हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहां हर पल कुछ न कुछ बदल रहा है, लेकिन इस बदलाव की गति ने हमारी चेतना को लगभग सुन्न कर दिया है। खबरें आती हैं, हिलाती हैं और अगले ही पल किसी और सनसनी के नीचे दब जाती हैं। इस तेजी से भागती दुनिया में सबसे दुर्लभ चीज है ठहराव, और शायद सबसे जरूरी भी।

देश में चुनावी शोर होता ही रहता है। हर गली-कूचे में नारों की गूंज, मीडिया में बहसों की गरमी, सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप की झड़ी लगी रहती है। लेकिन अगर हम इन आवाजों के बीच कुछ देर चुप बैठकर सोचें, तो पाएंगे कि आम आदमी की आवाज कहीं खो-सी गई है। वास्तव में जिसे लोकतंत्र का केंद्र होना चाहिए, वही सबसे हाशिये पर है।

गांवों में पानी नहीं है, शहरों में हवा नहीं है, किसान आज भी कर्ज के बोझ तले आत्महत्या कर रहे हैं और युवा बेरोजगारी के दुश्चक्र में फंसे हुए हैं। लेकिन चुनावी बहसें मंदिर-मस्जिद, जाति-धर्म, राष्ट्रवाद और विरोधियों की गालियों के इर्द-गिर्द घूमती हैं। हम जैसे देखना ही भूल गए हैं कि राजनीति का मतलब लोगों की जिंदगी बेहतर करना है।

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इस सबके बीच, ऐसा लगता और दिखता है कि तकनीक ने हमारी दुनिया को व्यापक स्तर पर जोड़ा है। मगर सच्चाई यह है कि तकनीकी दुनिया का विस्तार जैसे-जैसे होता गया है, उतना ही हम अलग-थलग भी हुए हैं। हम घंटों मोबाइल, कंप्यूटर या टीवी के स्क्रीन पर टिके रहते हैं, लेकिन पास बैठे लोगों से आंख मिलाने का हमारे पास वक्त नहीं होता।

हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष तकनीकी और जैव तकनीकी के युग में हैं, लेकिन मनुष्यता का सबसे बड़ा प्रश्न आज भी वही है – सहानुभूति। सवाल है कि क्या हम एक-दूसरे के दुख को महसूस करना भूल गए हैं?

दिल्ली की किसी झुग्गी में बैठी एक मां, जो दिन भर घरों में झाड़ू-पोंछा कर अपना पेट पालती है, आज महंगाई की मार से दो जून की रोटी भी मुश्किल से जुटा पा रही है। उसकी पीड़ा और अभाव की हालत किसी ‘विकास दर’ में दर्ज नहीं होती। न ही वह किसी आधुनिक और मशहूर ट्रेन की तस्वीर में शामिल है। मगर असल भारत वहीं सांस लेता है – गर्मी के मौसम की झुलसती दोपहर में, टूटी हुई चप्पलों के साथ।

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कभी-कभी लगता है कि जैसे हम एक बड़े भ्रम में जी रहे हैं। एक विकासशील देश होने का भ्रम, एक महान संस्कृति के वाहक होने का भ्रम, एक विश्वगुरु बनने की आकांक्षा का भ्रम, लेकिन क्या हमने अपने भीतर झांककर देखा है?

सार्वजनिक रूप से भी बोली जाने वाली हमारी भाषा कितनी आक्रामक हो गई है। असहमति का मतलब दुश्मनी, आलोचना का मतलब राष्ट्रद्रोह और सवाल पूछने का मतलब साजिश बन गया दिखता है। यह केवल भारत की कहानी नहीं है। पूरी दुनिया जैसे किसी अस्थायी असंतुलन से गुजर रही है। यूक्रेन में युद्ध अब पुराना हो चला है, गाजा में बच्चों की लाशें अब आंकड़ों में बदल चुकी हैं।

जलवायु संकट सिर पर है, लेकिन औद्योगिक राष्ट्र अपने मुनाफे से आगे कुछ सोचने को तैयार नहीं। अफ्रीका की भूख, एशिया की बेरोजगारी और अमेरिका की बंदूकें – ये सब मिलकर एक थके हुए, डरे हुए और भविष्यविहीन मानवता की तस्वीर पेश करते हैं।

सब तरफ निराशा की धुंध दिखती है, लेकिन इसी अंधकार के बीच कुछ रोशनी भी है। एक बच्चा जब स्कूल में दाखिला पाता है, एक लड़की जब बिना डर के साइकिल चला पाती है, एक किसान जब अपने खेत से उपज लेकर लौटता है, तो एक छोटी-सी आशा जन्म लेती है। ये छोटी आशाएं ही बड़े बदलाव की जमीन तैयार करती हैं।

अब सवाल यह है कि हम किस ओर जाना चाहते हैं? क्या हम केवल एक उपभोक्ता समाज बनकर संतुष्ट रहेंगे, जहां मनुष्य केवल एक ग्राहक है? या फिर हम एक ऐसा समाज बनाएंगे या बनाना चाहते हैं, जहां हर जीवन की गरिमा हो?

हमें इस बात पर फिर से विचार करना होगा कि लोकतंत्र केवल पांच साल में एक बार वोट डालने का नाम नहीं है। यह रोजमर्रा की भागीदारी, सवाल करने की संस्कृति और जवाबदेही की मांग से ही जीवित रहता है। और अगर हम अपने अधिकारों के प्रति सजग नहीं होंगे, तो इतिहास गवाह है कि सत्ताएं धीरे-धीरे नागरिकों के मुंह बंद करना जानती हैं।

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इसलिए जरूरी है कि हम ठहरें और देखें कि हमारे आसपास क्या हो रहा है। क्या हम वाकई बेहतर हो रहे हैं या बस बेहतर दिखने की कोशिश में लगे हैं? देश से लेकर दुनिया भर में आंकड़ों का जो चकाचौंध परोसा जा रहा है, क्या वह जमीनी स्तर पर भी वास्तव में अपनी तेज जितना ही प्रभाव दिखा पा रहा है?

दुनिया आगे जा रही है या कहें कि आगे जाती हुई दिख रही है, लेकिन हमें यह तय करना होगा कि यह आगे बढ़ना किस दिशा में है। क्या दुनिया का ‘आगे जाना’ मानवीय मूल्यों के साथ है या फिर ये मूल्य पीछे छूट रहे हैं, नजरअंदाज किए जा रहे हैं या कहीं इसके विरुद्ध भी तो रास्ता नहीं तैयार किया जा रहा है? बिना मूल्यों के, बिना करुणा के, बिना आत्मनिरीक्षण के कोई भी प्रगति खोखली होती है। और खोखली इमारतें, चाहे कितनी भी ऊंची हों, एक दिन ढह जाती हैं। हम अभी भी संभल सकते हैं।