Who Is Mausam Noor: उत्तरी बंगाल का मुस्लिम बहुल मालदा जिला कभी राज्य में कांग्रेस का गढ़ हुआ करता था। यह राज्यसभा सांसद मौसम नूर का गृह क्षेत्र है, जहां से उन्होंने 2008 में कांग्रेस पार्टी के साथ अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की थी। 46 वर्षीय नूर ने शनिवार को राज्य की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से इस्तीफा दे दिया और सात साल बाद कांग्रेस में वापस लौट आईं।

राज्य विधानसभा चुनावों से सिर्फ तीन महीने पहले उनकी यह वापसी कांग्रेस के लिए अहम मानी जा रही है, खासकर ऐसे समय में जब पार्टी राज्य में कमजोर दौर से गुजर रही है। मौसम नूर की वापसी के साथ उनका मजबूत राजनीतिक पारिवारिक आधार भी कांग्रेस के साथ फिर जुड़ गया है।

मौसम नूर की मां रूबी नूर मालदा की सुजापुर सीट से चार बार कांग्रेस की विधायक रह चुकी हैं। वहीं उनके चाचा अबू बरकत अताउर गनी खान चौधरी, जिन्हें बरकत दा के नाम से जाना जाता था, कांग्रेस के बड़े नेता थे। वे मालदा से आठ बार सांसद रहे और इंदिरा गांधी व राजीव गांधी की सरकारों में केंद्रीय मंत्री भी रहे थे।

मौसम नूर की कांग्रेस में वापसी के बाद पार्टी की कोशिश होगी कि वह मालदा इलाके में फिर से अपनी मजबूत पकड़ बनाए। भले ही पूरे राज्य में तृणमूल कांग्रेस का दबदबा है और भाजपा मुख्य विपक्षी दल के रूप में उभरी है, लेकिन मालदा में कांग्रेस का चुनावी प्रदर्शन अब भी अहम रहा है।

मालदा दक्षिण से कांग्रेस सांसद और अपनी चचेरी बहन ईशा खान चौधरी के साथ मौसम नूर ने दिल्ली स्थित अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) मुख्यालय में औपचारिक रूप से पार्टी की सदस्यता ली। इस मौके पर मौसम नूर ने कहा, “हमने बरकत साहब की विरासत को आगे बढ़ाने और मजबूत करने का फैसला किया है। यह काम कांग्रेस में रहकर ही किया जा सकता है।”

मौसम नूर की वापसी से कांग्रेस को कैसे फायदा होगा?

मौसम नूर की कांग्रेस में वापसी पर एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा कि मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में कभी कांग्रेस की मजबूत पकड़ थी, लेकिन 2021 के विधानसभा चुनावों के बाद यह खत्म हो गई। नेता के मुताबिक, वक्फ कानून और अन्य कई मुद्दों को लेकर अब इन जिलों में अल्पसंख्यक समुदाय तृणमूल कांग्रेस से नाराज है। ऐसे में मौसम नूर की वापसी से मालदा और मुर्शिदाबाद दोनों जिलों में कांग्रेस को मजबूती मिल सकती है।

आंकड़ों की बात करें तो 2019 के लोकसभा चुनाव में पहली बार कांग्रेस मालदा जिले की दोनों सीटें नहीं जीत पाई थी। 2016 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने मालदा की 13 में से 8 सीटों पर जीत हासिल की थी, लेकिन 2021 के चुनाव में न तो मालदा में और न ही पूरे पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को एक भी सीट मिली। हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में मालदा दक्षिण से ईशा खान चौधरी की जीत कांग्रेस के लिए बड़ी कामयाबी साबित हुई।

कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, नूर को विधानसभा चुनाव प्रचार में पार्टी के प्रमुख चेहरों में से एक के रूप में उतारा जाएगा। संभवतः उन्हें सुजापुर सीट से उम्मीदवार बनाया जाएगा। राज्यसभा में उनका कार्यकाल अप्रैल 2026 में समाप्त होने वाला है।

कांग्रेस के एक अंदरूनी सूत्र ने कहा कि राज्य में पार्टी के पास बड़े और पहचान वाले नेताओं की कमी है, खासकर महिला नेताओं की। उन्होंने कहा कि पूर्व सांसद अधीर रंजन चौधरी जरूर बड़े नेता हैं, लेकिन उनका प्रभाव ज्यादातर मुर्शिदाबाद तक ही सीमित है। ऐसे में पार्टी को उम्मीद है कि मौसम बेनजीर नूर आगे चलकर पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की एक मजबूत महिला चेहरे के रूप में उभर सकती हैं।

एक अन्य वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा कि अभी यह साफ नहीं है कि आने वाले चुनाव में कांग्रेस वामपंथी दलों के साथ गठबंधन करेगी या नहीं। लेकिन मौसम नूर की वापसी से यह बात और मजबूत होगी कि कांग्रेस की असली लड़ाई भाजपा से है। इससे विधानसभा चुनावों में गठबंधन को लेकर समीकरण बदल सकते हैं।

मौसम नूर की पढ़ाई से लेकर राजनीतिक यात्रा

राजनीति में आने से पहले मौसम नूर ने कोलकाता में पढ़ाई की थी और साल 2005 में कलकत्ता विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई पूरी की। 2008 में उनकी मां रूबी नूर के निधन के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति में कदम रखा। उस समय रूबी नूर सुजापुर की विधायक थीं।

2009 में मौसम नूर ने सुजापुर उपचुनाव से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में अपना पहला चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। इसके बाद उसी साल हुए लोकसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर मालदा उत्तर सीट से जीत दर्ज की।

2011 में उन्हें पश्चिम बंगाल युवा कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया। दो साल बाद वे कांग्रेस की मालदा जिला अध्यक्ष बनीं। 2014 में वे फिर से सांसद चुनी गईं। उन्हें राहुल गांधी के करीबी युवा कांग्रेस नेताओं में गिना जाता था।

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2019 के लोकसभा चुनाव से पहले मौसम नूर ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि कांग्रेस नेतृत्व ने टीएमसी के साथ गठबंधन करने के उनके सुझाव को नहीं माना। इसके बाद वे तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गईं और मालदा उत्तर सीट से टीएमसी के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ा।

हालांकि, इस चुनाव में उन्हें भाजपा के खागेन मुर्मू से हार का सामना करना पड़ा। खागेन मुर्मू वही नेता हैं जिन्हें मौसम नूर 2009 और 2014 के चुनावों में हरा चुकी थीं। बाद में, साल 2020 में तृणमूल कांग्रेस ने उन्हें राज्यसभा सांसद के रूप में मनोनीत किया।

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