पंचायत चुनाव में उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं मिलने के कारण भाजपा आलाकमान उत्तर प्रदेश में अपनी सरकार की लोकप्रियता को लेकर आशंकित है। विधानसभा चुनाव में अब आठ महीने का ही फासला है। ऐसे में पार्टी देश के सबसे बड़े सूबे की सत्ता से बेदखल होने का जोखिम नहीं उठाना चाहती। यही वजह है कि एक तरफ जहां अपने घर को दुरुस्त करने की कवायद तेज हुई है वहीं अपने सहयोगी छोटे दलों की नाराजगी दूर करने से लेकर नए दलों को साथ लाने की कोशिश भी भाजपा ने तेज कर दी है।
दिल्ली में पिछले दिनों निर्बल इंडियन शोसित हमारा आम दल और अपना दल के नेताओं से गृह मंत्री अमित शाह की मुलाकात इसी कोशिश को दिखाती है। अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल प्रदेश की मिजार्पुर सीट से लोकसभा सदस्य हैं तो आम दल के नेता संजय निषाद के बेटे प्रवीन निषाद संत कबीरनगर सीट से लोकसभा सदस्य हैं। निर्बल इंडियन शोसित हमारा आम दल को सूबे के लोग निषाद पार्टी के नाम से बेहतर समझते हैं।
जहां तक अपना दल का सवाल है, इसे आम तौर पर कुर्मियों की पार्टी माना जाता है। इसका असर भी पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुर्मी बहुल इलाकों में ही है। बसपा से अलग होने के बाद कुर्मी नेता सोनेलाल पटेल ने यह पार्टी बनाई थी। उनकी मृत्यु के बाद अब उनकी बेटी अनुप्रिया पटेल इस पार्टी की मुखिया हैं। हालांकि यह पार्टी भी दो फाड़ हो चुकी है। एक का नेतृत्व सोनेलाल पटेल की पत्नी कृष्णा पटेल और उनकी छोटी बेटी के हाथ में है तो दूसरी की कमान अनुप्रिया पटेल और पति आशीष पटेल ने संभाल रखी है।
अपना दल ने 2014 व 2019 के दोनों लोकसभा चुनाव और 2017 का विधानसभा चुनाव भाजपा से मिलकर लडे़। लोकसभा चुनाव में दोनों बार भाजपा ने उसे दो-दो सीटें दी थी। सफलता सौ फीसद रही। पिछली बार अनुप्रिया को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्री मंडल में भी शामिल किया था। लेकिन 2019 में सरकार बनी तो अनुप्रिया को मंत्री नहीं बनाया। वे तभी से भाजपा से नाराज चल रही हैं। उनके पति आशीष पटेल उत्तर प्रदेश में एमएलसी हैं। वे योगी सरकार में मंत्री बनने के लिए कब से मचल रहे हैं। विधानसभा में इस पार्टी के नौ सदस्य हैं। इस नाते भाजपा, कांगे्रस, सपा और बसपा जैसे प्रमुख दलों के अलावा अपना दल ही उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा क्षेत्रीय दल है।
सुहेल देव भारतीय समाज पार्टी को मुख्य रूप से अति पिछड़ी राजभर जाति की पार्टी माना जाता है। यह पार्टी 2002 में ओमप्रकाश राजभर ने बनाई थी। अपना दल की तरह पिछला विधानसभा चुनाव राजभर की पार्टी ने भी भाजपा से मिलकर लड़ा था। समझौते में मिली आठ सीटों में से पार्टी को चार पर सफलता मिली थी। राजभर को योगी सरकार में मंत्री पद भी मिला था। लेकिन लोकसभा चुनाव के मौके पर उनकी भाजपा से खटपट हो गई। फिलहाल वे भाजपा के साथ तालमेल के मूड में नहीं लग रहे।
जहां तक संजय निषाद का सवाल है, उनकी निषाद पार्टी का निषाद, केवट, बिंद, मल्लाह जैसी अति पिछड़ी जातियों पर अच्छा प्रभाव है। योगी आदित्यनाथ के लोकसभा से इस्तीफे के बाद 2018 में गोरखपुर में हुए उपचुनाव में संजय निषाद के बेटे प्रवीन निषाद को उम्मीदवार बनाकर अखिलेश यादव ने भाजपा उम्मीदवार को शिकस्त दिला दी थी। उसके बाद ही भाजपा ने 2019 में संजय निषाद को साथ जोड़ा था और उनके बेटे को लोकसभा टिकट दिया था।
गठबंधन का दल लोकदल
अजित सिंह का राष्ट्रीय लोकदल भाजपा के साथ गठबंधन करके हमेशा फायदे में रहा। मसलन 2002 के विधानसभा चुनाव में उसे एक दर्जन से ज्यादा सीटों पर सफलता मिली थी तो इसी तरह 2009 के लोकसभा चुनाव में उसे भाजपा के साथ तालमेल से पांच सीटों पर कामयाबी मिली थी। इसके उलट 2004 में जब उसने लोकसभा चुनाव सपा से मिलकर लड़ा तो तीन सीटों पर सफलता पाई थी।
पिछले विधानसभा चुनाव में उसका समझौता कांग्रेस और सपा से था। पहली बार उसे सबसे खराब प्रदर्शन का मुंह देखना पड़ा जब उसका महज एक उम्मीदवार ही छपरौली सीट से जीत पाया। वह भी चुनाव बाद भाजपा में शामिल हो गया। पिछले लोकसभा चुनाव में उसका सपा-बसपा से गठबंधन था। पर कामयाबी एक भी सीट पर नहीं मिल पाई। हालत यह है कि इस समय उत्तर प्रदेश विधान मंडल और संसद दोनों के चारों सदनों में इस पार्टी का एक भी सदस्य नहीं है। अगला विधानसभा चुनाव जयंत चौधरी ने सपा के साथ मिलकर लड़ने की घोषणा पहले से ही कर रखी है। किसान आंदोलन के कारण पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इस पार्टी को पंचायत चुनाव के नतीजों ने फिलहाल संजीवनी दी है।

