Duniya Mere Aage

धारणाओं की धुरी पर

मनुष्य आमतौर पर पूर्वाग्रह से भरा हुआ जीव है। किसी नई जगह जाने या किसी नए व्यक्ति से मिलने से पहले हम कई बार...

सुविधा की संवेदनाएं

विद्यार्थियों को पढ़ाना सदैव सुखद अहसास देता है। खासतौर पर कॉलेज में पढ़ाते हुए हम युवाओं की सोच से भी अवगत रहते हैं।

गम, गुड़िया और साथी

कितने सारे खिलौने थे। एक खिलौने में एक ढोल बजाता बंदर था, तो दूसरे में पहियों के सहारे चलने वाला घोड़ा। तीसरे को छुक-छुक...

चिठिया हो तो...

वक्त के साथ कैसे सब कुछ इतना बदल जाता है कि एक दौर में सबके लिए सबसे जरूरी चीजें बेमानी हो जाती हैं।

वक्त का हिसाब

टीवी धारावाहिक महाभारत के सूत्रधार की गंभीर आवाज में कहे गए शब्द ‘मैं समय हूं’ को कौन भूल सकता है।

संकल्प की शक्ति

इतिहास साक्षी है कि मनुष्य के संकल्प के सामने नकारात्मक शक्तियां भी नाकाम हो जाती हैं।

दुनिया मेरे आगे: सिकुड़ती दुनिया

भागदौड़ भरी जीवन शैली ने जीवन की छोटी-छोटी बातों की तरफ हमारा ध्यान जाने से लगभग रोक दिया है।

दुनिया मेरे आगे : अनुभूति और अभिव्यक्ति

अनुभूति को अभिव्यक्ति का वरदान मिलना एक दुर्लभ संयोग है। वरना लोग यही कहते रहते हैं कि जैसा उन्होंने सोचा था उसे व्यक्त करने...

दुनिया मेरे आगे: पूर्वाग्रह की परतें

अपने आसपास के लोगों से सुनी हुई बातें आमतौर पर धारणा बन कर हमारे मनोविज्ञान का हिस्सा बन जाती हैं। मेरे पड़ोस में रहने...

दुनिया मेरे आगे: स्थानीयता का आग्रह

पिछले समूचे साल ‘लोकल टू वोकल’ यानी स्थानीय को लेकर जागरूक होने का ऐसा शोर हुआ कि हम भी स्थानीय या इसके भी विस्तार...

दुनिया मेरे आगे: दान का सुख

हमारे पूर्वज शुरू से ही हमारी जीवनशैली को बेहतर बनाने के लिए ज्ञान की अनगिनत बातें बताते रहे हैं। अनेक बोधकथाएं ऐसी हैं, जिन्हें...

दुनिया मेरे आगे: स्नेह के संबोधन

सन 1893 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद ने जब अपने श्रोताओं को ‘मेरे अमेरिकी बहनों और भाइयों’ कह कर...

दुनिया मेरे आगे: कृत्रिमता से जूझते मासूम

इन दिनों बच्चियों के जीवन से गुड़िया खो-सी गई है। पहले उनके जीवन में गुड्डे भी होते थे और गुड़िया भी। उनके जीवन की...

दुनिया मेरे आगे: शब्दों की संवेदना

अब सारे अक्षरों में से जीवन के वे रंग गायब हो गए लगते हैं। कुछ खास फॉन्ट में लिखे हुए इन अक्षरों से मन-मस्तिष्क...

दुनिया मेरे आगे: उम्मीदों के दीये

मानव युगों से यह कशमकश कर रहा है और वह अज्ञानता का यात्री होने के बावजूद ज्ञान की खोज कर रहा है। पृथ्वी, आग,...

दुनिया मेरे आगे: रोशनी का दायरा

एक दौर था, जब दीपावली आते ही स्थानीय हाट और बाजार मिट्टी के दीये और संबंधित अन्य आवश्यक सामग्रियों से पट जाते थे। मिट्टी...

दुनिया मेरे आगे: मिट्टी की संवेदना

मिट्टी चाहे खेत की हो या चौखट की, हमने सदैव उसे मस्तक झुका प्रणाम किया। अपने गांव, देश की मिट्टी से प्रेम का...

दुनिया मेरे आगे: अस्तित्वहीनता का बोध

हाशिये के समूहों की चर्चा करते हुए अक्सर स्त्री, दलित, आदिवासी और अब किसान वर्ग की बात की जाती है, लेकिन इसी समाज में...

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