नीतीश कुमार ने फिर एक नया रेकार्ड बना ही लिया। मुख्यमंत्री रहते तीन बार बिहार विधान परिषद में निर्विरोध चुन लिए गए। ऐसा रेकार्ड किसी ने नहीं बनाया। नीतीश कुमार 2005 से लगातार मुख्यमंत्री हैं। बीच में कुछ महीने के लिए उनकी कृपा से जीतन राम मांझी मुख्यमंत्री हुए जरूर, लेकिन नीतीश कुमार की ही वजह से उन्हें हटना भी पड़ा। मान कर चला जा रहा है कि नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री हैं। ऐसे मुख्यमंत्री और भी मिल जाएंगे, जो विधान परिषद में सदस्य हुए लेकिन बाद में उन्होंने विधानसभा या लोकसभा का चुनाव भी लड़ा। नीतीश कुमार ने ऐसा जोखिम कभी नहीं उठाया। उठाने की जरूरत पड़ी भी नहीं। उनकी ऐसी रणनीति ही रही कि विधानसभा में उनकी पार्टी के विधायक पर्याप्त संख्या में रहें और उनकी सरकार भी।
अगले साल लोकसभा का चुनाव है और उसके बाद 2020 में विधानसभा चुनाव। अपने सूबे में नीतीश कुमार ही दोनों चुनावों में मोर्चा संभालेंगे। चुनाव नतीजा जो भी हो, वे तो विधान परिषद में मौजूद रहेंगे ही। विरोधी तो यह बता चुटकी लेते हैं कि नीतीश कुमार अपने लिए भला क्यों जनता से वोट मांगें? सीधे चुनाव लड़ने का साहस करना ही कोई साहस है क्या राजनीति में? नीतीश कुमार तेजतर्रार हैं ही, छोटी लकीर से समानांतर बड़ी लकीर खींचने वाले राजनीतिक। यह बात अलग है कि राजनीति में ऐसा दौर भी अरसे तक रहा, जब मुख्यमंत्री के लिए अघोषित परंपरा रही कि वह जनता के बीच से चुनकर ही सदन में आएगा। अब तो कोई जोखिम नहीं उठाता। यूपी में योगी आदित्यनाथ ने भी विधान परिषद का रास्ता ही अपनाया। इससे पहले अखिलेश यादव को भी कोई जांबाजी नहीं जंची थी विधासभा चुनाव लड़कर सरकार का नेतृत्व करने में। सो विधानपरिषद की आसान राह ही भायी थी उन्हें भी।

