पिछले सप्ताह कोई दस वर्ष बाद बृहन्मुंबई नगर निगम के चुनाव हुए। मुंबई जैसे महानगर में एक दशक तक नगर निगम चुनावों का न होना गंभीर मामला है। इन चुनावों के लिए जब प्रचार शुरू हुआ, तो मीडिया का ध्यान केवल अटका रहा इस पर कि जीतेगा कौन और हारेगा कौन। किसकी दोस्ती किसके साथ हो रही है और इसका क्या नतीजा होगा। किसी ने राजनीति से आगे बढ़ कर प्रशासन के बारे में नहीं बात की। जबकि सबसे बड़ा मुद्दा है प्रशासन का। हमारे महानगरों में सबसे बेहाल मुंबई है और वह इसलिए कि इस महानगर के कई हिस्से हैं जिनमें प्रशासन नाम की चीज ही नहीं है।
मुंबई के तकरीबन आधे नागरिक रहते हैं ऐसी झुग्गी बस्तियों में जहां बुनियादी सुविधाएं हैं ही नहीं। न इन बस्तियों में नगर निगम से पानी मिलता है, न बिजली, न सुनियोजित तरीके से सड़कें बनती हैं और न ही नालियों की सफाई कभी होती है। नालों में कूड़ा इतना भर जाता है कि इनमें पानी दिखता तक नहीं है। कूड़े के ढेर में छोटे बच्चे शौच करते हैं, कूड़े के ढेर के पास बनते हैं इनके स्कूल।
जब बरसात आती है और कचरा कच्ची बस्तियों में बह जाता है, तो इसके कारण फैलती हैं जानलेवा बीमारियां। गंदगी इतनी अधिक है कि अक्सर इन बस्तियों में पैदा होती हैं वे सारी बीमारियां जो स्वच्छता के अभाव से होती हैं। मुद्दे ये हैं असली, लेकिन इनका जिक्र तक नहीं होता है इसलिए कि जिन लोगों के हाथ में है प्रशासन, उनका मकसद है पैसा बनाना। जनता की सेवा करना नहीं। पैसा बहुत बन सकता है इसलिए कि बृहन्मुंबई नगर निगम एशिया का सबसे धनी नगर निगम है। भारत के कई राज्यों से अधिक है इसका बजट।
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सो पूछना हमको यह चाहिए कि इतना पैसा होने के बावजूद मुंबई के आधे नागरिक क्यों रहते हैं ऐसी बस्तियों में जो युद्ध के बाद गाजा पट्टी के खंडहरों जैसी आजकल दिखती हैं। मेरा इन बस्तियों में आना-जाना रहा है तब से, जब मैं मुंबई में रहने आई थी कोई तीस साल पहले। दिल्ली की हूं और दिल्ली में मेरी आधी से ज्यादा जिंदगी गुजरी है, लेकिन करीब से मैंने कभी शहरी गरीबी नहीं देखी थी, जब तक मुंबई में नहीं रहने आई।
दिल्ली में गरीबी है, लेकिन गरीब लोग अदृश्य हैं। उनके इलाके अलग हैं। मुंबई में ऊंची, शीशे की इमारतों से उतर कर दस कदम पैदल चलें, तो मिल जाते हैं फुटपाथ पर रहने वाले या झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोग, लेकिन इनकी परवाह कोई नहीं करता है।
कोविड के दौर में मुंबई के गरीबों का इतना बुरा हाल हो गया था कि लाखों लोग नियमों को तोड़ कर अपने गांवों तक पैदल चलने पर मजबूर हुए। उनकी मदद के लिए कोई अधिकारी सामने नहीं आया। उल्टा जब पकड़े जाते थे, तो पुलिसवाले इनको पीट-पीट कर वापस भेजा करते थे उन किराए की खोलियों में जिनका किराया वह बेरोजगार होने के कारण देने लायक नहीं रहे थे।
उस दौर से कुछ नहीं सीखा मुंबई के शासकों ने सो आज भी अगर कोविड जैसी कोई नई समस्या पैदा होगी, तो वही हाल होगा आम लोगों का जो उस भयानक दौर में देखा हमने। शहर के शासकों ने कोविड केंद्र और अस्पताल खोलने के बहाने खूब पैसे कमाए, लेकिन परिवर्तन न होने के बराबर हुआ है आज तक।
जनता की असली सेवा तब होने लगेगी मुंबई जैसे महानगरों में, जब जनता के चुने हुए प्रतिनिधि नगर निगम में होंगे। मगर तब, जब चुना हुआ महापौर भी होगा जैसे न्यूयार्क, लंदन में होते हैं और ऐसा तब होगा, जब प्रशासनिक सुधार ऐसे किए जाएंगे कि मुख्यमंत्रियों और विधायकों को भी नगर निगमों के काम में हस्तक्षेप करने से रोका जा सके।
वर्तमान स्थिति यह है कि मुंबई, दिल्ली, कोलकाता और चेन्नई जैसे शहरों में नगर निगमों के पास इतना धन होता है कि मुख्यमंत्री उन पर कब्जा करने पर तुले रहते हैं। बृहन्मुंबई नगर निगम चुनावों के लिए जब से प्रचार शुरू हुआ, आपने देखा होगा किस तरह राजनीतिक दलों के बड़े नेता प्रचार करने निकले। टिकट बांटने का काम भी उन्होंने किया।
मुख्यमंत्रियों का काम नहीं होना चाहिए नगर निगमों को चलाना, लेकिन ऐसी परंपरा बनी हुई है अपने देश में, सो हर महानगर के प्रशासन में मुख्यमंत्री हस्तक्षेप करते हैं। हमारे महानगर दुनिया के सबसे गंदे और बेहाल शहरों में गिने जाते हैं और इस बदनामी का मुख्य कारण यह है कि नगर निगमों और नगरपालिकाओं के बदले इनका प्रशासन चलाते हैं मुख्यमंत्री।
विकसित देशों में ऐसा कभी नहीं होता है। यहां चुने हुए महापौर होते हैं, जो शहरों के राजा होते हैं और पूरी तरह से प्रशासन चलाने का काम उनका होता है। जब गलतियां होती हैं, तो उनकी जिम्मेदारी होती है। जब अच्छी चीजें होती हैं, तो श्रेय उनको मिलता है।
अपने देश में इतना उल्टा-सीधा है महानगरों का प्रशासन कि आश्चर्य की बात है कि किसी ने अभी तक प्रशासनिक सुधारों की कोई ठोस कोशिश नहीं की है। नतीजा यह कि चुनावों का होने या ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है, लेकिन जब तक अपने बेहाल महानगरों को कम से कम इतना बेहतर नहीं बना देते हैं हम कि वह कुछ-कुछ दुनिया के अच्छे शहरों जैसे दिखने लगेंगे, तब तक हम विकसित होने के लायक नहीं बन सकेंगे।
वर्तमान स्थिति यह है कि मुंबई में कुछ मुट्ठी भर लोग हैं जो रहते हैं उन शीशे की इमारतों में और खाना खाते हैं पांच सितारा होटलों में, लेकिन अधिकतर लोग जीते हैं उतनी ही बेहाल जिंदगी जैसे लोग रहते हैं गाजा पट्टी में। तंबुओं के नीचे जो रह रहे हैं युद्ध के कारण बेघर हुए लोग, उनका जीवन शायद मुंबई की झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोगों से बेहतर है।
