बॉबी मैक्फेरीन के दुुनिया भर में मशहूर हुए गीत ‘डोंट वरी-बी हैप्पी’ को 1988 में ‘ग्रैमी’ पुरस्कार से नवाजा गया था। बहुत कम लोगों को पता होगा कि बॉबी मैक्फेरीन को इस गीत की प्रेरणा पुणे में पैदा हुए फारसी सूफी संत मेहर बाबा से मिली थी। मेहर बाबा के जो भी शैदाई थे, उन्होंने 1966 में उनकी वह तस्वीर संजो कर रखी है, जिस पर बाबा ने लिखा था ‘डोंट वरी-बी हैप्पी’! मेहर बाबा ईरान के शिराज से हफीज की शायरी को भारत की जमीन पर उतारने वाले एकमात्र सूफी थे। हफीज की शायरी की तरह ही उमर खैयाम की रूबाइयां (चार पंक्तियों वाली शायरी) बिना किसी रोक-टोक के ईरान से भारत पहुंच गर्इं। भारत-ईरान के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान का यह सिलसिला सिंधु घाटी-मेसोपोटामिया की सभ्यता से आरंभ है। शुक्र मनाइए कि ईरान से शायरी पहले आई, तेल बाद में। वरना, शायरी में भी कटौती की संभावना थी।
ओबामा सरकार के ऊर्जा मामलों के विशेष दूत कार्लोस पास्कल 13 मई 2012 को नई दिल्ली आए थे। पास्कल को पधारे चौबीस घंटे भी नहीं हुए कि भारत सरकार ने ईरान से तेल आयात में कटौती की घोषणा कर दी। इसकी पृष्ठभूमि तत्कालीन अमेरिकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन ने तैयार की थी। ईरान पर प्रतिबंध के कारण भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण चाबहार बंदरगाह परियोजना पर विराम लग गया था। बलूचिस्तान के ग्वादर से मात्र बहत्तर किलोमीटर दूर चाबहार बंदरगाह सामरिक रूप से इतना महत्त्वपूर्ण है कि यहां पर काम में बाधा के बाद पाकिस्तान ने राहत की सांस ली थी। 13 मई 2012 को हुई उस घटना के चार साल बाद चाबहार बंदरगाह के विकास को फोकस करती हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा को लेकर इस्लामाबाद में बेचैनी है। अप्रैल 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तेहरान गए थे, तभी चाबहार बंदरगाह को लेकर महत्त्वाकांक्षी योजना बन गई थी। जनवरी 2003 में ईरान के राष्ट्रपति मोहम्मद खतामी भारत आए और तेल व गैस के निर्यात के साथ-साथ चाबहार समझौते पर दस्तखत हुए। चाबहार परियोजना कई कारणों से कछुआ चाल से चलती और ठहरती रही।
पूरी दुनिया में रूस के बाद ईरान ही ऐसा मुल्क है, जिसके पास विशाल गैस भंडार है। पिछले हफ्ते ही इटली के प्रधानमंत्री रेंजी तेहरान में थे। उन्होंने ईरान से ऊर्जा सहयोग और बुनियादी संरचना के वास्ते जो समझौते किए, उनमें तेहरान हवाई अड््डे का विकास भी है। प्रतिबंध लगाने और फिर तेहरान से बातचीत करने वाले ‘पी-फाइव, प्लस वन ग्रुप’ (ब्रिटेन, रूस, फ्रांस, अमेरिका, चीन, साथ में जर्मनी) की ईरान में दिलचस्पी का बड़ा कारण व्यापार है। इस समय अमेरिकी, फ्रेंच, जर्मन आॅटोमोबाइल, विमान व सिविल न्यूक्लियर कंपनियां तेहरान पर लगभग टूट पड़ी हैं। ईरान को हर साल तीस विमान चाहिए। दस साल में ईरान को तीन सौ यात्री विमान खरीदने हैं। उसके लिए अमेरिकी विमान निर्माता ‘बोइंग’ और ‘एयरबस’ बेचने वाली यूरोपीय कंपनियां प्रतिस्पर्धा में हैं। ईरान की प्राइवेट एयरलाइंस ‘महान एयर’ पर 2011 से तीन बार प्रतिबंध लग चुका है। ‘महान एयर’ के विमानों का इस्तेमाल सीरिया में हथियार सप्लाई करने, हिजबुल्ला लड़ाकों, ‘इस्लामिक रिपब्लिकन गार्ड कोर्प’ को लाने-ले जाने में किया जाता रहा है। अब यही ‘महान एयर’ यूरोपीय-अमेरिकी कंपनियों के लिए पाक-साफ है।
ईरान पर बाज की तरह झपट््टा मारने वाली यूरोपीय-अमेरिकी कंपनियों के आगे भारत कहां टिकेगा, मौजूदा वक्त में यह लाख टके का सवाल है। 2005 से 2013 तक ईरान ने अपना सत्तर फीसद विदेश व्यापार चीन, ब्राजील, तुर्की और भारत के साथ किया था। यह करीब डेढ़ सौ अरब डॉलर के आसपास है। अफसोस कि ईरान के विदेश व्यापार का बहुत छोटा अंश भारत को मिल पाता है। भारत-ईरान के बीच कोई सोलह अरब डॉलर का सालाना व्यापार है।
भारत के नींद से जागने की वजह पाकिस्तान भी है। पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ इस साल जनवरी में तेहरान की यात्रा पर थे। उसके तीन माह बाद मार्च में ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी का स्वागत रावलपिंडी एयरबेस पर किया गया। पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ईरानशेहर से इक्कीस सौ किलोमीटर लंबी गैस पाइपलाइन लाने के वास्ते गंभीर प्रयास कर रहे हैं। बिजली परियोजना में भी ईरान, पाकिस्तान की मदद कर रहा है। ईरानशेहर से गैस पाइपलाइन को वाया मुल्तान नई दिल्ली तक लाने की बात पहले हुई थी, उस समय इस ‘आइपीआइ’ (ईरान, पाकिस्तान, इंडिया), जिसे ‘पीस पाइपलाइन’ भी कहा जाता था, की कुल प्रस्तावित लंबाई 2700 किलोमीटर थी, जिसमें भारत के हिस्से छह सौ किलोमीटर पाइपलाइन आनी थी। पर अमेरिकी दबाव में यह महत्त्वाकांक्षी परियोजना छह साल पहले स्थगित कर दी गई। क्षेत्रीय असुरक्षा को देखते हुए भारत इस ‘पीस पाइपलाइन’ से बाहर हो चुका था। दूसरी वजह, पाइपलाइन का व्यास छप्पन इंच से बयालीस इंच कर देने का फैसला भी था, जो भारत को मंजूर नहीं था। इस समय कुछ पक्का नहीं कहा जा सकता कि ‘आइपीआइ’ पाइपलाइन के लिए भारत फिर से विचार करेगा।
पाकिस्तान ने कश्मीर के सवाल पर भी ईरान को गुमराह करने की कोशिश की थी। 19 नवंबर 2010 को ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने कश्मीर में चल रहे अलगाववादी ‘आंदोलन’ की मध्यपूर्व में चल रहे विद्रोह से तुलना करते हुए उसे दुनिया भर के मुसलमानों से समर्थन देने की अपील की थी। प्रधानमंत्री मोदी ईरान की कश्मीर नीति को लेकर अयातुल्ला अली खामेनेई को कितना समझा पाते हैं, यह मोदीजी की कूटनीतिक कुशलता पर निर्भर है।
ईरान का सत्ता प्रतिष्ठान तेल की बकाया राशि को लेकर भारत से थोड़ा रूठा-सा था। भारत के अधिकारियों का तर्क था कि तेल के भुगतान के वास्ते कोई उचित माध्यम नहीं मिल रहा था। ईरान पर प्रतिबंध के कारण भारतीय तेल आयात कंपनियों ने यूको बैंक में पैंतालीस प्रतिशत राशि भारतीय मुद्रा में जमा करा दी थी। पिछले महीने पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ईरान में थे, उस दौरान पचहत्तर करोड़ डॉलर यूनियन बैंक आॅफ इंडिया के माध्यम से तुर्की के हाल्क बैंक और जर्मनी के यूरोपिशे-ईरानिशे हांडेल बैंक को भेजे गए। इस पचहत्तर करोड़ डॉलर में से मैंगलोर रिफाइनरी के हिस्से पचास करोड़ डॉलर बकाया थे। भारत की एस्सार तेल कंपनी ने अब आकर घोषणा की है कि वह शीघ्र ही पचास करोड़ डॉलर ईरान को भेजेगी। ईरान पर से प्रतिबंध जनवरी 2016 में हटा था, मगर भारतीय तेल कंपनियों ने भुगतान पांच माह बाद किए, वह भी एक मंत्री की पहल के बाद। क्या इससे रिश्ते बेहतर हो सकते हैं? ईरान के एक तबके की सोच यह है कि प्रतिबंध के बाद भुगतान को लेकर जिन कंपनियों ने लेट-लतीफी की, उससे हमारा विकास अवरुद्ध हुआ है। यों, भारत में इस बात की गलतफहमी भी रही है कि ईरान से जो तेल आयात किया जा रहा है, उसकी अदायगी भारतीय मुद्रा में होगी।
आने वाले समय में भारत, अफगानिस्तान, पाकिस्तान और चीन की कूटनीति चाबहार के इर्दगिर्द होगी। चाबहार पत्तन का विकास मुख्य एजेंडे में है, इसलिए प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के साथ-साथ अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी का 23 मई को तेहरान पहुंचना तय हुआ था। चाबहार पर त्रिपक्षीय हस्ताक्षर, आतंकवाद से संघर्ष और आर्थिक रणनीति तय करने के प्रमुख एजेंडे को लेकर तीन शासनाध्यक्षों का मिलना सचमुच महत्त्वपूर्ण है। अफगानिस्तान के पास अपना कोई समुद्री मार्ग नहीं है। वह अब तक पाकिस्तान पर निर्भर रहा है, जो अफगान उत्पादों के लिए काफी महंगा साबित हो रहा था। चाबहार बंदरगाह के बजरिये अफगानिस्तान को मध्य एशिया के देशों तुर्कमेनिस्तान, उजबेकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, कजाकस्तान तक सस्ता और सुलभ मार्ग मिल सकेगा।
गुजरात के कांडला बंदरगाह से चाबहार की दूरी 650 समुद्री मील है, जिसे डेढ़ दिन की समुद्री यात्रा माना जा सकता है। मुंबई से चाबहार की दूरी 936 समुद्री मील है, वहां कार्गो पहुंचने में दो दिन लग सकते हैं। ओमान की खाड़ी से गुजरते ईरान के हिस्से वाले दक्षिणी सिस्तान व बलूचिस्तान स्थित चाबहार बंदरगाह सामरिक दृष्टि से अति महत्त्वपूर्ण है। चाबहार बंदरगाह को जोड़ने वाली देलराम से जारांज तक जो सड़क बन रही है, उससे अफगानिस्तान के सभी बड़े शहरों से संपर्क संभव है। चाबहार-जाहेदान रेल लाइन बन गई तो भारत को खनिज उत्खनन और खनिज आयात के साथ-साथ अफगानिस्तान जैसा बड़ा बाजार मिल जाएगा। तांबा, लौह, क्रोम, यूरेनियम, जिंक, सोना, चांदी, बाक्साइट, सल्फर जैसे खनिजों और रूबी, लापिज जैसे रत्नों से भरपूर अफगानिस्तान का उद्योग जगत अफीम की खेती जैसे कलंक से छुटकारा चाहता है। बामियान के पास चीन ने ‘रेयर अर्थ मेटल’ के विशाल भंडार का एकाधिकार अफगानिस्तान से प्राप्त कर लिया है।
इसमें कोई शक नहीं कि चाबहार के जरिए भारत को मध्य एशिया तक पहुंचने का सीधा और छोटा रास्ता बहुत पहले मिल जाता। 2003 में हुए चाबहार समझौते के बाद हम सोए रहे, कूटनीति की दृष्टि से यह सही नहीं हुआ। खर्च के हिसाब से आकलन करें तो भारत, चीन के मुकाबले लगभग आधा निवेश कर, मध्य एशिया के लिए एक सुरक्षित रास्ता हासिल कर रहा है। जबकि चीन, ग्वादर तक पहुंच के लिए छियालीस अरब डॉलर का निवेश कर रहा है। फिर भी ग्वादर मार्ग तालिबान और दूसरे कबायली गुटों के कारण अधिक असुरक्षित है। चीन और पाकिस्तान की सबसे बड़ी चिंता मध्य एशिया में भारत द्वारा एकाधिकार छीने जाने और व्यापारिक प्रतिस्पर्धा को लेकर है। बलूचिस्तान को पाकिस्तान, भारत की छाया से दूर रखना चाहता था, पर अब तो बिसात बिछ चुकी है!
(पुष्परंजन)
