हमारे समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग ‘वैश्विक’ हो चुका हैं। उसका जन्म अपने देश में होता है, बच्चों का जन्म किसी और देश में; नौकरी वे किसी और देश के लिए करते हैं। काम की भाषा अलग, व्यवहार की भाषा अलग और आत्मीयता-स्नेह की भाषा और भी अलग है। हमारी भोजन की थाली तो हमेशा से अपने देश के विभिन्न व्यंजनों के स्वाद की विविधताओं से सराबोर रही है और अब लंबे समय से लगभग हर देश के पारंपरिक भोजन का जायका ले रहे हैं। रोजमर्रा के छोटे-बड़े सामान्य सामान, बेशकीमती जूते, पहनावे, गाड़ियां बहुराष्ट्रीय कंपनियों की हैं या स्वदेशी, इसे चिह्नित करना कठिन होता जा रहा है। ढेर सारे विकल्प, विविधताएं जीवन का आम हिस्सा बन चुकी हैं।

जब सामान्य दिनों के संघर्षों में कमी आने लगती है, नए-नए अनुभवों से हम गुजरते हैं, दुनिया की सैर करते हैं, तो अपने देश के लिए सपने भी देखने लगते हैं कि कुछ ऐसा किया जाए कि हमारा देश, हमारा शहर भी इतना ही विकसित और सुंदर हो जाए। यह गलत भी नहीं है। हम एक दूसरे से जब सीखते हैं, तभी आगे बढ़ते हैं। पर एक बहुत बड़ा तबका हमारे ही समाज का ऐसा है, जिसे हमारी सभी सुविधाओं से लैस कालोनियां ही किसी अलग दुनिया का हिस्सा लगने लगती हैं। ऐसा क्यों होता है कि जब भी कोई दुर्घटना होती है, वह गरीब बस्ती के लोगों को ज्यादा प्रभावित करती है।

महामारी का असर मलिन बस्तियों में ज्यादा होता है, गरीब मजदूर आदमी दूषित पानी से बीमार क्यों होने लगता है। दवा पीकर क्यों बच्चे अधिक बीमार हो जाते हैं, सरकारी अस्पतालों में गरीब लोगों के नवजात को चूहे क्यों कुतर जाते हैं? क्या इस पर हम गंभीरता से कभी सोच पाए हैं?

गरीब की जरूरतें प्राथमिकता होनी चाहिए

गरीब व्यक्ति जब किसी मध्यवर्गीय या संभ्रांत कहे जाने वाली कालोनी में जाता है और वहां की व्यवस्था- साफ पानी, सुरक्षा, बच्चों के खेलने के पार्क और स्वच्छता को देखता है, तब वह भी एक सपना देखने लगता है कि उसकी गलियों तक भी विकास की हवा पहुंचे। वह संपन्न मध्यवर्गीय परिवार या व्यक्ति की तरह वैश्विक नहीं हुआ है, उसके पास ढेर सारे विकल्प मौजूद नहीं हैं। उसका और उसके पूरे परिवार का जीवन इसी देश में गुजरने वाला है। इसीलिए उसका अधिकार इस देश के ऊपर अधिक है। वह यहां का स्थायी नागरिक है। उसकी जरूरतें, सपने, उम्मीदें सबसे पहली प्राथमिकता में होना चाहिए।

हम सब मनुष्य हैं, उसके बाद भी हम सबकी जरूरतें और संघर्ष कितने अलग हैं। ऐसे में हम सबके भीतर संवेदनशील मन का होना बेहद जरूरी हो जाता है। जगमगाती रोशनी, गगनचुंबी इमारतों को सराहते हुए हमारे चित्त में यह भी रहना चाहिए कि हम सबको साथ लेकर आगे बढ़ रहे हैं या नहीं, कहीं कोई छूट तो नहीं रहा। विकास के क्रम में सबसे पहला अधिकार उन लोगों का आना चाहिए, जिनकी मूलभूत जरूरतें अभी तक पूरी नहीं हो पा रही हैं। विकास होते हुए महसूस हम कर सकते हैं जब हमारी असमानताओं की खाई कम होने लगे। मूलभूत जरूरतें, जैसे साफ पानी, स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा और सुरक्षा की गुणवत्ता सभी नागरिकों के लिए समान हो।

कुछ लोगों को अलग तरह का पानी, अलग शिक्षा, स्वास्थ्य- इस तरह की असमानता से हम कभी भी प्रगतिशील और मजबूत समाज नहीं बना सकेंगे। एक तबका हमेशा पिछड़ा रहेगा। एक गली हमेशा मलिन बनी रहेगी। मूलभूत जरूरतों को लेकर किसी भी तरह की भिन्नता को हटाना होगा। अमीर व्यक्ति और गरीब व्यक्ति, दोनों को ही समान गुणवत्ता की मूलभूत सुविधाएं एक समान प्राप्त होनी चाहिए।

विकास के लिए सबसे पहले ईमानदार कोशिश की जरूरत

विकास के लिए सबसे पहले ईमानदार कोशिश की जरूरत होती है और ऐसे लोगों की आवश्यकता होती है जो जमीन से जुड़े हुए हों, जिनका उद्देश्य व्यापक हो और स्वार्थ से परे हो। किसी भी तरह का विकास एक लंबी प्रक्रिया से होकर गुजरता है। हमें खुद के भीतर की खूबियों और कमियों से अवगत होना होता है।

जब हम खुद को केंद्र में रखकर संघर्ष करते हैं, तब हमारी नींव मजबूत बनती है, हर सफलता को हम अपनी पहले की स्थिति को देखकर समझते हैं, न कि किसी विकसित देश को अपना आदर्श मानकर आनन-फानन उसकी तरह बन जाने का प्रयास करने लगते हैं। ऊपरी साज-सजावट की जगमगाहट जरूर हमें चकित करती है, पर उसके कारण पड़ा दबाव मूलभूत ढांचे की स्थिति को और भी जर्जर कर देता है। विकास की शुरुआत भव्य आलीशान इमारतों से नहीं होती है, उसकी शुरुआत के लिए तंग गलियों में जाना होता है। फिर उसमें कितना ही समय लगे, पर वह परिवर्तन स्थायित्व लिए होता है।

विकसित देशों को देखकर उनकी तरह बनने का सपना देखना, दूसरों से सीखना, समझना, विविधताओं को अपनाना बहुत अच्छी बात है। पर उसके साथ जुड़ी एक लंबी प्रक्रिया को भी समझना, जिसमें बुनियादी काम किए गए हों, जनभागीदारी से निर्णय लिए गए हों, प्रगतिशील और व्यापक सोच के साथ सबके हित को ध्यान में रखते हुए रूपरेखा बनाई गई हो, जो निश्चिंत करती हो कि यह एक समान और सबकी पहुंच सुनिश्चित करने वाले विकास को बढ़ावा देने में सक्षम रहेगी। विकास की ओर पहला कदम उन दबी हुई, बिलखती आवाजों को सुनना और उसे मजबूती देना होना चाहिए, जिसके होने से देश सांस लेता है। मेहनतकश लोगों के जीवन को बेहतर बनाना, उनके सपनों को प्राथमिकता देने से ही देश की नींव मजबूत हो सकती है। मजबूत नींव पर हर सपने को पूरा किया जा सकता है।

यह भी पढ़ें: मनोबल की नांव है जीवन के तूफानों में सफलता का एकमात्र आधार