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खौफनाक सीन, तेज आवाजें, डर पैदा करने वाली कहानियां, कुछ लोग ऐसे होते हैं जो डरावनी हॉरर फिल्म देखते हैं, और फिर आराम से सो जाते हैं, जैसे कुछ हुआ ही न हो। आमतौर पर लोग इसे ‘अजीब’ या ‘डर से बेपरवाह’ मान लेते हैं, लेकिन मनोविज्ञान (Psychology) इससे कहीं अलग कहानी बताता है। (Photo Source: Pexels)
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यह साइकोपैथी नहीं है
साइकोलॉजी के अनुसार, हॉरर मूवी देखकर भी शांत रहने का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति में भावनाएं नहीं हैं या वह साइकोपैथ है। असल में, यह दिमाग की फियर प्रोसेसिंग सिस्टम यानी डर को समझने और संभालने की क्षमता से जुड़ा होता है। रिसर्च बताती है कि ऐसे लोगों का दिमाग डर को खतरे की बजाय स्टिमुलेशन (उत्तेजना) के रूप में देखता है। (Photo Source: Pexels) -
दिमाग डर को कैसे अलग तरह से प्रोसेस करता है?
भावनात्मक नियंत्रण (Emotional Control)
ऐसे लोगों का दिमाग वास्तविक खतरे और काल्पनिक डर के बीच साफ फर्क कर लेता है। हॉरर फिल्म का डर असली नहीं है, यह बात उनका दिमाग तुरंत समझ लेता है। इस वजह से स्ट्रेस हार्मोन्स जैसे कोर्टिसोल लंबे समय तक सक्रिय नहीं रहते। परिणामस्वरूप, डर खत्म होते ही शरीर जल्दी शांत हो जाता है। (Photo Source: Unsplash) -
सेंसशन-सीकिंग (Sensation Seeking)
कुछ लोग रोमांच और तेज अनुभवों को पसंद करते हैं। हॉरर मूवी उनके लिए डर नहीं, बल्कि एक थ्रिल होती है। इस दौरान उनके दिमाग में डर की जगह डोपामाइन रिलीज होता है, और लंबे समय तक रहने वाली चिंता (anxiety) नहीं बनती। इसलिए डर के बाद भी मन भारी नहीं होता। (Photo Source: Pexels) -
स्ट्रेस रेजिलिएंस (Stress Resilience)
इन लोगों का नर्वस सिस्टम तनाव से जल्दी बाहर आ जाता है। जहां आम लोगों में डर के बाद भी शरीर अलर्ट मोड में रहता है, वहीं ऐसे लोग जल्दी ‘बेसलाइन’ पर लौट आते हैं। यही कारण है कि उन्हें नींद गहरी आती है, और डरावने सीन दिमाग में घूमते नहीं रहते। (Photo Source: Pexels) -
कॉग्निटिव फ्रेमिंग (Cognitive Framing)
ये लोग हॉरर को पहले से ही एंटरटेनमेंट के रूप में लेबल कर देते हैं। उनका दिमाग जानता है- ‘यह सिर्फ फिल्म है, असल जिंदगी नहीं।’ इस सोच से इमोशनल मेमोरी एक्टिव नहीं होती, और डर से जुड़े मानसिक लूप नहीं बनते। (Photo Source: Pexels) -
रिसर्च क्या कहती है?
वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, हॉरर फिल्मों का आनंद लेने और डर से जल्दी उबरने की क्षमता का संबंध बेहतर इमोशनल रेगुलेशन, ज्यादा थ्रिल टॉलरेंस, और मजबूत नर्वस सिस्टम कंट्रोल से होता है, ना कि साइकोपैथी से। (Photo Source: Pexels)
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