इस साल दावोस नहीं जा सकी, लेकिन पिछले तीस वर्षों में शायद ही कोई साल रहा होगा, जब नहीं गई हूं। इस लेख को शुरू यह कहकर कर रही हूं इसलिए कि आपको आश्वस्त करना चाहती हूं कि जो कहने जा रही हूं, उसका आधार मजबूत है। कहने यह जा रही हूं कि हमारे जो राजनीतिक जाते हैं वर्ल्ड इकोनामिक फोरम यानी विश्व आर्थिक मंच के वार्षिक सम्मेलन में, वे सिर्फ छुट्टियां मनाने जाते हैं। न उनको कोई पहचानता है वहां, न कुछ हासिल करके लौटते हैं। उनका जाना अगर बंद किया जाए, तो लाभ होगा इस देश के करदाताओं को जिनके पैसे से ये लोग सैर करने जाते हैं। ये अपने पैसों से क्यों नहीं मनाते छुट्टियां?
मुझे इस बात का एहसास पहली बार हुआ, जब प्रधानमंत्री देवेगौड़ा पहुंचे थे दावोस अपना पूरा परिवार लेकर। याद है मुझे कि यहां के सबसे महंगे होटल की लाबी में मैं बैठी थी कि कांजीवरम साड़ियों में महिलाओं की एक टोली दिखी जिनके आसपास थे कई छोटे बच्चे। थोड़ी तहकीकात की, तो पता लगा कि ये महिलाएं प्रधानमंत्री के परिवार की हैं। सम्मेलन के अंदर तो जा न सकीं, लेकिन इस इरादे से आई भी नहीं थीं। अगले दिन सम्मेलन के सभाघर में प्रधानमंत्री दिखे अपने अधिकारियों के बीच। बौखलाए से लग रहे थे, जैसे समझ नहीं पाए कि उनको अहमियत क्यों नहीं दी जा रही थी।
अहमियत की आदत है हमारे नेता लोगों को इतनी ज्यादा कि जिस साल प्रधानमंत्री नरसिंह राव गए थे, उन्होंने ज्यूरिक से दावोस तक पूरी सड़क बंद करने की मांग रखी थी अपनी सुरक्षा का हवाला देकर, लेकिन इस मांग को स्वीकार नहीं किया गया। इस बात को सुन कर हम भारतीय हंसे भी और शर्मिंदा भी हुए। भारत के प्रधानमंत्रियों का दावोस जाना समझ में आता है, लेकिन बिल्कुल समझ से बाहर है कि इतने सारे मुख्यमंत्री क्या करने जाते हैं दावोस? इनको न कोई पहचानता है, न इनको अहमियत दी जाती है और न ही साबित कर पाते हैं घर लौटने के बाद कि हासिल करके क्या आए हैं।
ऐसा नहीं है कि दावोस जाना बेकार है। बिल्कुल नहीं है, इसलिए कि जो भी हो रहा होता है दुनिया में, उसकी जानकारी पहले दावोस में मिलती है। सम्मेलन चलता है दुनिया के बड़े उद्योगपतियों के पैसों से, लेकिन वहां पहुंचते हैं हर साल विश्व के सबसे प्रसिद्ध विद्वान, वैज्ञानिक और बुद्धिजीवी। इसलिए जब इंटरनेट की खबर नहीं थी आम लोगों को, दावोस में वे लोग आए थे, जिन्होंने इसका ईजाद किया था। उन्होंने हमको सिखाया ई-मेल भेजना और इंटरनेट का मतलब। बिल्कुल वैसा हुआ जब एआइ यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता की शुरुआत हुई थी।
हमारे मुख्यमंत्री और मंत्री अगर दावोस में कुछ सीखना चाहते, तो बहुत कुछ सीख कर आ सकते हैं। आधुनिक शहरीकरण, वायु प्रदूषण समाप्त करने, नदियों को साफ करने और शहरों को स्वच्छ करने के बारे में, लेकिन ऐसा तब होता, जब वे सम्मेलन के अलग-अलग सत्रों में बैठ कर सुनते विशेषज्ञों की बातों को। मगर ऐसा नहीं करते हैं हमारे नेता लोग, इसलिए कि इन सत्रों में कोई वीआइपी नहीं होता है और इनको आदत है वीआइपी होने की।
इसलिए बैठे रहते हैं अपने होटलों में अपने समर्थकों के बीच और उन लोगों से ही मिलते हैं जो आसानी से मुंबई और दिल्ली में मिल सकते हैं। कहते तो हैं कि निवेशकों को ढूंढ़ने जाते हैं दावोस, इसलिए कई राज्यों के दफ्तर खुल जाते हैं इस शहर के मुख्य बाजार में, लेकिन इनके अंदर अधिकतर अपने देसी लोग ही जाते हैं कुछ मिर्च-मसाले पकवान चखने। स्विस खाना बेमजा-सा है अगर आप शाकाहारी हैं।
भारतीय उद्योगपति भी अपने दफ्तर खोलते हैं दावोस की मुख्य सड़क पर, लेकिन उनका वास्तव में मकसद है इस बर्फीले शहर में आना। यहां वे ग्राहकों से मिलते हैं, नई-नई चीजों के बारे में जानकारी लेते हैं। विदेशी निवेशकों से भी मुलाकातें होती हैं दिन भर सभागार में और फिर रात को उन दावतों में जिनके लिए दावोस बदनाम है। यह सारा कुछ करते हैं अपने पैसे खर्च कर, इसलिए इनके जाने पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
आपत्ति अगर है मेरे जैसे लोगों को, तो सिर्फ यह कि हमारे नेता लोग हमारे पैसों से दावोस जाते हैं हर साल सिर्फ तफरीह करने। मुझे तकलीफ इस बात की भी है कि जानती हूं अच्छी तरह कि दावोस जाना कितना महंगा है। वर्ल्ड इकोनामिक फोरम के जो सदस्य हैं, वे लोग दावोस के इस सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए दो करोड़ रुपए से कुछ ज्यादा देते हैं। रहने और खाने का पैसा अलग।
अपने मुख्यमंत्री और मंत्री अकेले तो जाते हैं नहीं, उनके साथ होती हैं अधिकारियों की टोलियां। इसलिए हिसाब लगाइए कि भारत के करदाताओं पर कितना बोझ होता है इन लोगों की वजह से। ऐसा भी नहीं है कि भारत के करदाता इतने अमीर हैं कि वे खुद जाते हों विदेशों में इस तरह की छुट्टियां मनाने। इसलिए और भी ज्यादा गलत है कि हमने अपने राजनीतिकों को यह महंगी आदत डाल रखी है।
उधर जाने के बाद अगर भारत का सम्मान बढ़ाते ये लोग, तो भी कोई लाभ होता देश का। यकीन मानिए कि इनमें से ज्यादातर ऐसे लोग हैं जो यह भी नहीं कर पाते इसलिए कि भाषा की समस्या होती है और सभ्यता भी इतनी अलग है उनकी कि विदेशी लोगों के साथ मिल-बैठ कर कुछ बातें भी नहीं कर पाते हैं। इसलिए मिलते हैं अपने ही देश के पत्रकारों से और अपने ही देश के उद्योगपतियों से जो आसानी से उनको दिल्ली और मुंबई में भी मिल सकते हैं। प्रधानमंत्री से गुजारिश है कि अपने मुख्यमंत्रियों के दावोस जाने पर आप सख्ती से पाबंदी लगाएं, नहीं तो भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस में फर्क क्या है।
