जेएनयू में भारत के टुकड़े करने और उसे बर्बाद करने के नारे लगाने के आरोपी शायद दस से भी कम छात्रों को इस बात की जानकारी तो होगी ही कि भारत की आजादी के समय अनेक यूरोपीय विद्वानों का विश्लेषण था कि भारत एक देश, एक राष्ट्र के रूप में ज्यादा समय तक नहीं चल सकता और जल्दी ही कई भागों में टूट जाएगा। इस सोच वाले यूरोपीय विद्वानों का विश्लेषण इस भ्रम का शिकार था कि एक देश के रूप में भारत अंग्रेजी राज की देखरेख में ही बन पाया था वरना अंग्रेजी राज की स्थापना के पहले तो भारत इतनी भाषाओं, क्षेत्रीय राज्यों, संप्रदायों और जातियों में बंटा हुआ देश रहा है जहां सभी एक दूसरे से लड़ते ही रहे हैं। यूरोप की धरती पर तो एक ही मूल की भाषाओं का अंतर अलग राष्ट्रों का आधार बना है और उसमें भी एक ही भाषा बोलने वाले एक ही मजहब को मानने वाले सिर्फ दो अलग धाराओं के लोग- कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट- एक दूसरे के हिंसक विरोधी हो जाते हैं।

दूसरी ओर भारत में भाषाई, भौगोलिक क्षेत्रीय, सांस्कृतिक और मजहबी विविधता यूरोप से कई गुना अधिक और कहीं ज्यादा गहरी है। यूरोपीय विद्वान तो यह भी मानते रहे हैं कि यूरोप की आबादी में तो नस्ली एकता है जबकि भारत की आबादी एक से अधिक नस्लों के मिश्रण से बनी है जिसमें जातीय स्मृतियां अब भी जिंदा हैं और परस्पर घोर विरोधी भी। ऐसे में एक-दूसरे से इतनी अधिक भिन्न, अलग-अलग प्रांतों की आबादी कैसे अपनी-अपनी राष्ट्रीय पहचान एक ही इकाई के साथ जोड़ सकती है। एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में भारत टिक सकता है और विकसित हो सकता है यह विचार ही उन्हें विचित्र और अव्यावहारिक लगता था।

लेकिन आजादी के बाद से अब तक राष्ट्रीय इकाई के रूप में भारत की पहचान न सिर्फ टिकी रही है बल्कि लगातार मजबूत हुई है, जबकि यूरोपीय देश समग्र एकीकरण की संभावना से बिल्कुल दूर एक सीमित आर्थिक गठबंधन को भी नहीं संभाल पा रहे हैं। इसकी सीधी और सरल सी वजह यह है कि यूरोपीय विद्वानों ने अपने समाज में राष्ट्र-राज्य विकसित होने की प्रक्रिया के अध्ययन से जुड़े हुए जो शास्त्र, जो सिद्धांत गढ़े हैं वे भारत पर लागू नहीं होते। अत: भारत की मूलभूत एकता के आधार को समझने के लिए शास्त्र, सिद्धांत हमें खुद गढ़ने होंगे और उसे निरंतर मजबूत करने के औजार भी खुद ही विकसित करने होंगे।

भारत के रूप में हमारी अपनी पहचान कितनी पुरानी है इसके कई संकेत हमें अपने शास्त्रों और महाकाव्यों से मिलते हैं। देश का नाम भारतवर्ष कब और कैसे पड़ा इस पर अलग-अलग मत हो सकते हैं। लेकिन महाभारत और गीता में भारत का प्रयोग भारतवासियों के लिए संबोधन के रूप में किया गया है। अर्थात महाभारत लिखे जाने तक भारत नाम स्थापित हो चुका था। इस भारतवर्ष का भौगोलिक विचार दक्षिण में समुद्र तट से लेकर उत्तर के हिम क्षेत्रीय पहाड़ों तक होने की बात विष्णु पुराण में कही गई है। दक्षिण में सागर की लहरों से उठ कर उत्तर के पहाड़ों से टकराने वाला कालिदास का मेघ बीच में पड़ने वाले प्रांतों की विविधता का दर्शन कराता है और इस पूरी विविधता को अपने में समेटती है भारतीय सभ्यता।

मानव सभ्यता प्रकृति की गोद में फलती-फूलती है और उसका भौगोलिक पहलू भी होता है। भारत की भौगोलिक स्थिति ऊष्णकटिबंधीय होने की वजह से जीवन के विकास में अनुकूल है। इसलिए भारत की सभ्यता प्रकृति से सामंजस्य बना कर विकसित हुई है और देश की विपुल प्राकृतिक विविधता को उसके एकीकृत रूप में जीवन दर्शन का आधार बनाती है। विविधताओं को समेटने की यह क्षमता ही भारतीय सभ्यता की, अर्थात भारतीयता की चारित्रिक विशेषता है। यही हमारी एकता का सबसे मजबूत आधार है।

भारत जैसी सभ्यता में जाति व्यवस्था या वर्ण व्यवस्था कैसे आई और इतनी गहरी जम गई, यह एक अलग विमर्श का विषय है लेकिन इतनी उदारवादी परंपरा में एक कट्टरवादी धारा काफी लंबे समय से रही है। जाति व्यवस्था इसी धारा की देन है और भारतीय समाज की सबसे बड़ी कमजोरी रही है। इसी वजह से भारतीय समाज लगभग हर विदेशी आक्रमण के सामने पराजित होता रहा है। देश की आबादी पर अपना आधिपत्य बनाए रखने के लिए इस वर्णवादी धारा ने हमेशा ताकतवर विदेशी आक्रांताओं का साथ दिया है।

अब यही धारा भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर हिंदू राष्ट्रवाद को हथियार बना कर हमला कर रही है। हमने कब, कैसे और किन अर्थों में अपने आप को हिंदू कहना शुरू किया यह स्पष्ट नहीं है। लेकिन इतना तो साफ है कि यह हमारी संस्कृति से निकला हुआ शब्द नहीं है। आम धारणा है कि प्राचीन काल से संपर्क में रहे अरब व्यापारियों ने सिंधु या सिंध से जोड़ कर हिंद, हिंदी और हिंदू संबोधन शुरू किया। अरब देशों में आज भी यह भारतीयों की भौगोलिक पहचान है। हज पर जाने वाले भारतीयों की पहचान ‘हिंदी’ दर्ज की जाती है। अरब उच्चारण में हिंदी और हिंदू बहुत अलग नहीं हैं। बताते हैं भारत के एक चर्चित मौलाना हज के दौरान पूरी कोशिश करके भी अपने नाम के आगे हिंदी की जगह बुखारी दर्ज करवाने में सफल नहीं हो सके।

भारत को समझ पाने में यूरोपीय समुदाय की दूसरी बड़ी दिक्कत ‘हिंदू’ के अर्थ को लेकर है। भारतीय सभ्यता की यूरोपीय समाज से गहरी दार्शनिक भिन्नता का नतीजा है कि भारतीय भाषाओं में ‘रिलीजन’ का कोई समानार्थी शब्द नहीं है और यूरोपीय भाषाओं में धर्म था। भारतीय परंपरा में जैन मत और बौद्ध धम्म जैसे अनीश्वरवादी धर्म भी हैं। जो यूरोपीय रिलीजन की समझ से बिल्कुल अलग हैं। यूरोप में अपनी समझ के हिसाब से धर्म का अर्थ रिलीजन ही मान लिया गया। अपनी बौद्धिक सीमा की सहूलियत के लिए यूरोप ने हिंदू को अपने हिसाब से सामाजिक वर्गीकरण के लिए मजहबी संप्रदाय की चौखट में बंद कर दिया। हिंदुत्व की यह अवधारणा भारत में पिछले दो सौ सालों में स्थापित हुई है। मध्यकालीन भक्ति साहित्य में भी कहीं हिंदू शब्द का संप्रदाय के रूप में प्रयोग हुआ नहीं दिखता है। धर्म को संप्रदाय का पर्याय बना कर और हिंदू का अर्थ इस तरह के धार्मिक संप्रदाय के रूप में स्थापित कर यूरोपीय साम्राज्यवाद ने भारत की बुनियादी एकता को तोड़ने का एक हथियार गढ़ लिया।

भारतीय समाज की कट्टर वर्णवादी धारा पिछली सदी के पूर्वार्ध में उस समय की ताकतवर धाराओं, जिसमें फासीवाद भी शामिल था, की तरफ आकर्षित हुई। सदियों से अर्जित की हुई कुटिलता का प्रयोग करते हुए अपने आप को अंग्रेजी शासन और उसके स्वार्थों के साथ जोड़ा। अंग्रेजी शासन की नीतियों के समर्थन में इस धारा ने भारत की राष्ट्रीयता को नकारते हुए मुसलिम लीग के इस्लामी राष्ट्र के समानांतर हिंदू राष्ट्र की मांग को खड़ा किया और आगामी आजादी के साथ ही देश के विभाजन के लिए जरूरी सांप्रदायिक हिंसा का माहौल तैयार करने में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई। आजादी के बाद भी यह धारा देश की स्वतंत्रता से अधिक हिंदू राष्ट्र की स्थापना को जरूरी मानती रही और भारतीय संविधान और ध्वज को नकारती रही।

हिंदू राष्ट्रवाद भारतीय सभ्यता की बुनियाद को कमजोर करने का यूरोपीय हथियार है। सत्ता पर कब्जा होने के बाद आज यह कट्टरवादी धारा हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की यूरोपीय अवधारणाओं को लादने की कोशिश में लगी है और अपने विरोधियों को दबाने के लिए उन सभी हथकंडों का इस्तेमाल कर रही है जो उसने यूरोपीय फासीवाद से सीखे हैं। राज्यसत्ता के संरक्षण में भीड़तंत्र के इस्तेमाल से विरोधियों को आतंकित करना इन हथकंडों में से एक प्रमुख हथकंडा है जो भारत की बुनियादी एकता के लिए, सही लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती के लिए सबसे बड़ा खतरा है। हम सब भारतीयों को मिल कर इस खतरे का सामना करने का संकल्प लेना होगा।