चलिए आज बात करते हैं गंदगी की। वायु प्रदूषण की, नदियों के प्रदूषण की। प्रदूषित शहरों की। विश्व के सौ सबसे प्रदूषित शहर भारत में हैं। पिछले सप्ताह मेरी भतीजी का जन्मदिन था। जश्न मनाया गया लुटियंस दिल्ली के एक बाग में एक ऐसी शाम जब वायु प्रदूषण इतना गंभीर स्तर पर पहुंचा था कि एक चादर-सी छाई हुई थी राजधानी के इस सबसे आलीशान रिहाइशी इलाके में। यहां प्रधानमंत्री रहते हैं, बड़े-बड़े मंत्री रहते हैं, आला अधिकारी रहते हैं और इस शहर के सबसे अमीर लोग भी, लेकिन समझना मुश्किल है कि इनमें से कोई इस बात पर ध्यान नहीं देता है कि सांस लेना खतरनाक हैं इतना कि किसी बड़े डाक्टर ने सलाह दी है कि दिल्लीवालों को शहर छोड़ कर कहीं और जाना चाहिए इस मौसम में।
जिस दिन की मैं बात कर रही हूं, उस दिन से दिल्ली सरकार ने निर्माण के कार्यों पर सख्त पाबंदी लगा दी थी, लेकिन गंदी हवा बिल्कुल भी साफ नहीं हुई थी। जैसे हर साल होता है दिल्ली सरकार के प्रवक्ताओं ने शहर के नागरिकों को सावधान किया कि बाहर पार्क में न टहलें या वर्जिश न करें। स्कूलों को भी सलाह दी गई कि बच्चों को आनलाइन अगर पढ़ाया जाए, तो अच्छा होगा। सवाल यह है कि हम अपने शासकों की लापरवाही बर्दाश्त क्यों करते हैं? हर साल सर्दी का मौसम शुरू होते ही पूरे उत्तर भारत में वायु प्रदूषण की समस्या गंभीर हो जाती है।
बरसात के मौसम में हर साल दिल्ली के कई हिस्से डूब जाते हैं यमुना के पानी में। बात आ ही गई है इस पवित्र नदी की, तो क्यों न याद किया जाए कि करोड़ों रुपए खर्चे जाने के बाद भी इस नदी का पानी इतना जहरीला है कि रसायनों से बनी झाग नदी के पानी को कई स्थानों पर पूरी तरह ढक देती है। इसी पानी में महिलाएं छठ पूजा करती हैं।
दोष दिल्ली के शासकों का है, लेकिन क्या कुछ दोष हमारा नहीं है कि हम इतनी रद्दी सेवाओं को बर्दाश्त करते आए हैं दशकों से? हम क्यों नहीं मिल कर दबाव डालते हैं अपने मंत्रियों और आला अधिकारियों पर इतना कि उनको समाधान ढूंढ़ने पर मजबूर किया जाए? हम क्यों नहीं हिसाब मांगते हैं उन लोगों से जो हर साल हमारे पैसों से ढोंग करते हैं नदियों की सफाई करने का? सच यह है कि नदियों को साफ करने के लिए दुनिया भर में करीब दस हजार कंपनियां हैं जिनके पास नदियों को साफ करने के लिए तकनीक भी हैं और अनुभव भी। यह अधिकतर विकसित पश्चिमी देशों में हैं और इतनी महंगी हैं इनकी सेवाएं कि भारत में इनका कोई निशान नहीं मिलेगा। जब तक हम मिल कर दबाव नहीं डालेंगे अपने शासकों पर, कुछ नहीं होने वाला है नदियों को साफ करने के लिए।
अनुमान है कि 2047 से पहले भारत के आधे से ज्यादा लोग शहरों में रहने लगेंगे। क्या हमारे शहर तैयार हैं इस बदलाव के लिए? बिल्कुल नहीं। हमारा शहरीकरण इतने अनियोजित तरीके से हुआ है कि हम अभी तक इतना भी नहीं सीख सके हैं कि कूड़ा साफ कैसे करना चाहिए। दिल्ली में ऊंचे पहाड़ हैं कूड़े के, जिनमें जब आग लग जाती है, तो इस शहर की वायु और प्रदूषित हो जाती है। कूड़े को हटाने के तरीके हमसे कहीं अधिक गरीब देशों ने सफलता से अपनाए हैं। लेकिन अपने भारत में शायद इसलिए नहीं दिखते हैं कि हम भारतवासी गंदगी आसानी से बर्दाश्त कर लेते हैं।
विद्या नायपाल जब जिंदा थे, तो अक्सर भारत आते थे हर साल और गंदगी को देख कर कहते थे कि भारत के लोगों को गंदगी दिखती ही नहीं है। हमारे विशाल मंदिरों के आसपास गंदी गलियां हैं। गुरुद्वारों के अंदर कार सेवक हमेशा दिखते हैं परिक्रमा की सफाई करते हुए, लेकिन बिल्कुल बाहर दिखती हैं वही गंदी नालियां और वही कूड़े के ढेर।
तो इलाज क्या है? इलाज कोई है भी? शायद है। प्रधानमंत्री हर दूसरे भाषण में कहते हैं कि 2047 में भारत पूरी तरह विकसित देश बन जाएगा, लेकिन क्या यह नहीं ध्यान में उनको आता है कि विकसित देशों की राजधानियों में एक राजधानी नहीं मिलेगी जहां सांस लेना ही मुश्किल हो। न ही उन राजधानियों के बीच नदियां ऐसी बहती हैं जिनका प्रदूषण दूर से दिखता है जहरीले झाग के बुलबुलों में। ऐसा भी नहीं है कि लंदन, न्यूयार्क और पेरिस में कभी वही समस्याएं नहीं थीं जो आज भारत के शहरों में हैं। जरूर थीं।
मेरे कई दोस्त हैं जिनको याद है कि लंदन की हवा इतनी प्रदूषित थी साठ के दशक में कि दिल्ली की तरह चादर बिछी रहती थी पूरे शहर के ऊपर छत बन कर। इन समस्याओं के समाधान ढूंढे गए और अब विकसित देशों के बड़े शहरों में वायु प्रदूषण न के बराबर है। न ही वहां की सड़कों के किनारे दिखते हैं सड़ते कूड़े के ढेर।
भारत में गंदगी की समस्या इतनी गंभीर है कि युद्धस्तर पर अगर काम शुरू नहीं किया जाता है, तो पूरा देश गंदगी के पहाड़ों के नीचे किसी दिन दब जाने वाला है। प्रधानमंत्री ने जब खुले में शौच के खिलाफ आंदोलन छेड़ा था, तो परिणाम यह है कि आज देहातों में नहीं दिखती हैं खुले में शौच करते हुए लोगों की कतारें। अब जरूरत है कि उनकी तरफ से आंदोलन शुरू किया जाए शहरों की गंदगी के खिलाफ। समस्या इतनी गंभीर है कि पहल उनको ही करनी पड़ेगी। निचले स्तरों पर नालायकी और भ्रष्टाचार इतना फैला हुआ है कि गंदगी से भी पैसा बनाने का काम करते हैं नगरपालिकाओं के अधिकारी। हाल इतना खराब है हमारे शहरों का कि दूर भविष्य में उम्मीद की कोई छोटी किरण भी नहीं दिखती है।
