ग्रीनलैंड मुझे दे दे..! धमकी देर तक बरसती रही, सब सुनते रहे, सब सहते रहे..! कल तक के बड़े-बड़े ‘सूरमा’ थे, लेकिन खुली धमकी पर सब खामोश थे और जवाब में सिर्फ ताली..! नाटो भी चुप! ‘दावोस’ अपनी संपन्नता में मदहोश! सिर्फ एक एंकर ने इस पर कहा कि कहां गए उपनिवेश बनाने वाले, जिन्होंने कभी दुनिया को ‘उपनिवेश’ बनाया, अब उन्हीं को अपने गब्बर अपना ‘उपनिवेश’ बना रहे हैं और सारे सूरमा चुप हैं… यह ‘कालोनाइजरों’ का ‘कालोनाइजेशन’ है प्यारे! ‘दावोस’ के विश्व आर्थिक मंच में सबने लगाई अपनी-अपनी दुकान, लेकिन मेला लूटा गब्बर भाई की बब्बर-लीला ने!
सिर्फ एक नीला सूट, लाल टाई वाले के मुंह से आवाज निकली कि उसने तो चली आती ‘विश्व व्यवस्था’ को ‘लुढ़का’ दिया। दूसरा पिनपिनाया, लेकिन बिना नाम लिए… तीसरा, चौथा, पांचवां… पचासवां… सब अपनी-अपनी धुन पर अपना नाच दिखाते-गाते कि ‘आइए मेहरबान… हमारे यहां पैसा लगाइए… कि हमारे जैसा बाजार कहां मिलेगा..!’ मगर ग्रीनलैंड से, डेनमार्क से कोई नहीं पूछता कि ‘हाल कैसा है जनाब का…?’ इतनी बड़ी ‘वैश्विक कहानी’ के आगे और कौन कहानी ठहरती? इसलिए कहानी अपनी स्थानीय पटरी पर लौटी, जहां कुछ देसी ‘देवता’ सुर्खियों में आने के लिए कसमसाते अपने को खबर बनाते दिखे।
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इनमें अव्वल नंबर रहा उन ‘विवादित’ शंकराचार्य का, जो प्रयाग के माघी मेले में एक सुबह अपनी पालकी पर बैठ कर गंगा स्नान करने गए, लेकिन जैसे ही प्रशासन और पुलिस ने गंगा स्नान के लिए उनको पालकी से उतर कर गंगा तट तक पैदल जाने को कहा, तो वे वैसे ही जिद पर अड़ गए, उनके बटुकों ने भी वही किया। फिर पुलिस और बटुकों में झड़प हुई और विरोध में शंकराचार्य वहीं धरने पर बैठ गए… और मुद्दा बन गया!
एक एंकर ने पूछा कि जब माघी मेले में पालकी पर जाना मना है, तो आप गए क्यों..? क्या पैदल नहीं जा सकते थे। मूल शंकराचार्य पूरे भारत में पैदल घूमे, लेकिन आप पचास कदम नहीं चल सकते थे? टीवी की कई बहसों में विवादित शंकराचार्य स्वयं मौजूद रहे और दूसरे बाबाओं के आरोपों के जवाब स्वयं देते रहे।
इस बीच एक अन्य बाबा ने कहानी ‘कालनेमि’ की भी शुरू करा दी और कई चर्चक ‘कालनेमि जिमि रावन राहू’ का अर्थ निकालते दिखे। अब हालत यह हुई कि एक ओर एक बाबा सात दिन से धरने की धूनी रमाए रूठे बैठे रहे, तो दूसरी ओर ‘सेकुलर समूह’ वाले इस विवाद में अपने अच्छे भविष्य की ‘शुरुआत’ देखते हैं, मानो ‘बिल्ली के भाग छींका अब टूटा कि अब टूटा..!’ एक एंकर ने ‘बंटोगे तो कटोगे’ के नारे को ही ‘विपरीत दिशा’ में जाते देखा।
बहरहाल, एक शाम ‘वीबी जी राम जी योजना’ के विरोध के बहाने जैसे ही विपक्ष के एक बड़े नेता ने अपने अध्यक्ष के साथ अपने माथे पर गमछा बंधवा कर कंधे पर कुदाल रख कर फोटो खिंचवाया, वैसे ही लगा कि विरोध का यह नाटकीय दृश्य कुछ तो सार्थक होगा। मगर जैसे ही नेताजी ने ‘जी राम जी योजना’ पर कटाक्ष किया कि यह ‘ग्राम जी’ क्या है… समझ में नहीं आता… वैसे ही सारी ‘गमछा कुदाल लीला’ निरर्थक हो गई।
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गनीमत है कि इस खास समय में सामान्य नागरिक हित के मुद्दों पर अभी भी कई चैनल अपने को बेहद संवेदनशील चैनल की तरह दिखाते हैं।
शायद इसीलिए उस दिन उस घोषित राष्ट्रवादी एंकर ने नोएडा के एक इंजीनियर को कार समेत पानी से भरे गहरे पोखर में डूब जाने को ‘नागरिक हित’ की एक ‘बड़ी त्रासदी’ बनाकर दो-तीन दिन तक दिखाया और इस तरह अपने को ‘जनहितवादी’ सिद्ध किया। वीडियो दिखाते रहे कि उसकी कार गिरी, तो वह डूबती कार के ऊपर आ गया।
अंधेरे में दो-ढाई घंटे तक वह अपने मोबाइल की रोशनी दिखाता रहा और मदद के लिए चिल्लाता रहा, लेकिन बचाने कोई न आया। ‘आपदा’ वाले पानी में घुसने से डरते रहे और वह डूबता रहा। फिर एक मामूली आदमी ने साहस दिखाया। बाद में उसे पानी के बाहर निकाला गया, कार दो दिन बाद निकाली जा सकी।
मीडिया के दबाव में शायद सरकार ने नोएडा के एक अफसर को हटाया, लेकिन जैसे ही यह खबर आई कि ‘एक कुत्ते वाले अफसर’ को, जिसने कुत्ते के लिए स्टेडियम खाली कराया था, जिसके लिए उसे हटाया गया था, अब फिर उसी को दिल्ली में एक प्रशासनिक पद बहाल कर दिया गया। शायद वैसे ही समझाने की कोशिश हुई कि ‘जेसिका’ की तरह ही ‘इंजीनियर को किसी ने नहीं मारा!’
