पिछले सप्ताह वाले लेख के बाद मैंने इतनी गालियां खाईं कि मजबूर होकर इस लेख में मैं अपनी सफाई देना चाहती हूं। हमास द्वारा किए गए बर्बर, अमानवीय आतंकवादी हमले पर फिर लिखने के लिए मजबूर हूं मैं। इसलिए कि जिन लोगों से मुझे गालियां मिली हैं उनका आरोप है कि मैं इजराइल की तरफदारी कर रही हूं बिना देखे कि इजराइल ने फिलिस्तीनियों पर कितने जुल्म ढाए हैं।
यह आरोप खास तौर पर तब लगा जब पिछले हफ्ते कुछ घंटों के लिए ऐसा लगा कि इजराइल ने गाजा पट्टी के एक अस्पताल को निशाना बनाया और इस हमले में कई सौ फिलिस्तीनी मारे गए जिनमें ज्यादातर बच्चे थे। दुनिया को थोड़ी देर लगी इस हमले का सच जानने में। लेकिन जब विशेषज्ञों ने तहकीकात की तो इस नतीजे पर पहुंचे कि मिसाइल इजराइली नहीं फिलिस्तीनी थी जिसका निशाना चूक गया। अमेरिका के राष्ट्रपति ने इस बात को स्वीकार किया है।
मिसाइल जिसकी भी थी जो हुआ बहुत दर्दनाक था। लेकिन ये भी कहना जरूरी है कि जब युद्धभूमि में ऐसी घटनाएं घटती हैं तो दलील कम से कम ये दी जा सकती है कि युद्ध में इस तरह की चीजें होती हैं। जो हमास ने किया इजराइल में वो युद्ध नहीं, आतंकवाद था। जानबूझ कर हमास ने अपने आतंकवादियों को भेजा ऐसे लोगों को जान से मारने जो निहत्थे थे, बुजुर्ग थे, महिलाएं थीं, छोटे बच्चे थे।
अभी तक उनके पास कोई दो सौ इजराइली बंधक हैं, जिनको अगर पहले दिन ही इजराइल के हवाले कर दिए होते तो न गाजा पर बमबारी होती और न स्थिति ऐसी बनती कि लाखों फिलिस्तीनियों को अपना घर-बार छोड़ कर गाजा के उत्तरी हिस्से में जाना पड़ता। सवाल यह है कि हमास अभी तक उन बंधकों को क्यों नहीं रिहा कर रहा है? इस सवाल के जवाब में रखी है इजराइल और फिलिस्तीनियों के बीच सारी दुश्मनी की कहानी।
कड़वा सच ये है कि हमास जैसी आतंकवादी संस्थाएं कभी अमन-शांति नहीं चाहतीं, क्योंकि उनका आस्तित्व आधारित है पूरी तरह अराजकता और आतंक से। इतिहास में जाना नहीं चाहती हूं, लेकिन इतना जरूर कहूंगी कि यासेर अराफात को कई मौके मिले थे शांति बहाल करने के, इजराइल के साथ अमन-चैन से रहने के, लेकिन आखिरी वक्त पर वे किसी ना किसी बहाने हर समझौते को ठुकरा देते थे।
मैंने जब किसी विशेषज्ञ से इसके बारे में पूछा तो उसने इन शब्दों में जवाब दिया, ‘क्या आपको लगता है कि एक व्यक्ति जिसने दुनिया में अपना रौब जमाया हुआ है वह गाजा का महापौर बन कर संतुष्ट हो जाएगा? अमन-शांति अगर आ जाती है तो यूरोप से जो इतना पैसा मिल रहा है अराफात को, क्या बंद नहीं हो जाएगा?’
जी हां, अगर शिकायत ये है कि इजराइल को शक्तिशाली बनाया है अमेरिकी पैसों ने तो शिकायत ये भी होनी चाहिए कि फिलिस्तीन को कई यूरोपीय देशों से पैसा दशकों से मिलता रहा है। जहां इजराइल ने अपना पैसा निवेश किया सुरक्षा और विकास में, वहीं फिलिस्तीनियों ने निवेश किया आतंकवाद में और ऐसे घिनौने किस्म का आतंकवाद कि स्कूलों, अस्पतालों की शरण लेकर हमास ने तमाम हमले किए हैं इजराइल पर।
मैंने जब भी ऐसा कहा है तो हमास के हमदर्द, जिनमें अक्सर मिलते हैं वामपंथी और लिबरल स्वभाव के लोग, कहते हैं कि हमास मजबूर होकर आतंकवाद पर उतर आया है। उनका क्या दोष है जब इजराइल युद्धभूमि में उनसे कहीं ज्यादा ताकतवर है?
यही दलील आपको सुनने में मिलेगी हर आतंकवादी संस्था से। अपने ही पड़ोस की बात करते हैं। भारत का शायद ही कोई प्रधानमंत्री रहा है जिसने दिल लगा कर कोशिश न की हो पाकिस्तान के साथ दोस्ती करने की। याद कीजिए कि नरेंद्र मोदी, जिनको कट्टर हिंदुवादी माना जाता है, उन्होंने भी प्रधानमंत्री बन जाने के फौरन बाद नवाज शरीफ को अपने शपथ ग्रहण समारोह में बुलाया था।
उसके बाद किसी बहाने मोदी लाहौर भी गए नवाज शरीफ से दोस्ती बढ़ाने लेकिन नतीजा यही हुआ कि पाकिस्तान के सैनिक शासकों ने शरीफ को हटा दिया और आतंकवाद का सिलसिला भारत की भूमि पर जारी रखा। पाकिस्तान के हमदर्द कहते हैं कि ऐसा हुआ है सिर्फ इसलिए कि भारत की सेना को युद्धभूमि में हरा नहीं सकती है पाकिस्तान की सेना, सो आतंकवादियों पर मजबूर हो कर निर्भर रहना पड़ता है।
चाहे कश्मीर हो, चाहे मुंबई – हर आतंकवादी घटना में मिलते हैं पाकिस्तानी सेना की उंगलियों के निशान। जो आतंकवादी भेजते हैं हमारे देश में वो योद्धा कभी नहीं कहला सकते हैं, इसलिए कि अपनी बहादुरी दिखाते हैं सिर्फ निहत्थे, बेगुनाह लोगों को मार कर। बिलकुल ऐसा ही किया हमास ने। सो अगर हमास के आतंकवाद को हम सही कहना शुरू करेंगे तो लश्कर-ए-तैयबा को भी सही कहना होगा, हिज्बुल मुजाहिदीन को भी सही कहना होगा और खालिस्तान के आतंकवादियों को भी सही ठहराना पड़ेगा। क्या ऐसा करने को तैयार हैं हम? कभी नहीं।
हमास के बर्बर हमले के बाद जो बाइडेन ने कहा था कि कोई भी राजनीतिक शिकायत अधिकार नहीं देती है बेगुनाह लोगों पर हमला करने की। अफसोस की बात है कि इस्लामी देशों के जाने-माने बुद्धिजीवी भी हमास का साथ खुल कर दे रहे हैं जिन में कई पाकिस्तानी भी हैं। अफसोस की बात है कि लाखों की तादाद में मुसलमान सड़कों पर निकल कर आए हैं हमास के समर्थन में।
पिछले सप्ताह से कहने लगे हैं कि अगर इजराइली बच्चों को मारना गलत है तो उतना ही गलत है फिलिस्तीनी बच्चों को मारना। भूल गए हैं कि उन्होंने समर्थन तब जताना शुरू किया था जब हमास ने अपना घिनौना नरसंहार किया था इजराइल की गाजा पर बमबारी से पहले। इस बात को याद रखना हमारे लिए जरूरी है।
