चुनावों में अब कोई नयापन नहीं रह गया है। चुनाव होंगे, नतीजे घोषित किए जाएंगे, किसी पार्टी या गठबंधन की जीत होगी, एक सरकार गठित होगी, और कुछ ही दिनों में जिंदगी फिर उसी ढर्रे पर लौट आएगी।

फिर भी, मुझे लगता है कि बिहार चुनाव के बाद न तो बिहार में- और न ही शेष भारत में- जिंदगी पुरानी रौ में आ पाएगी।
मुझे लगता है कि बिहार की लड़ाई बिहार में सत्ता पर कब्जा करने की नहीं, बल्कि भारत को पुनर्परिभाषित करने की लड़ाई है। बिहार की लड़ाई केवल बिहार में नहीं लड़ी जा रही है, यह मुजफ्फरनगर और दादरी जैसी जगहों, और महाराष्ट्र तथा कर्नाटक जैसे राज्यों में और परंपरागत तथा सोशल मीडिया में भी लड़ी जा रही है।

चातुर्वर्ण्य व्यवस्था
बिहार चुनाव में अब केंद्रीय मुद््दा बिहार का विकास नहीं, बल्कि गाय है। गाय ‘भारत के विचार’ को फिर से गढ़ने का प्रतीक हो गई है। यह पुनरुत्थानवादी विचार श्रेणीबद्धता, पितृसत्तात्मकता, बहिष्करण, भेदभाव, हिंसा और बहुसंख्यकवाद के पुराने इतिहास पर आधारित है।
ऐतिहासिक तथ्य कटु और निर्मम हैं। सदियों से भारतीय समाज ‘वर्ण’ पर आधारित रहा है, चार श्रेणियों की एक व्यवस्था, जिसमें अधिकतर लोग शामिल रहे, पर साथ ही जिसने एक बड़ी संख्या को बाहर रखा।

बाहर रह जाने वाले दरअसल समाज या जाति से बहिष्कृत या अछूत लोग थे। जन्मना गैर-बराबरी इस व्यवस्था की बुनियाद रही है। इस गैर-बराबरी को बदला नहीं जा सकता, यह आपके साथ जीवन भर बनी रहती है। और यही चीज तय करती थी कि आप क्या होंगे, आप क्या करेंगे, आपको क्या करना होगा। यह इस मान्यता का विलोम था कि ‘सभी स्त्रियां और पुरुष जन्म से बराबर हैं और उन्हें समान अवसर मिलने चाहिए।’

चार-श्रेणीय व्यवस्था में भोजन, पहनावे, पूजा-पाठ, अनुष्ठान और स्त्रियों तथा विवाह आदि से संबंधित नियम-कायदे थे, जिनका उल्लंघन करने पर दंडित करने में देर नहीं की जाती थी- दंड अक्सर जाति या समाज से निर्वासन का होता था। इस व्यवस्था को समय-समय पर चुनौती दी जाती रही, कभी हमारे ‘सुधारकों’ और कभी तथाकथित ‘हमलावरों’ की ओर से। सुधारकों को जल्दी ही इस व्यवस्था ने अपने में समाहित कर लिया और उनमें से कइयों को गौरवशाली स्थान दे दिया। हमलावर (जो निस्संदेह अपने साथ अलग तरह की समस्याएं ले आए थे) घृणा के पात्र हो गए, खासकर वे, जो इस्लाम या ईसाइयत जैसी दूसरी धार्मिक आस्थाओं को मानने वाले थे।

वर्ण-व्यवस्था को सबसे प्रबल चुनौती मिली हमारे संविधान के निर्माण और भारत के सेक्युलर, लोकतांत्रिक और उदार गणतंत्र का स्वरूप ग्रहण करने से। यह दुखद रूप से धीमी प्रक्रिया थी, लेकिन बालिग मताधिकार, शिक्षा, औद्योगीकरण, शहरीकरण और संचार आदि के कारण पुरानी व्यवस्था दरकने लगी। यह उम्मीद नजर आने लगी कि आखिरकार भारत समतामूलक, अधिक न्यायपूर्ण और अधिक मानवीय समाज बनेगा। हम इतिहास का यह टिकाऊ सबक लेते दिख रहे थे कि नागरिक आजादी, समानता और भाईचारे को अपनी बुनियाद बनाने वाला देश ही समृद्ध और खुशहाल हो सकता है।

अज्ञान की ताकतें
लोकसभा में पूर्ण बहुमत के साथ भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने से एक अंदेशा भी पैदा हुआ। हालांकि हम यह सोच कर निश्चिंत थे कि सत्ता की बागडोर मोदी के हाथ में है, आरएसएस के हाथ में नहीं। हमें कहा गया कि मोदी के दूसरे अवतार को देखें- गुजरात मॉडल, उनके भाषण, उनकी ऊर्जा, तकनीक के प्रति उनका उत्साह, आदि। एक समय तक देश मोदी पर लट््टू दिखा, मगर अब सवाल उठने लगे हैं।
क्यों खाप पंचायतें अधिक सक्रिय हो गई हैं और उन्हें मनमाने फरमान जारी करने की छूट मिल गई है? क्यों औरों की जिंदगी में ताक-झांक करने वाले समूह और नैतिकता के पहरेदार संगठन तेजी से पनप रहे हैं? क्यों अंधाधुंध पाबंदिया लगाई जा रही हैं- जींस और खानपान से लेकर किताबों, लेखकों, कलाकारों और स्वयंसेवी संस्थाओं तक।

क्यों असहमति की आवाज कुचली जा रही है और क्यों इसके लिए राज्य-तंत्र के हर हथियार का इस्तेमाल किया जा रहा है? क्यों जाने-माने विद्वान अकादमिक और सांस्कृतिक संस्थाओं से बाहर किए जा रहे हैं? दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी को किसने मारा? क्यों सांप्रदायिक घटनाओं में बढ़ोतरी दिखती है (2015 के पहले छह महीनों में सांप्रदायिक हिंसा की 330 घटनाएं हुर्इं, जिनमें 51 लोग मारे गए, जबकि 2014 की इसी अवधि में ऐसी 252 घटनाएं हुई थीं और तैंतीस लोग मारे गए थे)। सांसद, विधायक और मंत्री, जिन्होंने संविधान-रक्षा की शपथ ले रखी है, क्यों फूट डालने और नफरत फैलाने वाली भाषा बोल रहे हैं?

वजूद पर खतरा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमूमन हर मुद््दे पर बोलते हैं और उन्हें हर बात पता रहती है, हालांकि वे कभी-कभार चूकते भी हैं (जैसे कि देश के जीडीपी की बाबत वे चूके)। वे जन्मदिन याद रखते हैं और खिलाड़ियों को मैच जीतने पर बधाई देना नहीं भूलते। मगर यह बात बहुत अखरती है कि आधुनिक, सेक्युलर और उदार भारत के विचार को उलटी दिशा में मोड़ने की कोशिशों पर वे सोची-समझी चुप्पी साधे रहे हैं। दाभोलकर, पानसरे और कलबुर्गी की हत्या पर और अखलाक को पीट-पीट कर मार दिए जाने की घटना पर उनकी चुप्पी अक्षम्य है।

आज भारतीय समाज बंटवारे (1947) और बाबरी मस्जिद के विध्वंस (1992) के समय से भी ज्यादा विभाजित है। भाजपा और आरएसएस बिहार में चुनाव जीतने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं। क्या चुनाव के बाद ध्रुवीकरण पूरा हो जाएगा? यह खयाल ही मुझे भयभीत कर देता है कि ऐसा होगा। ‘ट्रेन टु पाकिस्तान’ में खुशवंत सिंह के शब्द याद करें: ‘दोनों तरफ के लोग मारे गए। दोनों तरफ गोलियां लगीं, लाठियां चलीं, छुरे और भाले भोंके गए। दोनों तरफ के लोगों ने यंत्रणाएं भोगीं, दोनों तरफ की स्त्रियों के साथ बलात्कार हुए।’

हम इस पर हैरत जता ही रहे थे कि आखिर प्रधानमंत्री कब तक खामोश रहेंगे, उन्होंने आठ दिन बाद जाकर चुप्पी तोड़ी, वह भी बस एकता और सांप्रदायिक सौहार्द पर उपदेश देने के लिए। उनके बयान में हत्याओं या जहर उगलने वालों की निंदा नहीं थी, कार्रवाई या दंड की चेतावनी नहीं थी। धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण हमारे देश के लिए अस्तित्वगत खतरा है। जब देश इस खतरे का सामना कर रहा है, मोदी अपने पहले वाले अवतार में दिखते हैं।