आंखों को देखने का सलीका जब आ गया
कितने नकाब चेहरा-ए-असरार से उठे
-अकबर हैदराबादी
दुनिया भर की महिलाओं को जब सामंती सियासत को देखने-समझने का सलीका आ गया तो उन्होंने तय किया कि चाहे पारंपरिक हो या आधुनिक, परिधान वे अपनी पसंद का चुनेंगी। फिर घूंघट हो, हिजाब या कुछ और। जहां तक हिजाब की बात है तो बहुत शातिराना तरीके से निजी पसंद व सत्ता के थोपे सामंती आदर्श व आदेश का घालमेल कर दिया जाता है। पिछले दिनों यही शातिराना चाल असदुद्दीन ओवैसी ने चली, जब बुर्कानशीं बेटी को भारत की प्रधानमंत्री के रूप में देखने का अरमान जताया। देश की हर तरक्कीपसंद महिला समझती है, चाहे वह जिस धर्म की भी हो कि ओवैसी का मकसद बुर्कानशीं बेटी को प्रधानमंत्री बनाना नहीं, बल्कि बुर्के की अस्मिता से वोट का हिसाब बढ़ाना है। सत्ता और हिजाब के इस हिसाब को समझने की कोशिश करता बेबाक बोल।
पाकिस्तान के संविधान में लिखा हुआ है कि सिर्फ एक ही मजहब का आदमी पाकिस्तान का सदर बन सकता है। बाबा साहेब आंबेडकर का जो संविधान है, वो ये कहता है कि कोई भी भारत का नागरिक वजीर-ए-आजम बन सकता है, सदर-ए-जम्हूरिया बन सकता है, मुख्यमंत्री बन सकता है, मेयर बन सकता है। असदुद्दीन ओवैसी का ख्वाब यह है कि एक दिन आएगा, इस देश में इंशा अल्ला ताला, तब शायद हम और आप नहीं रहेंगे, पर आप देखना हिजाब पहनने वाली बेटी इस देश की वजीर-ए-आजम बनेगी।’
इसी स्तंभ में हमने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की कठोर आलोचना की थी, जब उन्होंने भरी सभा में एक आयुष डाक्टर का हिजाब हटाने की कोशिश की थी। आज हम उन्हीं कठोर शब्दों में असदुद्दीन ओवैसी से पूछते हैं कि बात बाबा साहेब की है, तो आप उनके और अपने सपने को पूरा करने की शुरुआत अपनी पार्टी से क्यों नहीं करते हैं?
कहते हैं कि बदलाव की शुरुआत सबसे पहले खुद से करनी चाहिए। इस स्तंभ में बहुउद्धृत कथा का एक बार फिर से पुनर्पाठ करने के लिए क्षमा चाहते हैं। संत की कथा है ही ऐसी, जो सियासत पर सटीक बैठती है। एक परेशानहाल मां अपने बच्चे को लेकर नामी संत के पास पहुंची। मां ने संत से कहा कि उसका बच्चा मीठा बहुत ज्यादा खाता है, जिस वजह से उसके दांत खराब हो रहे हैं, साथ ही अन्य समस्याएं भी हो रही हैं। मां ने संत से अपील की कि बच्चे को ऐसा उपदेश दें कि वह मीठा खाना छोड़ दे।
संत ने कुछ देर सोचने के बाद महिला को एक पखवाड़े बाद आने के लिए कहा। महिला आश्चर्यचकित हो लौट गई। एक पखवाड़े बाद जब महिला अपने बच्चे को लेकर पहुंची तो संत ने उसका स्वागत किया और बच्चे को ज्यादा मीठा खाने के नुकसान बताने लगे। संत के समझाने का तरीका ऐसा था कि बच्चा प्रभावित हुआ। मां संतुष्ट हुई, पर जाते वक्त उसने संत से पूछा, आप यही शिक्षा तो पंद्रह दिन पहले भी दे सकते थे। फिर आपने उस दिन क्यों लौटा दिया? संत ने संकोच से मुस्कुराते हुए कहा, ‘आज से पंद्रह दिन पहले मैं खुद भी बहुत मीठा खाता था, तो भला बच्चे को मीठे के अतिरेक के अवगुण कैसे बताता? पंद्रह दिनों में मैंने पहले खुद मीठा खाना छोड़ने का अभ्यास किया, तब बच्चे को उपदेश देने के काबिल बन पाया।
हम तो असदुद्दीन ओवैसी से संत सरीखा व्यवहार की उम्मीद करते हैं। कितना अच्छा होता कि पहले वे अपनी पार्टी में किसी महिला को प्रधान यानी उसका अध्यक्ष बनाते। कितना अच्छा होता, अगर ओवैसी चुनावों में अपनी पार्टी के पचास फीसद टिकट महिलाओं को देते। हमें मालूम है कि ओवैसी के लिए ऐसा करना संवैधानिक मजबूरी नहीं है, इसलिए शायद कम से कम हमारे-आपके जीते जी ऐसा नहीं हो सकता है। क्योंकि ओवैसी का मकसद किसी बुर्कानशीं को प्रधानमंत्री बनाना नहीं, बल्कि हिजाब की अस्मिता के सवाल को उठा कर वोटों का हिसाब बैठाना है।
भारत के संविधान के अनुसार भारत की कोई भी महिला नागरिक देश की प्रधानमंत्री बन सकती है, चाहे उसका परिधान कुछ भी हो। सिर्फ अपने परिधान की वजह से कोई महिला संवैधानिक रूप से खारिज नहीं की जा सकती है।
क्या ओवैसी बताएंगे कि संसद में महिला आरक्षण बिल को पास होने में इतना लंबा वक्त क्यों लगा? क्या ओवैसी बताएंगे कि महिला आरक्षण बिल की मुखालफत में जो दो वोट पड़े थे, वे किनके थे? उस वक्त आल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसिलमीन (एआइएमआइएम) ने महिलाओं को सवर्ण व गैर सवर्ण में विभाजित कर विरोध किया था। अब वही महिलाओं को हिजाब के आधार पर बांट रहा है। आज संसद में कई ऐसी महिला जनप्रतिनिधि हैं जो अपनी मजहबी रवायत के मुताबिक सिर ढंकती हैं। जब वे सांसद बन सकती हैं तो प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन सकती हैं?
कई पुरुष सांसद भी ऐसे हैं, जो मजहबी, सांस्कृतिक रवायतों के आधार पर परिधान पहन कर आते हैं। ओवैसी ने मुसलिम पुरुषों के लिए किसी धार्मिक पहचान की वकालत क्यों नहीं की? क्यों नहीं कहा कि फलांनशीं कोई बेटा देश का प्रधानमंत्री बने। इसलिए कि मुसलिम धर्म में पुरुषों का बहुत बड़ा तबका तरक्कीपसंद रवायतों के साथ ही चलना चाहता है। मुसलिम महिलाओं का भी बड़ा तबका ऐसा है। लेकिन ओवैसी महिलाओं के संदर्भ में मजहबी पोशाक को ही केंद्र में लाते हैं। ये तो ओवैसी भी बखूबी जानते हैं कि मजहबी पहचान को आधार बना कर महिलाएं सशक्तिकरण के केंद्र में आ ही नहीं सकती हैं। हां, इसके जरिए ओवैसीजरूर मजहबी पहचान वाली राजनीति के केंद्र में रह सकते हैं।
आज ईरान से जुड़ी एक तस्वीर पूरी दुनिया में प्रतिरोध की प्रतीक बन गई है। एक स्त्री होठों के बीच सुलग रही सिगरेट से तानाशाह धार्मिक नेता की तस्वीर जला रही है। अपनी पसंद से हिजाब या घूंघट चुनना एक बात है, लेकिन हिजाब नहीं पहनने के जुर्म में औरत को सजा देना अलग बात है। हिजाब अस्मिता में अक्सर दो चीजों का घालमेल कर दिया जाता है-निजी पसंद और सत्ता के द्वारा अनिवार्य बना दिया जाना।
मानव सभ्यता का इतिहास इस बात का गवाह है कि आधुनिक बोध में भी हमारा सांस्कृतिक इतिहास हम पर हावी रहता है। इसलिए कई तबके में घूंघट से लेकर बुर्के का अस्तित्व बना हुआ है। सियासत बहुत शातिराना ढंग से सांस्कृतिक अस्मिता को सामाजिक जरूरत व शासकीय कट्टरता में बदलने की कोशिश करती है। जहां भी यह कोशिश सफल हुई है, वहां स्त्रियों से हर तरह के अधिकार छीन लिए गए।
ईरान में बीसवीं सदी की शुरुआत तक हिजाब सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा था, अनिवार्य नहीं। यह परिवार की कथित इज्जत का मामला था, सत्ता की नहीं।एक अति तब हुई जब रेजा शाह पहलवी की सरकार में पुलिस महिलाओं का हिजाब जबरन उतारती थी। कोई भी सामाजिक व सांस्कृतिक बदलाव जबरन नहीं लाया जा सकता। जबर्दस्ती के बाद इसे अस्मिता पर संकट मान लिया जाता है। तब पारंपरिक ईरानी महिलाओं ने घर से निकलना ही बंद कर दिया था। जबरन थोपे जा रहे पश्चिमीकरण को बड़ा तबका स्वीकार नहीं कर पा रहा था।
1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान में हिजाब को इस्लामी गणराज्य की पहचान बना दिया गया। हिजाब कानून का विरोध अर्थदंड व जेल की सजा तक पहुंच गया। 16 सितंबर 2022 को 22 साल की कुर्द महिला महसा अमिनी को गलत तरीके से हिजाब पहनने के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार किया। हिरासत में उत्पीड़न से अमनी की मौत हो गई। महिसा अमनी की शहादत ने ईरान में हिजाब की मुखालफत को नया आयाम दे दिया। एक स्त्री की मौत ने देश की हजारों स्त्रियों को अपने अधिकारों के लिए जिंदा कर दिया।
ईरान में आज का आंदोलन 2022 के महिसा अमनी की शहादत की निरंतरता है। जब स्त्रियां सत्ता के विरोध में बेखौफ सड़कों पर उतरती हैं तो सत्ता के लिए सबसे बड़ी खौफ बन जाती हैं। स्त्रियों के बुनियादी अधिकार कुचलने की जिद में ईरान की मजहबी सत्ता खुद पश्चिमी शक्तियों से कुचले जाने की कगार पर है।
ईरान की तस्वीरें दुनिया भर के मजहबी कट्टरपंथियों के लिए सबक है। ईरान की सत्ता ने स्त्रियों से उनका हक नहीं छीना होता तो आज वे अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ हल्ला बोल करतीं, जैसा दुनिया भर की कई जगहों पर तरक्कीपसंद महिलाएं कर रही हैं। हिजाब को स्त्री की निजी पसंद पर छोड़ दीजिए। हिजाब की आड़ में पितृसत्तावादी चाल चलेंगे तो खुद भी साम्राज्यवादी शक्तियों की गिरफ्त में होंगे। उम्मीद है, ओवैसी सबक लेंगे।
