ताज़ा खबर
 

Duniya Mere Aage

दुनिया मेरे आगेः मां कह एक कहानी

श्रीप्रकाश शर्मा कोई शिशु जब पहली बार अपनी तोतली आवाज में ‘मां’ बोलता है तो उसकी अनुभूति अनायास ही दिल की गहराई को छू जाती है और इसके एहसास में स्त्री की सार्थकता और मातृत्व का सुख साकार हो उठता है। कालांतर में जब वह शिशु बड़ा हो जाता है और वह चाहे कितनी ही […]

दुनिया मेरे आगेः परिधि में स्त्री

राजकुमारी लिखती हैं- यों तो समूची दुनिया में अलग-अलग शक्ल में स्थिति बहुत अलग नहीं है, लेकिन खासतौर पर भारत की महिलाएं एक तरह से मूक नेत्री रही हैं। पितृसत्तात्मक व्यवस्था और मानसिकता ने जो संस्कारों की घुट्टी पिला कर उन्हें पोषित किया, उसी में रच-बस कर उसी तरह जीना।

women, women empowerment, jansatta

दुनिया मेरे आगे : इच्छाओं के टूटे पंख

यों सारी दुनिया की स्त्रियों के प्रंसग और उनसे जुड़ी समस्याएं इस कदर एकरूप हैं कि उनमें एक तरह का बहनापा दर्ज किया जा सकता है।

arunendranath verma, article, dunia mere aage, column, jansatta newspaper

दुनिया मेरे आगे कॉलम में अरुणेंद्रनाथ वर्मा का लेख : संदेह के सांप

अचानक घबराई हुई पत्नी ने बताया कि बड़ी देर से हमारी कार के पीछे एक मोटरसाइकिल चली आ रही थी। उस पर दो युवा सवार थे। बाइक की हेडलाईट आॅफ करके वे बराबर हमारी कार से लगभग तीस गज पीछे चले आ रहे थे।

guitar, music, jansatta, editorial, duniya mere aage

दुनिया मेरे आगे : धुन समंदर

इस धुन में चलते नहीं, तैरते हैं किरदार, जैसे वे सपने में हों या जो कुछ घटता हो, सपना होता हो! इतना धीमे, जैसे गुरुत्वाकर्षण के दायरे में न हो।

woman, organisations, rights, pepsico, duniya mere aage, column, article, aneeta mishra

‘दुनिया मेरे आगे में’ में अनीता मिश्रा का लेख : वर्चस्व की हीनता

कुछ समय पहले पेप्सिको की अध्यक्ष इंदिरा नूयी ने कहा था- ‘हमारे साथ भी पुरुषों के समांतर बर्ताव किया जाए…! हमें हंसी में भी ‘स्वीटी’ या ‘हनी’ जैसे संबोधनों से न बुलाया जाए।’

gyanprakash vivek, gajal, jansatta, ravivari, column

दुनिया मेरे आगे : अनमोल खजाना

इतना कहकर मैं दरवाजे की तरफ बढ़ा। मांगी राम के दोनों बेटे दरवाजे के बेड़े पकड़े खड़े थे। उन्होंने मेरा रास्ता रोकना चाहा।

sadashiv shrotriya, article, jansatta editorial page, column, dunia mere aage, affection, parents, kids

दुनिया मेरे आगे : समाज का पहिया

मां एक इंसान ही है, जैसे कि पिता। उसकी भी अपनी मजबूरियां, अपने दबाव हैं, संस्कार और असुरक्षा हैं। सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों की वजह से वह बच्चों के साथ ज्यादा समय बिताती है और इस कारण उसे ज्यादा लगाव महसूस होता है।

विविधता की जगह

वरुण शर्मा जिन आदिवासी समुदायों की भाषाएं विलुप्ति के कगार पर हैं, उनके बच्चों को आज एक दोराहे पर खड़ा कर दिया गया है। एक तरफ घर-परिवार में बोली जाने वाली भाषा है तो दूसरी तरफ विद्यालयी भाषा। खुद की भाषा भूलते हुए विद्यालयी भाषा सीखने में आ रही समस्या को हल करने में हमारी […]

बचपन के रंग

विष्णु नागर जिन दिनों हमारे साथी, मित्र, रिश्तेदार ठंड से ठिठुर रहे हैं, हम अपने दो पोतों के पास केरल में हैं, जहां ठंड का नामोनिशान नहीं है। बड़ा पोता सवा पांच साल का और छोटा सात महीने का है। खैर, बड़ा पोता शुरू से खाने-पीने के मामले में काफी तंग करने वाला रहा है […]

धर्मांतरण के पहलू

उमाशंकर सिंह धर्मांतरण पर मचे शोरगुल के बीच सत्तारूढ़ भाजपा जोर देकर कह रही है कि वह धर्मांतरण रोकने लिए कानून बनाने के पक्ष में है। लेकिन कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां इस कानून के मुद्दे पर खामोश दिख रही हैं। दरअसल, धर्मांतरण और धर्मांतरण के बीच के फर्क है। एक धर्मांतरण जो आगरा में […]

घरौंदे का तिनका

असीमा भट्ट एक सुखद संयोग है कि मैं मुंबई में जहां रहती हूं, वहां की बालकनी से बाहर देखने पर बंगाल में होने का आभास होता है। वहां पुराने बरगद, अशोक, नारियल, सेमल और कुछ अलग किस्म के भी पेड़ हैं। शायद शिशिर के पेड़ हैं। उनमें छोटे-छोटे रेशमी फूल होते हैं। वहां तरह-तरह की […]

निनाद : अंदर की असमानता

कुलदीप कुमार जाति-व्यवस्था आज भी कितनी मजबूत है और आजादी मिलने के सड़सठ साल बाद भी देश में छुआछूत का अभिशाप किस हद तक बना हुआ है, इसका कुछ-कुछ आभास उस ताजातरीन सर्वेक्षण से मिल सकता है, जिसके बारे में खबर 29 नवंबर, 2014 के इंडियन एक्सप्रेस के मुखपृष्ठ पर सबसे ऊपर प्रमुखता से छापी […]

आचार्य के शहर में

ध्रुव शुक्ल रायबरेली पहली बार जाना हुआ। राजनीति की दुनिया में यह स्थान इंदिरा-स्मृति से जुड़ा हुआ है और अब उसकी प्रतिनिधि सोनिया गांधी हैं। राजमार्ग से जुड़ी रायबरेली की सड़कें चौड़ी और साफ-सुथरी हैं। यहां के लोग प्रियदर्शिनी इंदिरा गांधी को अब भी आदरभाव से याद करते हैं। रायबरेली को आचार्य-स्मृति का शहर भी […]

दूर के राही

सुनील मिश्र पिछले महीने विख्यात पार्श्वगायक दिवंगत किशोर कुमार की पुण्यतिथि तेरह अक्तूबर को सरकारी ड्यूटी के हिसाब से एक दिन पहले खंडवा आ गया था। गीतकार समीर का राष्ट्रीय किशोर कुमार सम्मान से अलंकरण उसी दिन होना था। इस सम्मान समारोह को भोपाल से खंडवा आए कई वर्ष हो चुके हैं। श्याम बेनेगल, जावेद […]

तुम अकेली नहीं होगी

सदफ़ नाज़ प्यारी रेहाना जब्बारी! तुम्हारी मां ‘शोलेह’ के नाम तुम्हारा खत पढ़ा। तुम्हारी फांसी और उसके बाद इस खत से अब पूरी दुनिया तुम्हें जान चुकी है। तुम्हारे अल्फाजों में छिपे दर्द की कसक ने दुनिया को झकझोर दिया है। सुनो रेहाना, तुम दूर कहीं खला में या फिर जन्नत में खुदा के घर […]

नफरत के नासूर

निवेदिता पच्चीस साल पहले भागलपुर जख्मों से भर गया था। एक बार फिर उसके जख्म हरे हो गए। स्मृति भी किस अंधेरे में अपना राज खोलती है। मुद्दत पहले की घटनाएं ऐसे याद आ रही हैं, जैसे आज की बात हो। भागलपुर दहक रहा था। दंगे की आग की लपटें मंद पड़ने लगी थीं। पर […]

उलटी बयार

विश्वंभर शिक्षा में बदलाव के प्रति राज्य सरकारों के सरोकारों और गंभीरता को उनके फैसलों के संदर्भ में देखा-समझा जाना चाहिए। राजस्थान के शिक्षामंत्री ने कहा है कि ‘आठवीं कक्षा तक बच्चों को फेल न करने का निर्णय सही नहीं है। बच्चों का सही शैक्षणिक विकास हो सके, इसके लिए आठवीं तक तीन स्तर पर […]