद में जब वहां उनकी मूर्ति स्थापित की गई, तो इतिहास के उस अवसर विशेष को याद करने के लिए धर्मवीर भारती की लिखी ‘मुनादी’ कविता सर्वश्रेष्ठ चुनाव साबित हुआ। इसी तरह तब जेलों में बंद आंदोलनकारी युवाओं की जुबान पर सबसे ज्यादा दुष्यंत कुमार की गजलें थीं। मुख्यधारा से अलग हिंदी काव्य मंचों ने भी पेशेवर मजबूरियों की सांकल खोलते हुए तत्कालीन चेतना के स्वर दिए। मंच पर तालियों के बीच गोपालदास ‘नीरज’ ने साहस से गाया- ‘संसद जाने वाले राही कहना इंदिरा गांधी से/ बच न सकेगी दिल्ली भी अब जयप्रकाश की आंधी से…।’ कहना नहीं होगा कि हर आंदोलन का एक साहित्य होता है, ठीक वैसे ही जैसे किसी भाषा के साहित्येतिहास में कई आंदोलन होते हैं। इस लिहाज से जयप्रकाश आंदोलन का भी अपना साहित्य था। पर बात शायद यहीं पूरी नहीं होती है। अगर जयप्रकाश आंदोलन और उससे जुड़े साहित्य का आलोचनात्मक मूल्यांकन हो, तो निष्कर्ष के बिंदु आंख खोलने वाले साबित हो सकते हैं। डॉ. रघुवंश के शब्दों में जयप्रकाश आंदोलन के ‘कवियों ने लोकचेतना की रक्षा की लड़ाई में अपने रचनाधर्म को उच्चतम स्तर पर विसर्जित-प्रतिष्ठित किया।’

जनवादी चेहरे
जब इस देश के नेताओं में लूट प्रवृत्ति आम हो गई/ पूछ रही है चंबल घाटी मैं ही क्यों बदनाम हो गई।’ यह जनगीत बिहार के दिवंगत सर्वोदयी कार्यकर्ता रामशरण भाई का है। इसे वे जेपी आंदोलन और बाद के दिनों में खूब गाते थे। डफली की थाप के साथ झूम-झूम कर जब वे गाते थे, तो लोग बस उन्हें सुनते, उनसे जुड़ते चले जाते थे। उनकी आवाज के इस जादू के साक्षी विनोबा-जेपी के दौर के लाखों लोगों से लेकर दिल्ली में जेएनयू परिसर तक रहा है। एक झोले में खादी की मोटी बिनाई का धोती-कुर्ता, एक पुरानी डायरी और एक-दो और सामान। उनके साथ उनका जीवन इतना ही सरल और बोझरहित था। अपने जीवन में वे दर्जनों संस्थाओं के सैकड़ों अभिक्रमों से जुड़े, पर कभी वेतनभोगी नहीं बने। न ही जीवन को किसी सांस्थानिक रजिस्टर में दर्ज करा कर अपने ऊपर औपचारिक अनुशासन का कोई बोझ लादा। जीवन को जीने का यह कबीराई अंदाज ही था, जिसने उन्हें आजीवन तत्पर और कार्यरत तो बनाए रखा, पर संलग्नता का मोह कहीं से भी बांध न सका, न परिवार से और न ही संस्थाओं से। तभी तो उनके कंठ से जो स्वर फूटे, वे न सिर्फ धुले हुए, बल्कि सच्चे भी थे। शादी-ब्याह में दिखावे के बढ़े चलन पर उनका गीत याद आता है- ‘दुई हाथी के मांगै छै दाम / बेचै छै कोखी के बेटा के चाम/ बड़का कहाबै छै कलजुग के कसाई…।’ जेपी आंदोलन के दौर की कविताओं पर कार्य करते हुए ऐसे लोगों से मिलने का मौका मिला, जो रामशरण भाई जैसे तो पूरी तरह नहीं, पर थे उनके ही समगोत्रीय।

दरअसल, सर्वोदय-समाजवादी आंदोलन में क्रांति गीतों की भूमिका कार्यकर्ता तैयार करने में सबसे जरूरी और कारगर रही है। ‘जय हो…’ और ‘चक दे इंडिया…’ गाकर जो तरुणाई आज जागती है, उसका ‘फेसबुक’ कभी इतना विश्वसनीय, दृढ़ और जुझारू नहीं हो सकता, जितना किसी आंदोलन की आंच को बनाए और जिलाए रखने के लिए जरूरी है। हिंदी के प्रख्यात आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल की शब्दावली में कहें तो ‘लोक’ की ‘परंपरा’ या तो आज कहीं पीछे छूट गई है या फिर बदले दौर में इसकी दरकार को ही खारिज मान लिया गया है। देश में जनगायकों या लोकगायकों की ऐसी परंपरा का आज सर्वथा अभाव दिखता है। आंदोलन का जन-चेहरा जन औजारों से ही गढ़ा जा सकता है। यह बात रामशरण भाई जैसे जनगायकों को देखने-जानने के बाद और ज्यादा समझ में आती है। पर दुर्भाग्य से रामशरण भाई जैसे क्रांतिकारी लोकगायकों की बस स्मृतियां हमारे बीच हैं। न ही कहीं उनके गाए गीतों का कोई संकलन है और न ही उनकी आवाज की कोई रिकॉर्डिंग। पर कुछ लोग आज भी ऐसे हैं, जिन्होंने उन्हें सुना है और उनके कई गीतों को कंठस्थ भी किए हुए हैं। हालांकि उन्हें भी इस बात का अंदाजा नहीं होगा कि उनके दुनिया से विदा होते ही एक कितनी बड़ी धरोहर से हमारा समय और समाज हाथ धो बैठेगा।

