मनुष्य का स्वभाव है कि वह भविष्य की अनिश्चितता, बीती हुई गलतियों और वर्तमान की कठिनाइयों को लेकर बार-बार चिंता में डूब जाता है। चिंता एक ऐसी मानसिक अवस्था है, जो न तो समस्या का समाधान करती है और न ही हमें आगे बढ़ने की शक्ति देती है। उलटे, यह हमारे आत्मविश्वास को कमजोर करती है, निर्णय क्षमता को कुंद करती है और मन को भ्रमित कर देती है।

व्यर्थ की चिंता में डूबा व्यक्ति अक्सर समस्या को उससे भी बड़ा बना लेता है, जितनी वह वास्तव में होती है। इसके विपरीत चिंतन एक सकारात्मक, रचनात्मक और उद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है। चिंतन का अर्थ है- शांत मन से स्थिति को समझना, तथ्यों का विश्लेषण करना और संभावित समाधानों पर विचार करना। जहां चिंता ‘क्या होगा?’ के भय से शुरू होती है, वहीं चिंतन ‘अब क्या किया जाए?’ के उत्तर की खोज करता है।

चिंता हमें अतीत और भविष्य में उलझाए रखती है

चिंता हमें अतीत और भविष्य में उलझाए रखती है, जबकि चिंतन हमें वर्तमान में टिक कर सही कदम उठाने की दिशा देता है। जब हम चिंतन करते हैं, तो हम समस्या के मूल कारण तक पहुंचते हैं। हम अपनी गलतियों से सीखते हैं, उपलब्ध संसाधनों का सही आकलन करते हैं और एक ठोस योजना बनाते हैं। यह प्रक्रिया हमें निष्कर्ष तक पहुंचाती है। एक ऐसा निष्कर्ष जो केवल विचार नहीं, बल्कि कार्य की स्पष्ट दिशा देता है और जब दिशा स्पष्ट होती है, तो प्रयास भी सटीक होते हैं, जिससे सफलता की संभावना बढ़ जाती है।

सफल व्यक्तियों का जीवन देखें, तो स्पष्ट होता है कि उन्होंने कठिन परिस्थितियों में चिंता नहीं की, बल्कि गहन चिंतन किया। उन्होंने डर के बजाय समझ को चुना, घबराहट के बजाय धैर्य को अपनाया। इसलिए आवश्यक है कि हम भी व्यर्थ की चिंता छोड़ कर सार्थक चिंतन को अपनाएं। क्योंकि चिंता समस्या को जटिल बनाती है, जबकि चिंतन समाधान को सरल करता है और हमें लक्ष्य तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त करता है।

परेशानी में हिम्मत और विवेकशीलता के साथ काम लेना चाहिए

जब-जब जीवन में किसी परेशानी की आहट सुनाई दे, तब सबसे पहले हिम्मत और विवेकशीलता के साथ काम लेना चाहिए। परेशानी का आना कोई असामान्य बात नहीं है, यह जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया है। हर व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी कठिन परिस्थितियां आती ही हैं। फर्क केवल इतना होता है कि हम उन परिस्थितियों का सामना कैसे करते हैं। यदि पहली प्रतिक्रिया घबराहट या हताशा की हो, तो समस्या स्वत: ही और बड़ी लगने लगती है।

चिंता मन को अस्थिर कर देती है। जब मन डगमगाता है, तब सोचने-समझने की शक्ति कमजोर पड़ जाती है। हताशा हमें यह विश्वास दिलाने लगती है कि अब कोई रास्ता नहीं बचा, जबकि वास्तव में रास्ते हमेशा होते हैं, बस उन्हें देखने के लिए शांत और संतुलित मन चाहिए। घबराहट में लिया गया निर्णय अक्सर गलत दिशा में ले जाता है और परेशानी को सुलझाने के बजाय और उलझा देता है। इसके विपरीत, हिम्मत हमें भीतर से मजबूत बनाती है। हमें यह विश्वास देती है कि चाहे परिस्थिति कितनी भी कठिन क्यों न हो, उसका सामना किया जा सकता है। वहीं विवेकशीलता हमें सही और गलत में अंतर करना सिखाती है।

हिम्मत और विवेक का संतुलन ही किसी भी संकट से निकलने का सबसे प्रभावी उपाय है। परेशानी के समय शांत रह कर स्थिति का मूल्यांकन करना, समस्या के कारणों को समझना और एक-एक कदम करके समाधान की ओर बढ़ना ही समझदारी है। जीवन के अनुभव भी यही सिखाते हैं कि कठिनाइयां हमें तोड़ने नहीं, बल्कि मजबूत बनाने आती हैं। इसलिए जब भी किसी परेशानी की आहट सुनाई दे, चिंतित या हताश होने के बजाय धैर्य, साहस और विवेक के साथ उसका सामना करें।

अतीत को ज्यादा मत याद कीजिए

अतीत को इतना मत याद कीजिए कि वह आपको दुखी करने लगे, क्योंकि बीते हुए कल की परछाइयां वर्तमान के उजाले को भी धुंधला कर देती हैं। मनुष्य का स्वभाव है कि वह अपने अतीत की गलतियों, असफलताओं और कड़वे अनुभवों को बार-बार याद करता है। यह स्मृतियां जब सीख देने के बजाय बोझ बन जाती हैं, तब वे चिंता, हताशा और चिंतन के बीच के संतुलन को बिगाड़ देती हैं।

अतीत में उलझा मन वर्तमान क्षण को पूरी तरह जी ही नहीं पाता। मन बार-बार यही सोचता है कि जो पहले गलत हुआ, वह फिर न हो जाए। यही भय भविष्य की कल्पनाओं में बदल जाता है और व्यक्ति अनावश्यक रूप से चिंतित रहने लगता है। यह चिंता आत्मविश्वास को कम करती है।

जब वर्तमान के हर कदम पर अतीत की असफलताओं का बोझ लदा हो, तो आगे बढ़ना कठिन हो जाता है। इसी चिंता से हताशा जन्म लेती है। व्यक्ति स्वयं को दोषी मानने लगता है, अपने प्रयासों को व्यर्थ समझने लगता है और उसे लगता है कि अब कुछ भी बदलना संभव नहीं। हताश मन न तो अवसर देख पाता है और न ही समाधान। वह वर्तमान को भी अतीत की तरह निरर्थक मानने लगता है, जबकि सच्चाई यह है कि हर नया दिन एक नई संभावना लेकर आता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि अतीत को पूरी तरह भुला दें।

अतीत का सही उपयोग सकारात्मक चिंतन में है। अतीत से सीख लेकर, अनुभवों को मार्गदर्शक बना कर, वर्तमान में बेहतर निर्णय लेना ही विवेकपूर्ण चिंतन है। चिंता और हताशा जहां हमें पीछे खींचती हैं, वहीं संतुलित चिंतन आगे बढ़ने की दिशा देता है। इसलिए अतीत को सिर्फ स्मृति के रूप में रखें, बोझ के रूप में नहीं। वर्तमान पल अनमोल हैं; यदि इन्हें चिंता और हताशा में गंवा दिया, तो भविष्य भी अतीत बन जाएगा। सीखें, समझें और आगे बढ़ें। यही जीवन का सार है।

(लेखक: मुनीष भाटिया)

यह भी पढ़ें: हंस कर जीने का रहस्य – टेंशन के दौर में भी अंदर से मजबूत क्यों रहते हैं खुशदिल लोग, और कैसे वही समाज की असली ताकत बन जाते हैं?