ज्योति सिडाना

परंपरागत समाज से आधुनिक समाज की ओर अग्रसर होना प्रगति और विकास का सूचक माना जाता है। आधुनिक और विकसित होते समाज में मानव जीवन में गुणात्मक परिवर्तन की कल्पना की गई थी, क्योंकि विकास गुणात्मक बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है। मगर इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि आर्थिक और तकनीकी विकास ने समाज में अनेक विघटन भी पैदा किए हैं। यथार्थ में असमानता, विभाजन, भेदभाव और असुरक्षा का बढ़ता दुश्चक्र लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहा है।

खासकर कमजोर वर्गों में आत्महत्या की घटनाओं में वृद्धि हो रही है। हाल ही में दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज की एक छात्रा ने इसलिए खुदकुशी कर ली कि लैपटॉप और मोबाइल न होने के कारण वह आनलाइन शिक्षा का लाभ नहीं ले पा रही थी। शायद ऐसे विद्यार्थी जिनके पास मोबाइल या लैपटॉप नहीं होता उन्हें लगता है कि उनका भविष्य असुरक्षित है। आत्महत्या के पहले ही अनेक कारण मौजूद हैं, अब इस महामारी के दौर में एक और नई वजह पैदा हो गई है।

इसी तरह परिवार की निम्न आर्थिक स्थिति के कारण अपनी पढ़ाई को लेकर चिंतित तेलंगाना निवासी एक छात्रा ने कथित रूप से आत्महत्या कर ली। परिवार का कहना है कि बेटी को आनलाइन पढ़ाई करने के लिए लैपटॉप और मोबाइल फोन की जरूरत थी और कॉलेज प्रशासन ने छात्रावास की सुविधा भी सिर्फ एक साल देने की बात कही, जिससे वह तनाव में थी। उसकें सहपाठी छात्रों ने आरोप लगाया कि सरकार से एक साल से ज्यादा वक्त से छात्रवृत्ति न मिलने के बाद छात्रा ने आत्महत्या की। उसने कॉलेज प्रशासन को अपनी समस्याओं के बारे में लिखा था, पर दुर्भाग्यवश उसे कोई जवाब नहीं मिला। क्या इन घटनाओं के लिए केवल परिवार की निम्न आर्थिक स्थिति जिम्मेदार है? राज्य और शिक्षण संस्थाओं की इस ओर कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? शिक्षा सभी वर्गों को उपलब्ध कराना क्या सामाजिक सरोकार नहीं है?

आनलाइन शिक्षा तक सभी वर्गों के विद्यार्थियों की पहुंच और संसाधनों की उपलब्धता भी एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है। भारत में एक बड़ी आबादी जो गांवों में रहती है, उसके पास स्मार्ट फोन नहीं है। अगर किसी के पास है भी तो उसके सामने इंटरनेट की पहुंच बड़ी समस्या है। गांव ही नहीं, शहरों में रहने वाले अधिकांश मध्यवर्गीय परिवारों में भी सबके पास स्मार्ट फोन नहीं होते। ऐसे में अगर परिवार के दो या अधिक बच्चों को एक ही समय पर आॅनलाइन कक्षा लेनी हो, तो उनके पास कोई विकल्कप नहीं होता।

एनसीईआरटी ने हाल ही में लगभग पैंतीस हजार बच्चों, शिक्षकों, अभिभावकों पर एक सर्वे किया और पाया कि लगभग अठाईस फीसद बच्चों के पास स्मार्ट फोन और लैपटॉप की सुविधा नहीं है, जिसके चलते वे मानसिक अंतर्द्वंद्वों का सामना करते हैं। जो बच्चे आनलाइन शिक्षा से जुड़ भी रहे हैं उनमें से हर तीसरा विद्यार्थी कुछ भी समझ न आने की शिकायत करता नजर आता है। इसलिए भारत जैसे देश में अभी आनलाइन माध्यम से शिक्षा देना सवालों के घेरे में है।

शिक्षा केवल डिग्री लेने के लिए जरूरी नहीं होती, जिसके जरिए रोजगार मिल सके, बल्कि वह मनुष्य को एक चेतना संपन्न प्राणी भी बनाती है। उसे शोषण, अन्याय और असमानताओं के विरुद्ध आवाज उठाना या विरोध करना भी सिखाती है। उसे संवैधानिक मूल्यों, अधिकार और कर्तव्यों से भी परिचित कराती है। इसलिए शिक्षा उतनी ही आवश्यक है जितना रोटी, कपड़ा और मकान, ताकि एक सभ्य और समानतामूलक समाज का निर्माण किया जा सके।
कॉलेज में प्रवेश देने के बाद क्या कॉलेज प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाते हैं? क्या राज्य की विद्यार्थियों के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है? यह आनलाइन शिक्षा पिछड़े/ निर्धन वर्ग के छात्रों को शिक्षा से वंचित करने का एक प्रयास साबित हो सकता है। हाल में जारी हुए निर्धनता और भुखमरी के आंकड़े बताते हैं कि भारत की क्या स्थिति है।

ऐसे में जब जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा अपनी प्रतिदिन की आवशयकताओं को पूरा कर सकने में असमर्थ है, तो सोचिए वह मोबाइल फोन और डाटा कार्ड पर खर्च कैसे कर पाएगा? इतिहास गवाह है कि एक लंबे समय तक हमारा देश अनेक कारणों से शिक्षा की दृष्टि से काफी पिछड़ा रहा है, खासकर महिला शिक्षा उपेक्षित रही है। अचानक आनलाइन शिक्षा की मजबूरी ने फिर शिक्षा के क्षेत्र में बेटियों की शिक्षा को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। जैसे ही पुत्र और पुत्री में से किसी एक की शिक्षा का विकल्प चुनना हो, तो परिवार पुत्र की शिक्षा को प्राथमिकता देते हैं। बेटी तो पराया धन है, उसे पढ़ा-लिखा कर क्या फायदा वाली सोच फिर हावी हो जाती है। इस संकीर्ण मानसिकता से बाहर निकलने में समाज को काफी वक्त लगा है। अगर अब फिर ऐसा हुआ तो इसके क्या परिणाम होंगे, कहना मुश्किल है।

इसलिए आवश्यक है कि एक कल्याणकारी राज्य की भूमिका का निर्वाह करते हुए सरकार और शिक्षण संस्थान निम्न वर्ग के बच्चों को स्मार्ट फोन या लैपटॉप दें, ताकि वे भी उच्च वर्ग के बच्चों के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकें। वैश्वीकरण और उपभोक्तावादी समाज ने पहले ही शिक्षा को महंगा बना कर विद्यार्थियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ा दी है। अब आनलाइन शिक्षा की मजबूरी उन्हें शिक्षा के अधिकार से ही वंचित कर देगी। ऐसे में निर्धन और दलित वर्ग के विद्यार्थियों में तनाव, निराशा और आत्महत्या की प्रवृत्ति उत्पन्न होना एक चिंता का विषय है। क्योंकि ये विद्यार्थी स्वीकार करते हैं कि आज के दौर में बिना गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और तकनीकी कौशल के जीवन यापन करना और सम्मान पूर्वक जीवन जीना मुश्किल है। देश के हर विद्यालय और महाविद्यालय को इस दिशा में गहन चिंतन की आवश्यकता है।

केवल इ-कंटेंट और वीडियो लेक्चर यू-ट्यूब पर अपलोड करने से या आनलाइन कक्षाएं लेने से विद्यार्थियों को शिक्षित नहीं किया जा सकता, जब तक कि व्यावहारिक शिक्षा न दी जा सके। साथ ही आनलाइन शिक्षा से जुड़ने के लिए उसके पास आधुनिक तकनीक की उपलब्धता और उसको उपयोग करने की समझ दोनों होनी चाहिए। अन्यथा आनलाइन शिक्षा सामाजिक असमानता और डिजिटल विभाजन को और भी तीव्र कर देगी।

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि विभिन्न परीक्षाओं या प्रतियोगी परीक्षाओं में विफलता, शिक्षण संस्थानों में जातिगत और लैंगिक भेदभाव, निम्न आर्थिक स्थिति के कारण उच्च शिक्षा या पेशेवर शिक्षा का हिस्सा न बन पाने या किसी तरह शिक्षा प्राप्त कर भी ली, तो मन पसंद नौकरी न मिलने के कारण हर वर्ष असंख्य विद्यार्थी अपना जीवन समाप्त कर लेते या करने का प्रयास करते हैं। इसमें संदेह नहीं कि इस प्रकार की घटनाओं में तुलनात्मक रूप से वृद्धि हो सकती है। शिक्षा मनुष्य को शोषण, असमानता, अन्याय से लड़ना सिखाती है, संघर्षपूर्ण स्थितियों का सामना करना सिखाती है और अगर समाज के एक बड़े तबके को शिक्षा से वंचित कर दिया जाएगा, तो किस तरह का समाज मूर्त रूप लेगा, इसकी कल्पना की जा सकती है।