पंडित जवाहर लाल नेहरू और नरेंद्र मोदी का एक-दूसरे के आमने-सामने हो जाना वैचारिक बहस की नियति है। यही सोमनाथ मंदिर के सवाल पर हो रहा है। 1026 ईस्वी में मोहम्मद गजनी ने इसका विध्वंस किया था। अब एक हजार साल बाद ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ मनाया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसके अभिन्न हिस्सा हैं। उनकी भागीदारी महज कर्मकांड नहीं होकर वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ है। पचहत्तर वर्ष पूर्व 1951 में सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ था, तब नेहरू उस पुनर्निर्माण के विरुद्ध थे। नेहरू का विरोध कर्मकांड नहीं था। उनकी भी अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता थी।

सोमनाथ मंदिर का धार्मिक महत्त्व एक ज्योतिर्लिंग के रूप में है, लेकिन वैचारिक महत्त्व ‘भारत के विचार’ की परिभाषा से भी जुड़ा है। देश के दो प्रधानमंत्रियों का एक-दूसरे से विपरीत राय रखना भारतीयता के दो दृष्टिकोणों का प्रतिनिधित्व माना जा सकता है। नेहरू क्यों इसके विरोध में थे? इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने स्वयं एक अगस्त 1951 को मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र में दिया है। वे कहते हैं, ‘इस देश में बहुत कम लोग यह समझते हैं कि भारत के सांप्रदायिक संगठनों के कारण विदेशों में हमारी साख को कितनी गहरी क्षति पहुंचती है, क्योंकि ये संगठन ठीक उन्हीं प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिन्हें पश्चिमी मानसिकता अत्यंत नापसंद करती है और समझ नहीं पाती। हाल ही में सोमनाथ मंदिर का बड़े ठाठ-बाट और समारोह के साथ उद्घाटन विदेश में भारत और उसके घोषित आदर्शों के बारे में अत्यंत नकारात्मक प्रभाव छोड़ गया है।’

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यह बात सामान्य बुद्धि के परे है कि कोई समाज आक्रांता द्वारा विखंडित किए गए मंदिर या ऐतिहासिक स्थल का पुनर्निर्माण करता है, तो वह सांप्रदायिक मान लिया जाएगा। नेहरू की दलील के पीछे हिंदू-मुसलिम सवाल था। संभवत: गजनी के संप्रदाय से उन्होंने समकालीन भारत के मुसलमानों से जोड़ने का प्रयास किया या धार्मिक स्थल के पुनर्निर्माण में राज्य की भूमिका को धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा के प्रतिकूल माना। दोनों ही तर्क अविवेकपूर्ण हैं। तभी तो स्वयं उन्हें अपने दल और मंत्रिमंडल में अलग-थलग होना पड़ा था। सरदार पटेल, केएम मुंशी, एनवी गाडगिल जैसे वरिष्ठ मंत्री इस जीर्णोद्धार अभियान के सूत्रधार थे। मुंशी और गाडगिल तो सोमनाथ ट्रस्ट के सदस्य थे और स्वयं राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद इसके वित्तीय मामलों की देखरेख कर रहे थे।

दो मई 1951 को सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन के अवसर पर राजेंद्र प्रसाद ने जो कहा, वह वैचारिक बहस की बुनियाद है जो अब तक ठंडे बस्ते में बंद था। राजेंद्र प्रसाद के शब्दों में, ‘अपनी राख से फिर उठ खड़ा होकर यह सोमनाथ मंदिर दुनिया के सामने यह घोषणा कर रहा है कि जिस वस्तु के प्रति लोगों के हृदय में असीम श्रद्धा और प्रेम होता है, उसे कोई व्यक्ति और कोई शक्ति कभी नष्ट नहीं कर सकती।’

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आज हमारा प्रयास इतिहास को सुधारने का नहीं है। हमारा एकमात्र उद्देश्य फिर से यह घोषित करना है कि हम उस आस्था, विश्वास और उन मूल्यों के प्रति दृढ़ रूप से जुड़े हुए हैं, जिन पर हमारा धर्म अनादि काल से आधारित रहा है। नेहरू चूक गए कि गजनी सिर्फ आक्रांता नहीं था, बल्कि एक विशिष्ट दृष्टिकोण का प्रतिनिधि था, जिसमें तर्क और ताकत दोनों का उपयोग एकरूपता स्थापित करने के लिए किया जाता है।

इसके प्रतिकूल भारतीय सभ्यता प्रयोगधर्मी रही है, जिसे अनुकूल और प्रतिकूल दोनों ही परिस्थितियों में लोगों ने विस्मृत होने नहीं दिया। यही प्रयोगधर्मी स्वभाव बहुलता, विविधता एवं चेतना की असीमित स्वतंत्रता की जननी है। अर्थात आस्था और विवेकवाद दोनों ही समांतर तथा एक-दूसरे के पूरक के रूप में अस्तित्व में रहते हैं। इसी को समझ कर जर्मन विद्वान मैक्समूलर ने लिखा था, ‘भारत : हमें क्या सिखाता है?’

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पश्चिम के मापदंड के आधार पर भारत कब राष्ट्र बना, यह हमारी चिंता का विषय नहीं होना चाहिए। हम अपने मापदंड से कब से और कैसा राष्ट्र रहे हैं, यह विमर्श का मूल विषय है। यह श्रेय नरेंद्र मोदी को जाता है कि उन्होंने भारत की भूमिका में बुनियादी परिवर्तन किया है। राज्य सभ्यता एवं संस्कृति के प्रश्नों पर उदासीन नहीं रह सकता है। इसलिए वे सभी सूक्ष्म या स्थूल सांस्कृतिक विषय से राज्य एवं राज्यों की एजंसियों से जोड़ते हैं।

प्रश्न उठता है कि क्या ऐसा करना संप्रदायनिष्ठ होना है या नहीं? इसके उत्तर की खोज ही वैचारिक बहस है। भारतवर्ष चौहद्दी से अधिक संस्कृति और सभ्यता के आयामों से पहचान में रहा है। इसमें स्वतंत्र चेतना अबाधित रही है। मगर दूसरे के अस्तित्व की नैतिक और नीतिगत वैधानिकता स्वीकार की जाती है। यही भारत की वैचारिक निरंतरता का सार है। नरेंद्र मोदी इसके अनुकूल भारतीय राज्य को प्रोत्साहित करते हैं। जहां नेहरू सोमनाथ के जीर्णोद्धार में संकोच महसूस कर रहे थे, मोदी के शब्दों में, ‘मैं पूरे विश्वास और स्पष्टता के साथ यह कहना चाहता हूं कि सोमनाथ की कहानी, पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद भी, विनाश की कहानी नहीं है। यह भारत माता की करोड़ों संतानों की अटूट आस्था और अदम्य साहस की कहानी है।’

यह संकीर्ण सवाल नहीं है। यह एक वैश्विक स्तर पर सभ्यताई राष्ट्र की कल्पना को साकार करने की भारतीय जिजीविषा है, जो कभी समाप्त नहीं हो सकती। अंतत: बात इस प्रश्न पर सिमट जाती है कि भारत अपनी पहचान, अपनी संस्कृति और सभ्यता अर्जित करेगा या पश्चिम के आईने में उनके अनुकूल ढलेगा? नेहरू पश्चिम जगत के अनुकूल और मोदी भारत की सांस्कृतिक चेतना की प्रतिबद्धता पर टिकी दो विचारधाराओं के प्रतिनिधि हैं। इस बहस का चलना ही हमारी जीवंतता है।